वैज्ञानिकों ने खोजा ओमिक्रॉन का तोड़, भविष्य के वेरिएंट को भी रोकने वाली एंटीबॉडी का पता चला
वॉशिंगटन, 29 दिसंबर: अमेरिकी शोधकर्ताओं को ओमिक्रॉन और भविष्य में पैदा होने वाले नए वेरिएंट को भी बेअसर करने की एक उम्मीद दिखी है। उन्होंने कुछ ऐसी एंटीबॉडी का पता लगाया है, जो इस तेजी से फैलने वाले कोरोना वायरस को रोकने में सक्षम हो सकता है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि उनका शोध न सिर्फ और ज्यादा कारगर नई वैक्सीन बनाने में मदद कर सकता है, बल्कि एंटीबॉडी ट्रीटमेंट में भी काम आ सकता है। यह शोध जर्नल नेचर में प्रकाशित हुआ है। गौरतलब है कि भारत समेत दुनियाभर के देश, खासकर अमेरिका और यूरोप इस समय ओमिक्रॉन की लहर के चलते त्राहि-त्राहि कर रहे हैं।

वैज्ञानिकों ने खोजा ओमिक्रॉन का तोड़
अमेरिकी वैज्ञानिकों ने ऐसी एंटीबॉडी की पहचान की है, जो ओमिक्रॉन और कोरोना वायरस के दूसरे वेरिएंट को भी वायरस के उस क्षेत्र को टारगेट करके बेअसर कर सकते हैं जो म्यूटेशन के दौरान अनिवार्य रूप से अपरिवर्तित रहते हैं। यह शोध जर्नल नेचर में प्रकाशित हुआ है, जिससे वैक्सीन तैयार करने और एंटीबॉडी इलाज में मदद मिल सकती है। यह न केवल ओमिक्रॉन के खिलाफ प्रभावी होगा, बल्कि भविष्य में पैदा होने वाले संभावित दूसरे वेरिएंट पर भी कारगर होगा। अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ वॉशिंगटन स्थित स्कूल ऑफ मेडिसिन में एसोसिएट प्रोफेसर डेविड वेसलर ने कहा है, 'यह खोज हमें बताती है कि ऐसी एंटीबॉडी पर फोकस करके, जो स्पाइक प्रोटीन के हाइली कंजर्व्ड साइट को टारगेट करता है, इस वायरस के लगातार बदलाव से छुटकारा पाया जा सकता है। '

स्पाइक प्रोटीन के बर्ताव पर हो रहा था रिसर्च
ओमिक्रॉन वेरिएंट के स्पाइक प्रोटीन में असामान्य रूप से म्यूटेशन की संख्या 37 है, जिसे मानव की कोशिकाओं को संक्रमित करने के लिए वायरस इस्तेमाल करता है। माना जा रहा है कि इसी वजह से यह वेरिएंट इतनी तेजी से फैल रहा है और वैक्सीन ले चुके लोगों और पहले से संक्रमित हो चुके लोगों को भी यह फिर से संक्रमित कर रहा है। डेविड के मुताबिक 'हम जिस मुख्य सवाल का जवाब ढूंढ़ने की कोशिश कर रहे थे, वह यह था कि कैसे ओमिक्रॉन वेरिएंट की स्पाइक प्रोटीन में म्यूटेशन का यह समूह कोशिकाओं से लिपटने और प्रतिरक्षा प्रणाली की एंटीबॉडी प्रतिक्रियाओं से बचने के लिए इसकी क्षमता को प्रभावित करता है '
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सभी तरह के लोगों की एंटीबॉडी पर हुआ रिसर्च
इसके लिए शोधकर्ताओं ने पहले कोविड के विभिन्न वेरिएंट से ठीक हुए मरीजों की एंटीबॉडी का इस्तेमाल किया, जिन्हें पहले के वेरिएंट के लिए वैक्सीन लग चुकी है, उनकी एंटीबॉडी का प्रयोग किया या उनकी भी एंटीबॉडी पर भी रिसर्च किया जो संक्रमित होने के बाद वैक्सीन भी लगवा चुके हैं। टीम ने पाया कि उन सभी लोगों में जो पहले के स्ट्रेन से संक्रमित हो चुके थे और जो मौजूदा प्रचलित 6 वैक्सीन की डोज लगवा चुके थे, उनमें इस इंफेक्शन (ओमिक्रॉन) को रोकने की क्षमता कम थी। जो लोग कोविड से संक्रमित होकर ठीक हो गए थे और दोनों डोज वैक्सीन भी लगवा चुके थे, उनकी भी इंफेक्शन रोकने की क्षमता कम थी, लेकिन फिर भी वे पहले वालों के मुकाबले ज्यादा बेहतर स्थिति में थे। इससे स्पष्ट होता है कि संक्रमण के बाद वैक्सीनेशन असरदार है।

चार सक्षम एंटीबॉडी का पता चला है
इस ग्रुप में गुर्दे की डायलिसिस करवाने वाले उन लोगों की एंटीबॉडी जिन्हें मॉडर्ना और फाइजर की एमआरएनए वैक्सीन की बूस्टर डोज लगी थी, उसमें ओमिक्रॉन के संक्रमण को निष्क्रिय करने की क्षमता में सिर्फ 4 गुना की कमी आई थी। डेविड ने कहा है, 'इससे जाहिर है कि तीसरी डोज निश्चित तौर पर ओमिक्रॉन के खिलाफ कारगर है।' शोधकर्ताओं ने कोरोना वायरस के पहले के वेरिएंट के खिलाफ पैदा हुई एंटीबॉडी के विशाल पैनल में से चार एंटीबॉडी की श्रेणियों की पहचान की है, जिसमें ओमिक्रॉन को बेअसर करने की क्षमता दिखी है। शोध से यह पता चला है कि ये एंटीबॉडी वैक्सीन तैयार करने के साथ-साथ एंटीबॉडी इलाज में भी काम आ सकते हैं, जो कि अन्य वेरिएंट के खिलाफ भी काम कर सकते हैं।












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