श्रीलंका से ECT पोर्ट डील रद्द होने के पीछे चीन का हाथ! अब श्रीलंका ने भारतीय कंपनी को बताया जिम्मेदार

श्रीलंका ने ECT पोर्ट डील होने के पीछे भारतीय कंपनी को जिम्मेदार ठहराया है।

कोलंबो: श्रीलंका ने ECT पोर्ट डील होने के पीछे भारतीय कंपनी को जिम्मेदार ठहराया है। श्रीलंका सरकार की तरफ से कहा गया है कि भारतीय कंपनी ने नियमों का उल्लंघन किया है, इसीलिए श्रीलंका सरकार को पोर्ट डील रद्द करने के लिए बाध्य होना पड़ा। पोर्ट डील रद्द होने पर श्रीलंका की तरफ से अलग अलग बयान आ रहे हैं, जिसके बाद पोर्ट डील रद्द होने के पीछे चीन के हाथ होने की संभावना और ज्यादा होता दिख रहा है।

MAHINDRA

पोर्ट डील रद्द होने के पीछे भारत

श्रीलंकन प्राइम मिनिस्टर महिन्द्रा राजपक्षे ऑफिस ने एक फरवरी को बयान जारी करते हुए कहा था कोलंबो स्थित इस्टर्न कंटेनर टर्मिनल (ECT) को अब श्रीलंका के द्वारा ही 100 प्रतिशत श्रीलंकन भागीदारी से बनाया जाएगा। जबकि पहले इसे भारत और जापान के साथ बनाया जाना प्रस्तावित था। लेकिन, अब श्रीलंका के पोर्ट मंत्री रोहिता अबेगुनवार्डना ने कहा है कि पोर्ट डील इसलिए रद्द किया गया है क्योंकि भारतीय कंपनी ने श्रीलंका सरकार के नियमों को मानने से इनकार कर दिया था। पोर्ट मंत्री रोहिता अबेगुनवार्डना ने श्रीलंकन संसद में जबाव देते हुए कहा कि पोर्ट को लेकर श्रीलंका में विरोध प्रदर्शन के बाद सरकार की तरफ से कुछ और नियमों को शामिल किया गया था जिसे मानने से भारतीय कंपनी ने इनकार कर दिया था लिहाजा श्रीलंकन सरकार ने ECT पोर्ट डील रद्द करने का फैसला लिया। आपको बता दें कि भारत, जापान और श्रीलंका ने 2019 में ECT पोर्ट डील को लेकर करार किया था, जिसका श्रीलंका में काफी विरोध किया जा रहा था।

भारत सरकार की प्रतिक्रिया

भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने पोर्ट डील रद्द होने के बाद कहा कि 2019 में भारत-जापान और श्रीलंका के बीच ECT पोर्ट डील के लिए MoU साइन हुआ था। और इस डील से श्रीलंका में इन्फ्रास्ट्रक्चर और पावर सेक्टर का विकास होने के साथ साथ तीनों देशों को फायदा होता। अनुराग श्रीवास्तव ने कहा कि कोलंबो स्थित भारतीय दूतावास श्रीलंकन सरकार से लगातार संपर्क में है। भारत-श्रीलंका और जापान के बीच पोर्ट डील 2019 में तब हुआ था जब श्रीलंका में श्रीसेना की सरकार थी। वहीं, खबर ये भी है कि श्रीलंका के साथ ECT पोर्ट डील रद्द होने के बाद अब श्रीलंका सरकार ने भारत को वेस्टर्न कंटेनर प्रोजेक्ट के लिए संपर्क किया है, जिसे लेकर भारत सरकार विचार कर रही है।

क्यों हो रहा था पोर्ट डील का विरोध

दरअसल, कोलंबो बंदरगाह ट्रेड यूनियनों ने भारत और जापान के निवेशकों के ईटीसी में 49 फीसदी हिस्सेदारी खरीदने के प्रस्ताव का विरोध किया था। ट्रेड यूनियन मांग कर रहे थे कि ECT में श्रीलंका को किसी दूसरे देश के साथ निवेश नहीं करना चाहिए। ECT में शतप्रतिशत हिस्सेदारी सिर्फ श्रीलंका की होनी चाहिए। करार के मुताबिक ECT में श्रीलंका सरकार यानि SLPA की हिस्सेदारी सिर्फ 51% की थी। जबकि 49% हिस्सेदारी भारत और जापान की होने वाली थी। पोर्ट डील का विरोध करने के लिए 23 ट्रेड यूनियनों ने हाथ मिलाया था। ट्रेड यूनियनों का कहना था कि भारत का अडानी ग्रुप के साथ हुआ ये सौदा ECT के करार का बाहर का हिस्सा है। लिहाजा श्रीलंका सरकार को ये करार नहीं करना चाहिए। जिसके बाद भारी विरोध के चलते श्रीलंकन सरकार ने ECT डील को रद्द करने का फैसला लिया है। सरकार का विरोध करने वाले तमाम संगठन सत्ताधारी श्रीलंकन पिपुल्स पार्टी के ही समर्थक हैं, जिसकी वजह से श्रीलंका सरकार को इस डिल को कैंसिल करने के लिए बाध्य होना पड़ा।

क्या चीन है डील कैंसिल होने के पीछे?

हिंद महासागर पर भारत का प्रभुत्व है। लेकिन चीन पिछले कुछ सालों से लगातार हिंद महासागर में घुसपैठ की कोशिश कर रहा है। श्रीलंका के कई बड़े नेता चीनी सरकार के संपर्क में भी रहे हैं। इसके साथ ही श्रीलंका का हम्बनटोटा द्वीप भी चीन ने श्रीलंका से लीज पर ले रखा है। लिहाजा भारत के लिए इस डील का कैंसिल होना चिंता की बात है। हिंद महासागर में प्रभुत्व जमाने के लिए चीन श्रीलंका को एक अहम कड़ी मानता है। इसके लिए पिछले 10 सालों में श्रीलंका के स्वामित्व वाले समुन्द्री हिस्से और जमीनी इलाके में इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास, हाईवे निर्माण, एयरपोर्ट निर्माण से लेकर सीपोर्ट बनाने तक के लिए चीन ने श्रीलंका को करोड़ों डॉलर का कर्ज दे रखा है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि जितना लोन श्रीलंका ने चीन से लिया है उस कर्ज का भुगतान श्रीलंका के लिए करना नामुमकिन सा है। लिहाजा डर इस बात को लेकर है कि क्या आने वाले वक्त में श्रीलंका का हाल पाकिस्तान जैसा हो जाएगा।

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