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दक्षिण कोरिया में मार्शल लॉ, याद आई भारत की कहानी, जब इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाकर लोकतंत्र को कुचला था!

South Korea Martial Law: दक्षिण कोरिया में पिछली रात कोहराम भरा रहा, क्योंकि देश के राष्ट्रपति यूं सुक योल ने अचानक आपातकाल की घोषणा करते हुए मार्शल लॉ की घोषणा कर दी। इस ऐलान ने पूरी दुनिया में तहलका मचा दिया, क्योंकि एक तो दक्षिण कोरिया अमेरिका का सहयोगी है और दूसरी बात ये, कि इस आपातकाल ने कोरियाई प्रायद्वीप को फिर से अस्थिरता के रास्ते पर ला दिया है।

उत्तर कोरिया पहले से ही किम जोंग उन के क्रूर शासन में छटपटा रहा है और अगर दक्षिण कोरिया भी एक तानाशाह के चुंगल में फंसता, तो कमजोर लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले देशों के तानाशाहों को तख्तापलट के लिए उत्साह मिलता।

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हालांकि, दक्षिण कोरिया की विपक्षी पार्टियों ने आनन-फानन में संसद पर कब्जा करने की कोशिश कर रही सेना को चकमा देते हुए संसद में घुसकर आपातकाल के खिलाफ प्रस्ताव पास कर दिया, जिसके बाद देश की सेना को संसद से हटना पड़ा और राष्ट्रपति यूं सुक योल को मार्शल लॉ का फैसला वापस लेने के लिए मजबूर होना पड़ा।

लेकिन, दक्षिण कोरिया में अचानक आपातकाल की घोषणा ने इंदिरा गांधी की याद दिला दी है, जिन्होंने भारतीय लोकतंत्र को कुचलते हुए देश को आपातकाल के दलदल में धकेल दिया था।

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दक्षिण कोरिया में 6 घंटे का मार्शल लॉ

मंगलवार तीन दिसंबर को दक्षिण कोरिया में किसी भी अन्य दिन की तरह ही दिन शुरू हुआ और फिर शाम हुई और लगभग 10.30 बजे (स्थानीय समय), राष्ट्रपति यून सुक योल ने मार्शल लॉ की घोषणा कर दी और उन्होंने हवाला दिया, कि देश की मुख्य विपक्षी पार्टी उत्तर कोरिया से मिल गई है और वो 'राज्य विरोधी गतिविधियों' में शामिल है।

यह चार दशकों में पहली बार था जब दक्षिण कोरिया में मार्शल लॉ लागू हुआ।

लेकिन, जब संसद में आपातकाल के खिलाफ प्रस्ताव पारित हुआ और सिर्फ 6 घंटे के भीतर राष्ट्रपति को अपना फैसला वापस लेने के लिए मजबूर होना पड़ा, तो पता चला, कि दरअसल देश को उत्तर कोरिया से नहीं, बल्कि राष्ट्रपति की अपनी कुर्सी को खतरा था, जो इतिहास में सबसे खराब अप्रूवल रेटिंग (25 प्रतिशत से कम) से गुजर रहे हैं।

राष्ट्रपति और उनकी पत्नी के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप हैं और देश की जनता का विश्वास उनके ऊपर से उठ चुका है और यही वजह है, कि इस साल अप्रैल में हुए संसदीय चुनाव में 300 सीटों वाली संसद में मुख्य विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी को 160 से ज्यादा सीटें हासिल हुईं।

भारत में लगे आपातकाल की याद

भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 25 जून 1976 को आपातकाल की घोषणा की थी और देश के करीब करीब तमाम विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया था।

इंदिरा गांधी सरकार ने आपातकाल लगाने के पीछे देश की 'सुरक्षा खतरे में है' की बात कही थी, क्योंकि विपक्ष कांग्रेस सरकार पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए बड़े पैमाने पर प्रदर्शन कर रहा था। आपातकाल लगातार इंदिरा गांधी ने लोगों के तमाम मौलिक अधिकार छीन लिए, विपक्ष जेल में था, फ्रीडम ऑफ स्पीच खत्म हो गया था और सरकार के खिलाफ बोलने पर किसी भी शख्स को फौरन जेल में डाल दिया जाता था।

उस समय की रिपोर्ट्स के मुताबिक, इंदिरा गांधी ने तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से 25 जून 1975 को आपातकाल लगाने के लिए कहा था और हर 6 महीने पर आपातकाल की अवधि को बढ़ाने के लिए कहा था। आपातकाल करीब 21 महीने तक चला और ये 21 मार्च 1977 को खत्म हुआ।

इस आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी ने हर मोर्चे पर अपनी मां को सलाह दी और कहा जाता है, कि संजय गांधी के इशारे पर ही तमाम विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार किया गया था।

21 मार्च 1977 को इंदिरा गांधी ने आपातकाल हटा लिया और आम चुनावों की घोषणा की। लेकिन, इलेक्शन में कांग्रेस पार्टी सत्ता से बाहर हो गई और मोरारजी देसाई के नेतृत्व वाली जनता पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला। मोरारजी देसाई भारत के पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने।

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