US Election: मोदी की तारीफ करने के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने खाई भारत से बदला लेने की कसम, किस बात से हैं आगबबूला?

In a surprising shift, Donald Trump praised PM Narendra Modi but later vowed to impose tariffs on India, citing its high trade barriers. This comes ahead of the US elections, highlighting ongoing trade tensions.

Donald Trump India: अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसी हफ्ते भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अपना 'दोस्त' बताते हुए उनकी जमकर तारीफ की थी, लेकिन दो दिनों के बाद ही डोनाल्ड ट्रंप के बोल बदल गये और उन्होंने भारत 'जैसे को तैसा' जवाब देने की 'कसम' खाई है।

अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव से पहले भारत को "टैरिफ किंग" और "व्यापार का दुरुपयोग करने वाला" कहने के बाद, रिपब्लिकन उम्मीदवार और पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अब अगले महीने राष्ट्रपति पद के लिए चुने जाने पर भारत के खिलाफ पारस्परिक टैक्स लगाने की कसम खाई है।

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टैक्स को लेकर भारत पर भड़के डोनाल्ड ट्रंप

डेट्रोइट में बोलते हुए डोनाल्ड ट्रंप ने कहा, कि टैरिफ के मामले में अमेरिका उदार है, लेकिन चीन, ब्राजील और भारत जैसे देश हाई टैरिफ लगाते हैं। उन्होंने कहा, कि भारत सबसे ज्यादा टैरिफ लगाता है और अमेरिकी व्यवसायों ने भारतीय बाजार में हाई टैरिफ को एक चुनौती बताया है।

पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप ने गुरुवार को कहा, कि "शायद अमेरिका को फिर से असाधारण रूप से समृद्ध बनाने की मेरी योजना का सबसे महत्वपूर्ण एलिमेंट पारस्परिकता है। यह एक ऐसा शब्द है, जो मेरी योजना में बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि हम आम तौर पर टैरिफ नहीं लगाते हैं। मैंने यह प्रक्रिया शुरू की, यह वैन और छोटे ट्रकों जैसे प्रोडक्ट्स के साथ बहुत बढ़िया रही।"

उन्होंने आगे कहा, कि "हम वास्तव में शुल्क नहीं लगाते हैं। चीन हमसे 200 प्रतिशत टैरिफ वसूलता है। ब्राजील एक बड़ा चार्जर है। सबसे बड़ा चार्जर भारत है।"

अपने राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान हार्ले-डेविडसन मोटरसाइकिल के प्रतिनिधियों के साथ अपनी बैठक को याद करते हुए ट्रंप ने कहा, कि कंपनी ने भारत में व्यापार करने के लिए 150 प्रतिशत टैरिफ को एक प्रमुख चुनौती बताया था।

आपको बता दें, कि हार्ले-डेविडसन ने भारत में पैर जमाने के लिए करीब 10 सालों तक कोशिश की, लेकिन वो बुरी तरह से नाकाम रहा था और उसने 2020 में भारत में अपनी बिक्री और मैन्युफैक्चरिंग ऑपरेशंस को बंद कर दिया।

ट्रंप ने डेट्रॉइट इकोनॉमिक क्लब के सदस्यों को बताया, कि "भारत एक बहुत बड़ा चार्जर है। भारत के साथ हमारे बहुत अच्छे संबंध हैं। मेरे अच्छे संबंध थे। और विशेष रूप से नरेन्द्र मोदी के साथ। वह एक महान नेता हैं... मुझे लगता है, कि वे शायद कई मायनों में चीन से ज्यादा शुल्क लेते हैं। लेकिन वे इसे मुस्कुराते हुए करते हैं।"

भारत-अमेरिका में टैरिफ को लेकर क्या है विवाद?

टैरिफ को लेकर यहां तीन मुद्दे हैं।

पहला, यह एक फैक्ट है, कि भारत में औसत टैरिफ लगातार बढ़ रहे हैं - 2014 में औसत 13 प्रतिशत से 2022 में 18.1 प्रतिशत तक बढ़ चुके हैं।

दूसरा, अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापार साझेदार है और दोनों देशों का कुल द्विपक्षीय व्यापार वित्त वर्ष 2024 में 120 अरब डॉलर के करीब है, और जबकि भारत अपने दस शीर्ष व्यापारिक साझेदारों में से नौ के साथ माल व्यापार घाटे में चल रहा है, अमेरिका एकमात्र प्रमुख अर्थव्यवस्था है जिसके लिए भारत आयात से अधिक निर्यात करता है।

यानि, अमेरिका एकमात्र देश है, जहां से भारत सामान खरीदता कम, और बेचता ज्यादा है।

तीसरा, डोनाल्ड ट्रंप, जो अकसर टैरिफ को लेकर बयानबाजी करते रहते हैं और आरोप लगाते रहते हैं, कि अन्य देश अमेरिका को अत्यधिक शोषण करते हैं, ये बात सही है।

हालांकि, भारतीय नीति निर्माताओं ने तर्क दिया है, कि अधिकांश देशों ने विकास के शुरुआती चरणों में अपने घरेलू उद्योगों को अत्यधिक स्तर पर सुरक्षा प्रदान की है और भारत भी घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए ऐसा करने में अलग नहीं है।

नई दिल्ली ने 14 प्राथमिकता वाले क्षेत्रों के लिए प्रोडक्शन से जुड़ी प्रोत्साहन योजनाएं शुरू की हैं और स्थानीय उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए विदेशी कंपनियों पर हाई टैरिफ का उपयोग करता है, जिसे चिप्स अधिनियम और मुद्रास्फीति न्यूनीकरण अधिनियम सहित वाशिंगटन द्वारा शुरू की गई समान योजनाओं से बहुत अलग नहीं माना जाता है।

यानि, भारतीय कंपनियां, विदेशी कंपनियों से मुकाबला कर सके, और विदेशी कंपनियां सस्ते दर पर भारत में सामान बेच नहीं पाए, और भारतीय कंपनियों के प्रोडक्ट, विदेशी कंपनियों के प्रोडक्ट की तुलना में महंगा ना लगे, इसलिए भारत टैरिफ का सहारा लेता है। और भारत की इस नीति ने डोनाल्ड ट्रंप को हमेशा से नाराज किया और उनके पहले कार्यकाल के दौरान भी इस मुद्दे को लेकर दोनों देशों में विवाद हुआ था।

टैरिफ पर डोनाल्ड ट्रंप की टिप्पणी ऐसे समय में आई है, जब वैश्विक स्तर पर देश घरेलू बाजारों में नौकरी के नुकसान के डर से चीनी आयात के खिलाफ सुरक्षात्मक उपाय कर रहे हैं। इसमें अमेरिका भी शामिल है, जिसने टैरिफ बाधाओं को बढ़ा दिया है, जिसमें चीन को टारगेट किया गया है।

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सोमवार को विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा था, कि पिछले 25 वर्षों में ग्लोबलाइजेशन के प्रभावों में से एक 'नौकरी का नुकसान' और कई समाजों में जीवन की गुणवत्ता से असंतोष है, क्योंकि व्यापार न केवल वैश्वीकृत हुआ है बल्कि हथियारबंद भी हुआ है।

इस महीने की शुरुआत में, अमेरिका ने इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) जैसे नए क्षेत्रों को टारगेट करते हुए नए टैरिफ लगाए हैं। अमेरिका ने इलेक्ट्रिक गाड़ियों पर इसलिए टैरिफ लगाए हैं, क्योंकि चीन की सरकार ने यूरोपीय बाजारों में चीनी इलेक्ट्रिक कारों को काफी कम कीमत बेचने पर भारी सब्सिडी देना शुरू कर दिया है, जिसका नतीजा ये हुआ है, कि पश्चिमी देशों की कार कंपनियों की तुलना में चीनी कारें काफी सस्ती हो गई हैं और जाहिर तौर पर इसका असर बाजार पर पड़ा है और इससे निपटने के लिए अमेरिका ने चीनी इलेक्ट्रिक गाड़ियों पर भारी-भरकम टैरिफ लगा दिया है।

क्लीन एनर्जी और हाई टेक्नोलॉजी क्षेत्रों में चीनी उत्पादों की एक नई लहर- जिसे चाइना शॉक 2.0 कहा जाता है - उसने भारत सहित कई क्षेत्रों में नौकरी के बड़े खतरे को जन्म दिया है। पहला झटका तब लगा, जब 2001 में चीन के WTO में प्रवेश के बाद सस्ते चीनी सामान वैश्विक बाजारों में भर गए, जिसके परिणामस्वरूप दुनिया भर में नौकरियां चली गईं।

चाइना शॉक का मतलब ये है, कि चीन के घरेलू बाजार में सामानों की बिक्री काफी कम हो गई है और इससे निपटने के लिए वो वैश्विक बाजार में कम कीमत पर भारी मात्रा में सामान झोंक रहा है, जिसका गंभीर असर ग्लोबल मार्केट पर पड़ा है और दुनियाभर की सरकारें इससे निपटने के लिए काम कर रही हैं।

इस बीच, यूरोपीय स्टील निर्माताओं ने भी बढ़ते चीनी आयात पर चिंता जताई है। फाइनेंशियल टाइम्स ने पिछले महीने रिपोर्ट की थी, कि यूरोपीय स्टील निर्माताओं ने व्यापार अधिकारियों से चीनी स्टील निर्यात में वृद्धि को संबोधित करने की अपील की है, जिसने यूरोपीय कीमतों को उत्पादन लागत से नीचे पहुंचा दिया है। भारतीय स्टील निर्माताओं ने भी सरकार से चीनी स्टील पर एंटी-डंपिंग शुल्क लगाने के लिए कहा है, क्योंकि उद्योग में मुनाफा काफी कम हो गया है।

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