• search
क्विक अलर्ट के लिए
नोटिफिकेशन ऑन करें  
For Daily Alerts

श्रीलंका को चीन की गोदी में नहीं बैठने देगी जनता! कोलंबो में ‘चीनी शहर’ के खिलाफ बगावत

|

कोलंबो. अप्रैल 17: श्रीलंका में चीन के खिलाफ भारी विरोध शुरू हो गया है। श्रीलंका की सरकार बेपरवाह होकर पिछली गलतियों से सबक नहीं लेते हुए चीन के साथ करार कर रही है लेकिन श्रीलंका की जनता और सिविल सोसाइटी को पता है कि चीन के नजदीक जाने का अंजाम क्या होता है, लिहाजा श्रीलंका में चीन के खिलाफ भारी विरोध शुरू हो चुका है। श्रीलंका में सिविल सोसाइटी, विपक्ष, लेबर यूनियन और आम जनता की तरफ से श्रीलंकन सुप्रीम कोर्ट में दर्जनों याचिकाएं डाली गई हैं, जिसमें श्रीलंका में बनने वाले चीनी पोर्ट का विरोध किया गया है। श्रीलंका की राजधानी कोलंबो में चीन सिटी पोर्ट बनाने वाला है, जिसका श्रीलंका में भारी विरोध किया जा रहा है। श्रीलंका के लोगों का कहना है कि सरकार ने देश की संप्रभुता को ताक पर रखकर चीन के साथ समझौता किया है। श्रीलंकन सुप्रीम कोर्ट में अब सोमवार को तमाम याचिकाओं पर सुनवाई की जाएगी।

कोलंबो पोर्ट सिटी पर विवाद

कोलंबो पोर्ट सिटी पर विवाद

दरअसल, श्रीलंका की महिन्द्रा राजपक्षे सरकार ने पिछले हफ्ते श्रीलंकन संसद में कोलंबो पोर्ट सिटी इकोनॉमिक कमीशन नाम का एक बिल पेश किया है। इस बिल में श्रीलंका की राजधानी कोलंबो में समंदर किनारे 1 अरब 40 करोड़ रुपये की लागत से एक पोर्ट सिटी बनाने का प्रस्ताव है। जिसके बाद इस बिल का पूरे श्रीलंका में भारी विरोध किया जा रहा है। श्रीलंका के लोगों का कहना है कि इस बिल के जरिए श्रीलंका में चीन को असीमित शक्तियां दी जा रही हैं और ये बिल श्रीलंका की संप्रभुता के लिए खतरा है। इस बिल से श्रीलंका की संप्रभुता का पूरी तरह से उल्लंघन किया जा रहा है, लिहाजा ये बिल रद्द होना चाहिए।

बिल पर भारी विवाद

बिल पर भारी विवाद

श्रीलंका की सरकार का कहना है कि इस बिल में कुछ भी गड़बड़ नहीं है और ये देश में विदेश निवेश है। लेकिन विपक्षी पार्टियों का कहना है कि इस बिल के जरिए श्रीलंका चीन के जाल में फंस जाएगा। श्रीलंका की विपक्षी पार्टियां, जिनमें मुख्य विपक्षी पार्टी यूनाइटेड पीपल्स फ्रंट, जनता विमुक्ति पेरमूना, यूनाइटेड नेशनल पार्टी के साथ साथ कोलंबे स्थित एनजीओ सेंटर फॉर पॉलिसी अल्टरनेटिव्स औप मजदूरों के संगठनों ने चीन द्वारा बनने वाले पोर्ट का विरोध किया है। इन संगठनों ने श्रीलंका सरकार द्वारा प्रस्तावित बिल की संवाधिनकता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। कोर्ट में इस बिल को चुनौती देते हुए कहा है कि इस बिल के जरिए श्रीलंका की संप्रुभता को सरकार ने खतरे में डाल दिया है।

निवेश जरूरी मगर शर्तों के साथ

निवेश जरूरी मगर शर्तों के साथ

श्रीलंका की विपक्षी पार्टियों का कहना है कि देश में विदेश निवेश तो बेहद जरूरी है लेकिन किसी भी निवेश से देश की संप्रभुता खतरे में नहीं पड़नी चाहिए। भारतीय अखबार ‘द हिंदू' से बात करते हुए श्रीलंका के एसजेबी के सांसद हर्षा दि सिल्वा ने कहा कि ‘हमारी पार्टी चाहती है कि ये पोर्ट सिटी प्रोजेक्ट कामयाब हो, ताकि देश में विदेश निवेश आए और देश का विकास हो, देश में टेक्नोलॉजी आए, लेकिन कोई भी निवेश संवैधानिक दायरे में ही होना चाहिए। सिटी पोर्ट डील एक लॉंग टर्म परियोजना है और कई सालों तक इसका काम चलने वाला है, लिहाजा विपक्षी पार्टियां चाहती हैं कि देश के संविधान के अनुरूप ही बिल होना चाहिए। सरकार द्वारा पेश बिल में कई अनुच्छेद ऐसे हैं, जो हमारे देश के संविधान के खिलाफ है।'

संप्रभुता को खतरा

संप्रभुता को खतरा

श्रीलंका की पार्टी एसजेबी के लीगल सेक्रेटरी और वरिष्ठ वकील तीसथ विजयगुणावर्धने ने अंग्रेजी अखबार द हिंदू को बताया कि ‘श्रीलंकन सरकार द्वारा पेश किए गये इस बिल में कोलंबो में बनने वाली पोर्ट सिटी में रजिस्ट्रेशन, लाइसेंसिंग और ऑथराइजेशन के संबंध में एक कमेटी के निर्माण करने करने की बात की गई है। इस कमेटी में श्रीलंकन अधिकारियों के अलावा विदेशियों की भी टीम होगी, जो सीधे तौर पर राष्ट्रपति को रिपोर्ट करेगी, राष्ट्रपति के अलावा ये कमेटी किसी और के प्रति जबावदेह नहीं होगी, श्रीलंकन सरकार का कहना है कि ये नियम इसलिए शामिल किया गया है कि ताकि कथित तौर पर पोर्ट का निर्माण अच्छी तरह से हो'। इसके साथ ही उन्होंने कबहा है कि इस बिल में कहा गया है कि ‘पोर्ट सिटी में श्रीलंका की मुद्रा में निवेश नहीं किया जा सकेगा, जिसका मतलब ये हुआ कि इस पोर्ट से श्रीलंकन लोगों को बाहर रखा जाएगा, यानि कोलंबो के भीतर ही अपने ही लोगों के लिए दरवाजे बंद कर दिए गये हैं।' विपक्ष का कहना है कि इस बिल में ऐसी व्यवस्था की गई है कि पोर्ट सिटी को खास तरह की नियमों के साथ एक अलग देश की तरफ चलाया जाए, जो सीधे तौर पर श्रीलंकन संप्रभुता का उल्लंघन है। वहीं, श्रीलंका की पार्टी यूएनपी के मुताबिक ये बिल सरकारी खर्च पोर्ट सिटी पर श्रीलंका के संसद का नियंत्रण को खत्म करने वाला है। श्रीलंका सरकार द्वारा पेश किए गये इस बिल में पारदर्शिता और जवाबदेही का पूरी तरीके से अभाव है और विदेशियों को अपनी शक्ति का गलत इस्तेमाल करने की पूरी छूट दे दी गई है।

‘श्रीलंका को नहीं बनने देंगे उपनिवेश’

‘श्रीलंका को नहीं बनने देंगे उपनिवेश’

श्रीलंका की विपक्षी पार्टियों, एनजीओ और सामाजिक संगठनों के अलावा इस बिल का विरोध बौद्ध धर्मगुरु भी कर रहे हैं। बौद्ध गुरुओं ने कहा है कि हम किसी भी कीमत पर श्रीलंका को चीन का उपनिवेश नहीं बनने देंगे। बौद्ध गुरुओं का कहना है कि देश गलत रास्ते पर जा रहे है। आपको बता दें कि श्रीलंका में बौद्ध गुरुओं का काफी प्रभाव माना जाता है और बौद्ध गुरुओं के दबाव की वजह से ही श्रीलंका की सरकार को अडानी ग्रुप के साथ इस्ट टर्मिनल पोर्ट का करार रद्द करना पड़ा था।

चीन को रोकने के लिए अमेरिका-जापान में ऐतिहासिक समझौता, वॉशिंगटन से बीजिंग को भेजा गया सख्त संदेशचीन को रोकने के लिए अमेरिका-जापान में ऐतिहासिक समझौता, वॉशिंगटन से बीजिंग को भेजा गया सख्त संदेश

English summary
The port city built in Colombo is being fiercely opposed in Sri Lanka. Dozens of petitions against Chinese investment have been filed in the Supreme Court.
देश-दुनिया की ताज़ा ख़बरों से अपडेट रहने के लिए Oneindia Hindi के फेसबुक पेज को लाइक करें
For Daily Alerts
तुरंत पाएं न्यूज अपडेट
Enable
x
Notification Settings X
Time Settings
Done
Clear Notification X
Do you want to clear all the notifications from your inbox?
Settings X
X