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तालिबानी नेताओं का पहली बार चीन दौरा, अफगानिस्तान में मिला संपूर्ण समर्थन, जानिए इस दोस्ती के मायने

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बीजिंग, जुलाई 28: अफगानिस्तान की शांति प्रक्रिया को लेकर चीन ने बहुत बड़ा चाल चलते हुए तालिबान को समर्थन करने का ऐलान कर दिया है। ऐसा पहली बार हुआ है जब तालिबानी नेताओं ने चीन का दौरा किया है।
मुल्ला अब्दुल गनी बरादर के नेतृत्व में एक तालिबान प्रतिनिधिमंडल ने बुधवार को चीन में विदेश मंत्री वांग यी से मुलाकात की है और माना जा रहा है कि चीन ने तालिबान को समर्थन दे दिया है।

बदल जाएगी अफगानिस्तान की स्थिति?

बदल जाएगी अफगानिस्तान की स्थिति?

इसी महीने ग्लोबल टाइम्स ने अपनी संपादकीय में कहा था कि तालिबान से दुश्मनी चीन के हक में नहीं है और उसी के बाद तालिबानी नेताओं ने चीन का दौरा किया है। जिसमें पूर्वी तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट यानि ETIM की गतिविधियों पर बीजिंग की बढ़ती चिंताओं को लेकर बातचीत की गई है। तालिबान ने पहले ही चीन को आश्वासन दे दिया था कि वो शिनजियांग के मुस्लिमों में बढ़ते कट्टरपंथ को लेकर चुप रहेगा और चीन जो उइगर मुस्लिमों के खिलाफ कार्रवाई कर रहा है, उसपर वो खामोश रहेगा, जिसके बाद माना जा रहा है कि तालिबान और चीन के बीच में अफगानिस्तान को लेकर समझौता हो गया है।

ग्लोबल टाइम्स ने जारी की तस्वीर

ग्लोबल टाइम्स ने जारी की तस्वीर

अफगानिस्तान की मौजूदा स्थिति को लेकर तालिबानी नेताओं का चीन दौरा काफी अहम माना जा रहा है। हालांकि, चीनी पक्ष या तालिबान की तरफ से अभी तक नहीं कहा गया है कि इस बैठक का उद्येश्य क्या था और किन मुद्दों पर बातचीत हुई है। तालिबान के प्रतिनिधिमंडल के साथ वांग की कई तस्वीरें, जिनमें प्रवक्ता सुहैल शाहीन भी शामिल थे, सोशल मीडिया पर पोस्ट की गईं हैं। आपको बता दें कि मुल्ला अब्दुल गनी बरादर कतर में तालिबान के राजनीतिक कार्यालय के प्रमुख हैं और अमेरिका के साथ तालिबान की वार्ता में प्रमुख भूमिका निभा रहे थे। रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने चीन के उत्तरी शहर तियानजिन में चीनी विदेश मंत्री वांग यी से मुलाकात की है।

तालिबान को मिला चीन का साथ?

तालिबान को मिला चीन का साथ?

यह पहली बार है जब तालिबान के वरिष्ठ नेता ने चीन का दौरा किया है, क्योंकि तालिबान ने पूरे अफगानिस्तान पर कब्जा करने के लिए काफी आक्रामकता दिखाई है और अमेरिकी रिपोर्ट में कहा गया है कि तालिबान ने अफगानिस्तान में करीब 200 जिलों पर कब्जा कर लिया है। वहीं, अफगान सेना फिर से नियंत्रण हासिल करने की कोशिश कर रही है। इससे पहले चीन ने 2019 में तालिबान के एक प्रतिनिधिमंडल की मेजबानी की थी, जो अफगानिस्तान के विशेष दूत डेंग ज़िजुन से मिला था। चीनी अधिकारियों ने इससे पहले अफगानिस्तान, अमेरिका और पाकिस्तान के प्रतिनिधियों के साथ तालिबान के साथ बातचीत में भाग लिया था, लेकिन इसके परिणामस्वरूप राजनीतिक समाधान खोजने के प्रयासों में कोई प्रगति नहीं हुई थी।

मुलाकात के पीछे पाकिस्तान का हाथ?

मुलाकात के पीछे पाकिस्तान का हाथ?

रिपोर्ट के मुताबिक तालिबानी नेता मुल्ला बरादर ने चीन को आश्वासन दिया है कि अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल वो चीन के खिलाफ नहीं होने देगा। वहीं, माना जा रहा है कि तालिबानी नेताओं के चीन दौरे के पीछे पाकिस्तान का हाथ है। कुछ समय पहले पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी और आईएसआई चीफ फैज हामिद ने भी चीन का दौरा किया था और चीनी विदेश मंत्री से मुलाकात की थी। पाकिस्तान लगातार तालिबान के संपर्क में रहता है। वहीं, तालिबान ने चीन के शिनजियांग सीमा से सटे अफगानिस्तानी इलाकों पर कब्जा कर लिया है, लिहाजा चीन को डर है कि कहीं चीन में भी इस्लामी आतंक शुरू ना हो जाए, लिहाजा चीन ने तालिबान के साथ हाथ मिला लिया है।

अफगानिस्तान में फायदा देखता चीन

अफगानिस्तान में फायदा देखता चीन

जून में अपने अफगान और पाकिस्तानी समकक्षों के साथ एक बैठक में चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने "तालिबान को राजनीतिक मुख्यधारा में वापस लाने" की कसम खाई थी और अंतर-अफगान शांति वार्ता की मेजबानी करने की पेशकश भी की थी। वहीं, 24 जुलाई को चीन में वांग यी और उनके पाकिस्तानी समकक्ष शाह महमूद कुरैशी के बीच एक बैठक में दोनों पक्ष अफगानिस्तान में बिगड़ती सुरक्षा स्थिति से निपटने के लिए एक साथ काम करने के लिए तैयार हुए थे और उसी का परिणाम तालिबानी प्रतिनिधियों का चीन दौरा है।

चीन को आतंकवाद का डर

चीन को आतंकवाद का डर

यूनाइटेड नेशंस की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक चमरपंथी संगठन ETIM के अफगानिस्तान में कई सौ लड़ाके हैं, जो मुख्य रूप से बदख्शां और पड़ोसी प्रांतों में काफी एक्टिव हैं। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में कहा गया है कि ईटीआईएम शिनजियांग में एक उइगर राज्य स्थापित करना चाहता है, और चीन में अशांति फैलाने के लिए अपने लड़ाकों को चीन में भेजना चाहता है। ऐसी रिपोर्ट है कि ईटीआईएम के अल-कायदा, इस्लामिक स्टेट-खुरासन और जमात अंसारुल्लाह के साथ संबंध हैं और इस समूह के डिप्टी कमांडर हाजी फुरकान बदख्शां प्रांत में 400 से एक हजार के बीच में आतंकियों का मुखिया है, जिसका मकसद चीन में उइगर मुस्लिमों को सहयोग पहुंचाना है। लिहाजा चीन चाहता है कि तालिबान उसके खिलाफ आतंकी संगठन का इस्तेमाल नहीं होने दे। आपको बता दें कि ईटीआईएम अफगानिस्तान में चीन की मुख्य चिंता बनी हुई है और चीन किसी भी तरीके से इस संकट से निपटना चाहता है।

ग्लोबल टाइम्स की संपादकीय में संकेत

ग्लोबल टाइम्स के संपादक ने अपने संपादकीय में लिखा है कि 'वास्तविक स्थिति ये है कि अब अमेरिका ने भी तालिबान को एक आतंकी संगठन कहना बंद कर दिया है और उससे बातचीत में शामिल है। ब्रिटिश रक्षा मंत्री बेन वालेस ने हाल ही में कहा था कि अगर अफगानिस्तान में तालिबान सत्ता में आता है तो ब्रिटेन तालिबान के साथ काम करेगा। ऐसे में अगर चीन इस समय तालिबान के खिलाफ हो जाता है, तो यह चीन के लिए अपने आप में एक कूटनीतिक जाल बनाने के समान होगा और तालिबान को दुश्मन कहने वाली नीति पर मुझे विश्वास नहीं है'।

चीन के लोग मुंह रखे बंद

चीन के लोग मुंह रखे बंद

ग्लोबल टाइम्स के संपादक ने लिखा था कि ''चीन के कुछ लोग अफगानिस्तान की स्थिति को नहीं समझते हैं और उन्होंने तालिबान के खिलाफ घृणा पाल लिया है। उन्होंने बामियान बुद्ध के विनाश के लिए तालिबान को जिम्मेदार ठहराया है। इसके साथ ही पूर्वी तुर्किस्तान इस्लामिक मुवमेंट (ईटीआईएम) के लिए भी वो तालिबान को जिम्मेदार ठहराते हुए तालिबान से नफरत करते हैं, ऐसी बातें समझ में तो आती हैं, लेकिन जहां तक मैं जानता हूं, तालिबान और ईटीआईएम के बीच संबंध को इस तरह परिभाषित नहीं किया जा सकता है, कि तालिबान शिनजियांग में आतंकवादी हमले शुरू करने वाले ईटीआईएम का समर्थन करता है।'' ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है कि '' तालिबान धार्मिक आधार पर चरमपंथ की तरफ तो जाता है और आतंकी विचारधारा को भी समर्थन करता है, लेकिन उसकी विचारधारा किस हद तक आतंकी है, इसपर विश्लेषण होना जरूरी है''

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English summary
Taliban leaders have visited China for the first time and China is believed to have given full support to the Taliban in Afghanistan.
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