Putin China Visit: मई में शी जिनपिंग से मिलने जाएंगे व्लादिमीर पुतिन, चीन से रूसी कंपनियों को बचा पाएंगे?
Vladimir Putin China Visit: रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने गुरुवार को कहा है, कि वह मई महीने में चीन की यात्रा करने की योजना बना रहे हैं। इस साल एक बार फिर से राष्ट्रपति चुनाव जीतने के बाद रूसी राष्ट्रपति की ये पहली विदेश यात्रा हो सकती है, लेकिन सवाल ये उठ रहे हैं, कि क्या व्लादिमीर पुतिन चीनी कंपनियों से रूस की कंपनियों की रक्षा कर पाएंगे।
व्लादिमीर पुतिन ने मॉस्को में रूसी उद्योगपतियों और उद्यमियों के संघ के सम्मेलन में अपनी चीन की यात्रा की योजना की घोषणा की है। हालांकि, उन्होंने यह नहीं बताया, कि मई महीने में वो कब चीन की यात्रा करेंगे और उनकी यात्रा के एजेंडे में क्या होगा, लेकिन ये घोषणा उन कारोबारियों के बीच की गई है, जो चीन की कंपनियों की वजह से काफी परेशान हैं।

रूसी कंपनियों को चीन से खतरा
रूसी सांसदों ने इस सप्ताह की शुरुआत में कहा था, कि पुतिन अगले महीने 7 मई को फिर से राष्ट्रपति पद संभालेंगे। पिछले महीने, 71 वर्षीय रूसी नेता ने बिना किसी वास्तविक विरोध के मतदान में अपना पांचवां कार्यकाल हासिल किया था, जिससे उनके 24 साल के शासन का फिर से विस्तार हो गया है।
यूक्रेन के खिलाफ रूसी युद्ध शुरू होने के बाद व्लादिमीर पुतिन अभी तक अपने देश की अर्थव्यवस्था को बचाने में भले ही कामयाब हुए हैं, लेकिन ये कामयाबी चीन पर जरूरत से ज्यादा बढ़ती निर्भरता की शर्त पर आई है और रूस के अंदर चीनी कंपनियों ने रूसी कारोबार पर ताले लगाने शुरू कर दिए हैं।
हाल ही के एक अमेरिकी रिपोर्ट में कहा गया है, कि चीन ने रूस को मशीन टूल्स, माइक्रोइलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य टेक्नोलॉजी की बिक्री बढ़ा दी है, जिसका उपयोग मॉस्को संघर्ष में उपयोग के लिए मिसाइलों, टैंकों, विमानों और अन्य हथियारों का उत्पादन करने के लिए कर रहा है। लेकिन, हथियारों के आलावा चीनी कार कंपनियों ने रूसी बाजार पर एक तरह से कब्जा कर लिया है।
रूसी कारोबार को चीन से कितना खतरा?
बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, रूस की कई बड़ी कंपनियों ने शिकायत की है, कि चीनी कंपनियों की वजह से उन्हें कई तरह की कारोबारी दिक्कतें आ रही हैं। जबकि, रूसी अधिकारी दुनिया को बताते हैं, कि दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन के साथ वो अपने कारोबारी रिश्ते को और मजबूत कर रहा है।
माना जा रहा है, कि रूस ऐसा इसलिए कहता है, ताकि पश्चिमी देशों को ये संदेश जाए, कि उनके प्रतिबंधों से रूस बेअसर है, लेकिन चीन इसका जबरदस्त फायदा उठा रहा है।
राष्ट्रपति पुतिन लगातार चीनी कंपनियों से अपने देश में निवेश करने के लिए मना रहे हैं, लेकिन चीनी कंपनियां, चीन में उत्पादन कर रूस में सामान बेचने पर फोकस किए हुए हैं। पिछले साल के अंत में पुतिन ने चीनी कंपनियों से वादा किया था, कि रूस में उन्हें अपना कोराबार सेटअप करने में जो भी अड़चनें हैं, उन्हें खत्म कर दिया जाएगा।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, चीन और रूस के बीच 240 अरब डॉलर का कोराबार है, जिसमें रूस, चीन में 129.2 अरब डॉलर का सामान बेचता है। जबकि, चीन, रूस में 111 अरब डॉलर का सामन बेचता है।
रूस का निर्यात बढ़ने के पीछे की सबसे बड़ी वजह पिछले दो सालों में रूसी तेल का निर्यात है। भारत की तरह चीन भी भारी मात्रा में रूसी तेल खरीद रहा है। लेकिन, अब रूसी कंपनियां बार बार शिकायत कर रही हैं, कि चीनी बैंक जरिए होने वाले भुगतान में चेक बाउंस हो रहा है। इसके अलावा भी चीन की कंपनियों के खिलाफ कई तरह की शिकायतें आ रही हैं।
चीन की इलेक्ट्रिक कार कंपनियों ने रूसी बाजार पर कब्जा कर लिया है। चीन की सरकार पहले ही अपने देश की कार कंपनियों को सस्ती कारों के निर्माण के लिए भारी रियायत देती है, जिससे चीनी कारों के मुकाबले रूसी कारों की मांग काफी घट गई है। लिहाजा, रूस की सबसे बड़ी कार बनाने वाली कंपनी एवतोवाज़ के प्रमुख मैक्सिम सोकोलोव ने राष्ट्रपति पुतिन से अनुरोध किया है, कि रूसी कारों पर टैक्स बढ़ाएं, अन्यथा रूसी कार कंपनियां बंद हो सकती हैं।
लेकिन, चीन में रूसी बाजार पर कब्जा करने का जश्न मनाया जा रहा है। चीन के सरकारी अखबार गुआंचा ने रूसी कारोबारियों से अपनी 'भावनाओं को काबू' में रखने को कहा है। अखबार ने 17 फरवरी के अपने लेख में कहा है, कि "रूस के लोगों की चीन के प्रति धारणा इसलिए बदली है, क्योंकि चीनी कंपनियां उन्हें हाई क्वालिटी वाले सामान सस्ते दामों में उपलब्ध करवा रही हैं।"
जबकि, दोंगचेदी.कॉम ने अपने एक लेख में साफ शब्दों में लिखा है, कि "रूसी मीडिया ने काफी उम्मीदें पाल रखी हैं। वो चाहते हैं, कि रूस में बिकने वाली सारी कारों का निर्माण रूस में ही हो।"
लेकिन, सवाल ये है, कि क्या पुतिन के पास कोई और विकल्प बाकी है? यूक्रेन में अभी भी युद्ध जारी है और पुतिन के पास चीन से टकराव मोल लेना संभव नहीं है, लिहाजा एक्सपर्ट्स का मानना है, कि पुतिन की मजबूरी रूसी कंपनियों के अस्तित्व मिटने का कारण बन सकती हैं।












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