गाली खाने के बाद भी डोनाल्ड ट्रंप का समर्थन करेंगे विवेक रामास्वामी, हिन्दू होने के ढोल पीटने का हुआ नुकसान?
भारतीय मूल के रिपब्लिकन उम्मीदवार विवेक रामास्वामी ने अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव के लिए अपनी उम्मीदवारी को रद्द करने का फैसला किया है। अब वे चुनावी रेस में नहीं दौड़ेंगे। 38 वर्षीय उद्यमी ने मंगलवार को पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के आयोवा कॉकस जीतने के बाद यह घोषणा की।
आयोवा कॉकस में विवेक रामास्वामी चौथे स्थान पर रहे। उनसे आगे रॉन डिसेंटिस, निक्की हेली और डोनाल्ड ट्रंप रहे। कॉकस में क्रिस क्रिस्टी सबसे आखिरी स्थान पर रहे। इस हार के बाद रामास्वामी ने कहा कि वे आयोवा के लीडऑफ कॉकस में निराशाजनक समापन के बाद रिपब्लिकन नामांकन के लिए अपना अभियान समाप्त कर रहे हैं।

विवेक रामास्वामी ने राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनने की रेस से बाहर निकलते हुए कहा कि उनके राष्ट्रपति बनने का कोई रास्ता नहीं है, इसलिए वे अपना कैंपेन खत्म कर रहे हैं। उन्होंने आगे से ट्रंप का समर्थन करने का निश्चय किया है। कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक विवेक रामास्वामी कल ट्रम्प के साथ अमेरिका के न्यू हैम्पशायर में रैली भी करेंगे।
विवेक रामास्वामी ने कहा कि उनका यह पूरा अभियान सच बोलने पर था। भले ही उन्होंने अपेक्षित परिणाम हासिल नहीं किया। उन्होंने कहा कि व्हाइट हाउस को एक देशभक्त की जरूरत है। लोगों ने जोर से और स्पष्ट रूप से बताया दिया है कि वे किसे चाहते हैं, ऐसे में वे अपना अभियान समाप्त कर ट्रंप को अपना समर्थन दे रहे हैं।

एक्स पर एक पोस्ट में विवेक रामास्वामी ने कहा कि वे यह सुनिश्चित करने के लिए हर संभव कोशिश करेंगे कि डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के अगले राष्ट्रपति हों। उन्होंने कहा कि मुझे इस टीम, इस आंदोलन और हमारे देश पर बहुत गर्व है। रामास्वामी ने ये भी वादा किया कि अगर ट्रंप को गुंडागर्दी का दोषी ठहराया गया तो भी वह उनका समर्थन करेंगे।
ट्रंप का क्यों करेंगे समर्थन?
यह पहले से तय था कि यदि विवेक रामास्वामी राष्ट्रपति पद की रेस से बाहर जाते हैं तो वे डोनाल्ड ट्रंप का समर्थन करेंगे। इससे पहले बीते शनिवार को डोनाल्ड ट्रंप और उनकी टीम द्वारा विवेक रामास्वामी की जमकर आलोचना की गई थी लेकिन फिर भी रामास्वामी ने ट्रंप को पलटकर जवाब नहीं दिया था। उल्टे रामास्वामी ने ट्रंप को 21वीं शताब्दी का सर्वश्रेष्ट राष्ट्रपति बताया था।
अब सवाल ये है कि वे ट्रंप का समर्थन क्यों कर रहे हैं। दरअसल विवेक रामास्वामी भविष्य की ओर देख रहे हैं। उनकी उम्र महज 38 साल है। उनकी विचारधारा भी लगभग ट्रंप के विचारों के बराबर है। कई मामले में तो वे ट्रंप से अधिक रुढ़िवादी नजर आते हैं। ऐसे में उनकी सोच हो सकती है कि वे ट्रंप के बाद उनके समर्थकों को अपने पक्ष में कर सकते हैं।

पश्चिमी अखबार लिखते भी हैं कि विवेक रामास्वामी सुर्खियों में बने रहने के लिए ट्रंप की चालों को अपनाते हैं। वे भी "जलवायु परिवर्तन एजेंडा" एक "धोखा" बताते रहे हैं। यही वजह है कि अमेरिकी अखबारों में विवेक रामास्वामी के लिए "ट्रम्प का स्टैंड-इन," "ट्रम्प सरोगेट," और "ट्रम्प का उत्तराधिकारी" जैसे संबोधन व्यवहार में लाए जाते हैं।
क्यों नहीं मिला अपेक्षित समर्थन?
पिछले महीने CNN टाउन हॉल को संबोधित करते वक्त विवेक रामास्वामी ने कहा था कि वे एक प्राउड हिंदू हैं। रामास्वामी ने कहा कि उन्हें सिखाया गया है कि भगवान ने हम सबको यहां किसी मकसद से भेजा है। वे कोई फर्जी हिंदू नहीं हैं, जिसने अपना धर्म बदला हो। वे अपने राजनीतिक करियर के लिए झूठ नहीं बोल सकते।
अमेरिका में ईसाई आबादी बेहद अधिक है। उनका हिन्दुत्व को लेकर कट्टर समर्थन वहां के लोगों को पंसद नहीं आ रहा था। विरोधी रामास्वामी की धार्मिक मान्यताओं पर सवाल उठा रहे थे। कुछ रिपब्लिकन कार्यकर्ताओं ने कहा था कि रामास्वामी से उनकी हिंदू धार्मिक पृष्ठभूमि के कारण ईश्वर उनसे नफरत करते हैं।

हिन्दू होने का नुकसान
एक रूढ़िवादी ईसाई कार्यक्रम में रामास्वामी की उपस्थिति पर सवाल उठाते हुए एबी जॉनसन ने कहा कि अभी, राष्ट्रपति पद के नामांकन के लिए लड़ाई चल रही है। एक व्यक्ति है जो अभी राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के रूप में लोकप्रियता हासिल कर रहा है और उसका नाम विवेक रामास्वामी है और वह हिंदू हैं। जो हिंदू हैं वे कई देवताओं में विश्वास करते हैं।
विवेक रामास्वामी ने कहा कि ईसाई धर्म का प्रचार करने के लिहाज से वे सबसे अच्छे राष्ट्रपति नहीं हो सकते। हालांकि अमेरिकी राष्ट्रपति का ये काम नहीं होता है। मैं उन मूल्यों का जरूर पालन करूंगा, जिनपर अमेरिका की स्थापना हुई थी।












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