• search
क्विक अलर्ट के लिए
नोटिफिकेशन ऑन करें  
For Daily Alerts

पाकिस्तान के वो हिंदू जो रखते हैं रोज़ा

By Bbc Hindi

मठ्ठी
BBC
मठ्ठी

मोहनलाल मालही बचपन से दरगाह क़ासिम शाह के मानने वाले हैं लेकिन चाचा के इंतकाल के बाद अब वो इस मज़ार के मजाविर (केयरटेकर) बन गए हैं.

पाकिस्तान के थार रेगिस्तान के मठ्ठी शहर के बीचोंबीच स्थित इस दरगाह पर रमज़ान के महीने में रोज़ेदारों के लिए इफ़्तार का इंतज़ाम किया जाता है.

दरगाह के अंदर ही रसोई है जहां हिंदू मालही बिरादरी के नौजवान खुद आलू और चने से वेज बिरयानी बनाते हैं. मोहनलाल मालही खुद पूरे रमज़ान रोज़े रखते हैं.

और जबकि उनके घरवाले हजरत अली की शहादत के दिन (यानी 21वें रोज़े के दिन) और 27वें दिन रोज़ा रखते हैं.

मोहनलाल ने तीसरी जमात से रोज़े रखना शुरू कर दिया था.

मालही बिरादरी के लोग मठ्ठी शहर में किसी ज़माने में कुओं से मश्कों (घड़ों) के जरिए पानी भरकर लोगों तक पानी पहुंचाते थे.

बाद में जब शहर विकसित होने लगा तो उनके कुएं शहर के बीचोंबीच हो गए और उनकी प्रॉपर्टी की कीमतें बढ़ गईं और वो आहिस्ता-आहिस्ता कारोबारी बन गए.



मठ्ठी
BBC
मठ्ठी

मालही बिरादरी खुशहाल है...

मठ्ठी के इस दरगाह पर 30-35 साल पहले यहां पर एक पेड़ था और एक कब्र भी बनी हुई थी जो भी कोई श्रद्धालू यहां आता, उसकी मन्नत पूरी हो जाती और वो खूब सारा चढ़ावा देकर चला जाता.

मोहनलाल बताते हैं, "उन दिनों में हमारी बिरादरी के पास कुछ नहीं था. पांच पैसे का चढ़ावा भी चढ़ाते थे. और अब जब कि बिरादरी खुशहाल है तो आज भी हम चढ़ावे में कोई कसर नहीं रखते. कोई चावल की देग दे देता है कोई पानी का टैंकर भेज देता है तो कोई बर्फ़ का बंदोबस्त कर देता है."

शाम से ही बच्चे मज़ार के इर्द-गिर्द जमा होना शुरू हो जाते हैं और बेखौफ़ वहां रात नौ बजे तक रहते हैं.

मोहनलाल के अनुसार क़ासिम शाह को बच्चों से बहुत लगाव था और इसी सिलसिले को आज तक यहां जारी रखा गया है.

पारंपरिक साड़ी और चोली-घाघरा पहनी महिलाएं भी मज़ार के पास आती हैं और इफ्तार के समय तक मौजूद रहती हैं.

थार के हिंदू और मुसलमान ईद की खुशी और मोहर्रम का मातम मिलकर साथ मनाते हैं. उसी तरह दिवाली और होली भी यहां के हिंदू-मुसलमान मिलकर मनाते हैं.

मोहनलाल का कहना है कि यहां धर्म के नाम पर कोई भेदभाव नहीं है.

वो कहते हैं माता-पिता ने एक शिक्षा दी थी जो मोहब्बत का संदेश था कि ये तेरा मामा है, ये तेरा चाचा है... ये नहीं बोला कि ये मुसलमान है या हिंदू है सिख है या ईसाई... आज भी हम सभी यहां भाइयों की तरह रहते हैं.



मठ्ठी
BBC
मठ्ठी

दरगाह का लंगर

स्थानीय लोगों की मदद से दरगाह का लंगर चलता है. रमज़ान में मुसलमान और हिंदू यहां घरों से फल और दूसरी चीज़ें भेज देते हैं.

दरगाह का रोज़मर्रा का काम देखने वाले धारूमल लोगों को खाना खिलाते हैं, इफ्तार कराते हैं.

धारूमल मालही कहते हैं, "यहां हिंदू-मुस्लिम का चक्कर नहीं है. यहां मुस्लिम भी भाई है और हिंदू भी भाई है. यहां एक ही नाम है, हमारे मुर्शीद क़ासिम शाह मुसलमान हैं. जब हम उन्हें मानते हैं तो उनके धर्म के लोगों को कैसे नहीं मानें."

मठ्ठी शहर में एक दर्जन के करीब मुसलमान बुजुर्गों की दरगाहें हैं और सभी की देखभाल हिंदू बिरादरी के लोग करते हैं.

मुसलमान बकरीद के मौके पर हिंदू भाइयों की धार्मिक भावनाओं का ख्याल रखते हुए गाय की कुर्बानी नहीं करते.

कुछ कट्टरपंथी संगठनों ने गाय की कुर्बानी करने की कोशिश की थी लेकिन स्थानीय मुसलमानों ने ही इसे नाकाम कर दिया.

शहर में आज भी गाय का गोश्त नहीं बेचा जाता है.

BBC Hindi
देश-दुनिया की ताज़ा ख़बरों से अपडेट रहने के लिए Oneindia Hindi के फेसबुक पेज को लाइक करें
English summary
Those Hindus from Pakistan who keep Roza
तुरंत पाएं न्यूज अपडेट
Enable
x
Notification Settings X
Time Settings
Done
Clear Notification X
Do you want to clear all the notifications from your inbox?
Settings X
X