Ukraine Peace Summit: स्विट्जरलैंड में ऐसा क्या हुआ कि भारत ने साझा बयान से बना ली दूरी, निभाई रूस से दोस्ती
Ukraine Peace Summit: यूक्रेन और रूस के बीच चल रहे युद्ध को लेकर स्विट्जरलैंड में अंतरराष्ट्रीय शांति सम्मेलन का आयोजन किया गया। लेकिन एक बार फिर से भारत ने दुनिया के दबाव में आए बगैर इसमे हिस्सा नहीं लिया और शांति सम्मेलन के साझा बयान पर साइन करने से इनकार कर दिया।
भारत के अलावा सउदी अरब, अर्मेनिया, ब्राजील, स्लोवाकिया, यूएई, दक्षिण अफ्रीका,ने भी साझा बयान पर साइन करने से मना कर दिया। इस शांति समझौते से भारत ने जिस तरह से दूरी बनाई उसपर रूस ने खुशी जाहिर की है।

यूक्रेन और रूस के बीच पिछले 2 वर्ष तीन महीने से युद्ध चल रहा है। पूरी दुनिया इस युद्ध को खत्म होते देखना चाहती है। लेकिन रूस और यूक्रेन ने स्पष्ट कर दिया है कि वह 10 साल भी युद्ध करने के लिए तैयार हैं।
लेकिन जिस तरह से यह युद्ध इतने समय से चल रहा है, उसे देखते हुए दुनिया के तमाम देशों ने एक न्यूट्रल देश में इस मसले का हल निकालने के लिए एकत्रित होने का फैसला लिया। स्विट्जरलैंड की बात करें तो दोनों ही विश्वयुद्ध में स्विट्जरलैंड न्यूट्रल रहा। यही वजह है कि यहां पर यूक्रेन पीस समिट आयोजित करने का फैसला लिया।
हालांकि इस समिट में हिस्सा लेने के लिए दुनियाभर के देशों को बुलाया गया, लेकिन रूस को ही इस समिट में हिस्सा लेने से प्रतिबंधित कर दिया गया। इस समिट से चीन ने भी खुद को दूर रखा। चीन का कहना था कि रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध रोकने के लिए हो रही समिट में अगर रूस को ही नहीं बुलाया जाएगा तो इस समिट का कोई अर्थ नहीं है।
भारत ने अपनाया कूटनीतिक रास्ता
रूस भारत का मित्र देश है, ऐसे में भारत के सामने बड़ा सवाल था कि क्या वह इस समिट में हिस्सा ले या नहीं। भारत ने इस मसले पर कूटनीतिक रास्ता अख्तियार करते हुए फैसला लिया कि इस समिट में ना तो प्रधानमंत्री और ना ही विदेश मंत्री हिस्सा लेंगे। बल्कि विदेश मंत्रालय के सचिव पवन कपूर ने इस समिट में हिस्सा लिया।
इस समिट के शुरू होने के बाद भारत का यह फैसला सही साबित नजर आया। दरअसल इस समिट में युद्ध को रोकने पर चर्चा की बजाए, तमाम यूरोपीय देश रूस को धमकियां देते नजर आए।
जॉर्जिया मेलोनी की रूस को धमकी
इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने कहा कि अगर रूस ने यूक्रेन से अपनी सेना नहीं निकाली तो हम रूस को सरेंडर करने पर मजबूर कर देंगे। पोलैंट ने कहा कि रूस को हम 200 देशों में बांट देंगे। ऐसे में जिस तरह से रूस के खिलाफ बयान दिया जा रहा था, उससे साफ था कि यह समिट युद्ध को रोकने पर चर्चा के लिए नहीं है।
हालांकि रूस ने अपनी ओर से शांति समझौते का प्रस्ताव भेजा और कहा कि हम जिन इलाके पर नियंत्रण किया है, वह हमारा, यूक्रेन नाटो में शामिल नहीं होगा। अगर इन शर्तों को मान लिया जाए तो यह युद्ध समाप्त हो सकता है। लेकिन रूस के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया गया।
शांति समझौता नहीं साइन करने की वजह
यूक्रेन शांति समझौते में जो शर्ते थीं उसमे मुख्य रूप से रूस को सेना पीछे हटाने के लिए कहा गया है। लेकिन भारत, सउदी अरब समेत कई देशों ने इस समझौते पर साइन करने से मना कर दिया।
भारत के विदेश मंत्रालय के सचिव पवन कुमार ने कहा कि हमारा मानना है कि हम किसी भी दस्तावेज से खुद को नहीं जोड़ेंगे क्योंकि समिट में कुछ भी ऐसा नहीं हो रहा है जिससे युद्ध खत्म हो सकें।
भारत का सधा हुआ रुख
इस पूरे समिट पर भारत ने काफी सधा हुआ रास्ता अख्तियार किया। भारत ने चीन की तरह इसे पूरी तरह से खारिज भी नहीं किया और शांति समझौते पर साइन करने से इनकार कर दिया।
इस समिट पर फिलिपींस को छोड़कर तमाम ब्रिक देश, अफ्रीकी देशों ने भी साइन नहीं किया है। ऐसे में इस समिट को फेल समिट कहा जा रहा है। स्विट्जरलैंड के राइट विंग के नेताओं ने भी इस समिट को विफल करार दिया है।












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