Vijay Diwas: 12 दिनों की छोटी लड़ाई, 93000 पाकिस्तानी सैनिकों का सरेंडर.. जानें भारत ने कैसे बनाया बांग्लादेश?
Vijay Diwas: पूरा हिंदुस्तान आज पाकिस्तान पर पराक्रम का विजय दिवस मना रहा है और आज के ही दिन, पाकिस्तान के 90 हजार से ज्यादा फौजियों ने भारत के सामने सरेंडर कर दिया था और इसी जीत का जश्न मनाने के लिए हर साल भारत और बांग्लादेश विजय दिवस मनाता है, जो 1971 के भारत-पाक युद्ध की समाप्ति और बांग्लादेश की मुक्ति का प्रतीक है। 51 साल पहले आज ही के दिन पाकिस्तान के सरेंडर करने के बाद भारत ने जीत की घोषणा की थी।
13 दिनों तक चले इस युद्ध में कैसे पाकिस्तान ने घुटने टेके थे और भारत ने कैसे पाकिस्तान को दो हिस्सों में बांट दिया था, आइये उसे हम एक बार फिर से समझते हैं।

1971 के भारत-पाक युद्ध का कारण क्या था?
1947 में ब्रिटिश शासन के अंत के बाद भारत का विभाजन हुआ और दो स्वतंत्र देश बने, भारत और पाकिस्तान। पाकिस्तान दो हिस्सों में था, पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) और पश्चिमी पाकिस्तान (वर्तमान पाकिस्तान)। दोनों पाकिस्तानों के बीच शुरू से ही कई कारणों से समस्याएं थीं - सबसे गंभीर कारण उनके बीच का भौगोलिक अलगाव था।
प्रशासन के मामले में पूर्वी पाकिस्तान की अक्सर अनदेखी की जाती थी, क्योंकि शीर्ष पदों पर पश्चिमी पाकिस्तान के लोगों का कब्जा था। सांस्कृतिक संघर्ष का भी मुद्दा था। उदाहरण के लिए, जब पश्चिमी पाकिस्तान में इस्तेमाल की जाने वाली उर्दू को, देश की आधिकारिक भाषा बनाया गया, तो इसे पूर्व में लोगों की संस्कृति पर थोपने के रूप में देखा गया।
1960 के दशक के मध्य में, शेख मुजीबुर रहमान, जिन्हें बांग्लादेश के संस्थापक (और वर्तमान प्रधान मंत्री शेख हसीना के पिता) के रूप में भी जाना जाता है, जैसे नेताओं ने सक्रिय रूप से इन नीतियों का विरोध करना शुरू कर दिया और अवामी लीग बनाने में मदद की। जल्द ही, उनकी मांग स्वतंत्रता और स्वायत्तता की बन गई। 1970 के चुनावों में अवामी लीग ने पूर्वी पाकिस्तान में 162 सीटों में से 160 सीटों पर शानदार जीत हासिल की, हालांकि अवामी लीग को पश्चिमी पाकिस्तान में कोई सीट नहीं मिली।
जुल्फिकार अली भुट्टो की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने पश्चिमी पाकिस्तान की 138 सीटों में से 81 सीटें जीतीं, लेकिन मुजीब के पास प्रधान मंत्री बनने के लिए सदन में बहुमत था। लेकिन, जनादेश को मान्यता देने के बजाय, 25 मार्च, 1971 को पाकिस्तानी सेना ने क्रूर कार्रवाई शुरू कर दी, जिसमें बंगालियों का बड़े पैमाने पर नरसंहार हुआ।
26 मार्च को अब बांग्लादेश के स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाता है।

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, बांग्लादेशी कवि दाउद हैदर ने लिखा है, कि "25 मार्च की आधी रात को, पाकिस्तान ने बांग्लादेश में नरसंहार शुरू कर दिया। जिससे भारी संख्या में शरणार्थी भागकर भारत में आये। भारत, स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में बांग्लादेश के साथ खड़ा था।"
उन्होंने लिखा है, कि "किसी को भी बांग्लादेश को मुक्ति दिलाने में इंदिरा गांधी के साथ-साथ भारतीय सेना के योगदान को सलाम करना चाहिए... पाकिस्तानी वर्चस्व ढाई दशकों तक चला और धर्म और दो-राष्ट्र सिद्धांत रास्ते में गिर गए।"
1971 के युद्ध में भारत की भूमिका
भारत ने पहले अवामी लीग के लिए समर्थन की घोषणा की थी। सीधे हस्तक्षेप के बिना भारत ने 15 मई को ऑपरेशन जैकपॉट लॉन्च किया, जो पाकिस्तानी सेना के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध में लगे मुक्ति वाहिनी सेनानियों की भर्ती, प्रशिक्षण, हथियार, लैस, आपूर्ति और सलाह देने के लिए एक ऑपरेशन था।
वहां एक कूटनीतिक योजना भी शामिल थी। पूर्व राजनयिक चन्द्रशेखर दासगुप्ता, जो 1972 में बांग्लादेश में तैनात थे, उन्होंने अपनी पुस्तक इंडिया एंड द बांग्लादेश लिबरेशन वॉर: द डेफिनिटिव स्टोरी में लिखा है, कि "विदेश मंत्रालय का पहला काम बांग्लादेश के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहानुभूति और समर्थन को बढ़ावा देना था... बेशक, बांग्लादेशी स्वयं इसे बहुत प्रभावी ढंग से कर रहे थे, लेकिन हमने उन्हें प्रमुख रूप से सहायता प्रदान की।"
दूसरा काम था "अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को यह समझाना, कि पूर्वी बंगाल की समस्या केवल पाकिस्तान की आंतरिक समस्या नहीं है, बल्कि भारत में लाखों शरणार्थियों को खदेड़कर, पाकिस्तान भारत में एक घरेलू समस्या का निर्यात कर रहा था। और, इससे पड़ोसी राज्यों में राजनीतिक स्थिति अस्थिर होने का खतरा है।"
दासगुप्ता ने कहा, कि "अगर भारत ने विदेशी नजरों में कार्रवाई को स्पष्ट रूप से उचित ठहराए बिना हस्तक्षेप किया होता, तो यह आरोप स्थापित हो जाता, कि भारत ने पाकिस्तान को तोड़ने की योजना बनाया और नतीजा ये होता, कि बांग्लादेश को अधिकांश देशों द्वारा मान्यता देने से इनकार कर दिया जाता।"
लेकिन, जब 3 दिसंबर 1971 को पाकिस्तानी वायु सेना ने पश्चिमी भारत (अमृतसर, पठानकोट, श्रीनगर, अवंतीपुरा, अंबाला, सिरसा और आगरा सहित) की तरफ हमले शुरू किए, तो भारत ने औपचारिक रूप से 4 दिसंबर को युद्ध की घोषणा कर दी।
तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने एक रेडियो संबोधन में कहा, "हमारे पास अपने देश को युद्ध स्तर पर खड़ा करने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं है। हमारे बहादुर अधिकारी और जवान अपनी पोस्ट पर देश की रक्षा के लिए जुटे हुए हैं। पूरे भारत में आपातकाल की घोषणा कर दी गई है। हर आवश्यक कदम उठाया जा रहा है, और हम किसी भी स्थिति के लिए तैयार हैं।"

भारत की पाकिस्तान पर जीत
युद्ध, जो छोटा मगर काफी आक्रामक था, वो 13 दिनों तक पूर्वी और पश्चिमी, दोनों मोर्चों पर लड़ा गया था। दक्षिणी सेना की जिम्मेदारी वाले क्षेत्र में जो उल्लेखनीय लड़ाइयां लड़ी गईं, उनमें लोंगेवाला और परबत अली की प्रसिद्ध लड़ाइयां शामिल थीं, जहां भारतीय सैनिकों ने पाकिस्तान की बख्तरबंद सेनाओं को नष्ट कर दिया था।
एक सरकारी विज्ञप्ति में कहा गया है, कि जोधपुर राज्य के तत्कालीन शासक लेफ्टिनेंट कर्नल (बाद में ब्रिगेडियर) भवानी सिंह के नेतृत्व में प्रसिद्ध 10 पैरा कमांडो बटालियन के सैनिकों द्वारा पाकिस्तानी शहर चाचरो पर छापा मारा गया, जो एक और प्रसिद्ध सैन्य कार्रवाई थी।
इस युद्ध में एक महत्वपूर्ण व्यक्ति भारत के फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ थे, जिनका अक्सर इसके संबंध में उल्लेख किया जाता है। उनकी योजना और रणनीति ने हाल के सैन्य इतिहास में सबसे तेज जीत हासिल करने में भारी मदद की थी।
6 दिसंबर को भारत ने औपचारिक रूप से बांग्लादेश को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता दी। दो दिन बाद, भारतीय नौसेना ने कराची पर हमला किया। 12 से 16 दिसंबर तक, भारतीय सेनाएं ढाका की ओर बढ़ीं और शहर में प्रवेश कर गईं, जिससे युद्ध पूरी तरह से जीत के साथ ये लड़ाई खत्म होने की तरफ बढ़ गई।
पाकिस्तान पूर्वी कमान के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल एएके नियाज़ी ने आत्मसमर्पण के दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर किए और भारतीय पूर्वी कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के सामने आत्मसमर्पण कर दिया और इस तरह से 16 दिसंबर, हमेशा के लिए भारतीय इतिहास में दर्ज हो गया, जब पाकिस्तान के 93 हजार सैनिकों ने भारत के सामने आत्म समर्पण कर दिया और ये लड़ाई खत्म हो गई।
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