South Africa’s Election: दक्षिण अफ्रीका में आज डाले जाएंगे वोट, जानिए क्यों इतिहास बदलने वाला होगा चुनाव?

South Africa elections 2024: दक्षिण अफ्रीका में आज राष्ट्रपति को चुनने के लिए वोट डाले जाएंगे और आज के चुनाव से तय होगा, कि सत्तारूढ़ अफ्रीकी कांग्रेस से दक्षिण अफ्रीका की जनता ऊब चुकी है या नहीं। 30 साल पहले रंगभेद सिस्टम के अंत के बाद कांग्रेस देश की सत्ता में आई थी और उसके बाद से अभी तक उसी का शासन है।

अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस (ANC) पिछले 30 सालों से सत्ता में होने के बाद एक बार फिर से शासन में वापस लौटने की उम्मीद कर रही है, लेकिन राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा अपने संसदीय बहुमत को बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं और कई सर्वे में बताया गया है, कि अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस के लिए इस बार का चुनाव जीतना काफी मुश्किल है।

South Africa elections 2024

अनुमानों में बताया गया है, कि अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस (ANC) को इस बार 50 प्रतिशत से कम वोट मिल सकते हैं, हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है, कि संकटग्रस्त ANC अफ्रीका की सबसे एडवांस इकोनॉमी वाले देश में सत्ता से बाहर हो जाएगी।

सत्ता में लौटेगी अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस?

अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस, जिसका नेतृत्व एक वक्त महान नेल्शन मंडेला ने किया था, उसकी लोकप्रियता में अब काफी गिरावट आ गई है, लेकिन इस पार्टी की जगह लेने वाला विपक्ष इसके बाद भी मजबूत नहीं हो पया है और जनता एक ही सवाल का जवाब खोज रही है, कि अगर ANC नहीं, तो और कौन? और माना जा रहा है, कि ANC के सत्ता में बने रहने के लिए ये वजह काफी है।

ANC को अभी भी सबसे ज्यादा वोट मिलने की उम्मीद है। लेकिन, इस बात की उम्मीद काफी कम है, कि वो अपने बदौलत स्पष्ट बहुमत से सरकार का गठन कर लेगी, लिहाजा माना जा रहा है, कि अपना दूसरा और अंतिम कार्यकाल के लिए राष्ट्रपति रामफोसा कुछ पार्टियों के साथ चुनाव के बाद गठबंधन कर सकते हैं।

हालांकि, अफ्रीकी महाद्वीप के एक प्रमुख देश दक्षिण अफ्रीका में गठबंधन की सरकार चलना आसान नहीं है, क्योंकि अतीत में स्थानीय स्तर पर कई गठबंधन हुए हैं, लेकिन वो गठबंधन बुरी तरह से नाकाम साबित हुई हैं।

एक्सपर्ट्स का कहना है, कि एक बड़ी आबादी अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस से काफी नाराज है और लिहाजा अगर रामफोसा एक गठबंधन सरकार का गठन करते हैं, तो उस गठबंधन सरकार के लिए देश की समस्याओं को हल करना आसान नहीं होगा। खासकर देश में उच्च स्तर पर पहुंट चुकी बेरोजगारी और असमानताओं का मुकाबला करना अत्यंत कठिन होगा।

दक्षिण अफ्रीका में कैसे होते हैं चुनाव?

दक्षिणी अफ्रीका में सीधे-सीधे राष्ट्रपति को चुनने के लिए वोट नहीं किया जाता है, बल्कि चुवाल में संसद का स्वरूप तय किया जाता है, जिसे नेशनल असेंबली कहा जाता है। अफ्रीका में नेशनल असेंबली के लिए चुनाव होते हैं और जिस पार्टी को जितने वोट मिलते हैं, उन वोटों के हिसाब पर तय होता है, कि नेशनल असेंबली में उसे कितनी सीटें मिलेंगी।

अफ्रीकी नेशनल असेंबली में 400 सीटें हैं और एक बार नेशनल असेंबली के सदस्य जब चुन लिए जाते हैं, उसके बाद वो राष्ट्रपति को चुनने के लिए वोट डालते हैं, इसका मतलब ये हुए, जिस पार्टी के सबसे ज्यादा सदस्य होते हैं, उस पार्टी के नेता राष्ट्रपति बनते हैं।

दक्षिण अफ्रीका में पहली बार 1994 में सभी जातियों ने एक साथ वोट डालना शुरू किया था (उससे पहले नस्ल के आधार पर वोट डाला जाता था) और उसके बाद से हमेशा नेशनल अफ्रीकी कांग्रेस को ही नेशनल असेंबली में बहुमत हासिल होता रहा। ANC ने हमेशा राष्ट्रपति बनाने के लिए जरूरी 201 से ज्यादा सीटें नेशनल असेंबली में हासिल की, लेकिन इस बार ऐसा करना मुश्किल दिख रहा है, लिहाजा गठबंधन सरकार के निर्माण की संभावनाएं काफी बढ़ गई हैं।

आज दक्षिण अफ्रीका के सभी 9 प्रांतों में एक साथ वोट डाले जाएंगे, जिसमें प्रांतों के साथ साथ नेशनल असेंबली के लिए वोट डाले जाएंगे। चुनाव परिणाम अगले कुछ दिनों में आएंगे।

इस बार देश की कुल 6 करोड़ 20 लाख की आबादी में 2 करोड़ 80 लाख लोग रजिस्टर्ड मतदाता हैं और रंगभेद समाप्त होने के बाद यह देश का सातवां पूर्ण लोकतांत्रिक राष्ट्रीय चुनाव है।

चुनाव में लड़ने वाले बड़े नेता कौन कौन हैं?

नेशनल असेंबली के लिए होने वाले चुनाव में 50 से ज्यादा राजनीतिक दल रजिस्टर्ड हैं, और ये पहला चुनाव है, जिसमें सबसे ज्यादा पार्टियां हिस्सा ले रही हैं और प्रांतीय विधानसभा के लिए तो पार्टियों की संख्या और भी ज्यादा हैं।

इस चुनाव में पहली बार निर्दलीय उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने की अनुमति दी गई है।

प्रमुख नेताओं की बात करें, तो अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस के रामफोसा अपनी पार्टी के चुनावी अभियान के सबसे प्रमुख चेहरा हैं।

जबकि, मुख्य विपक्षी दल मध्यमार्गी डेमोक्रेटिक अलायंस या DA है। इसने कुछ छोटी पार्टियों के साथ इस उम्मीद में समझौता किया है, कि उनके संयुक्त वोट से ANC पूरी तरह से सरकार से बाहर हो सकती है, लेकिन ऐसा होने की संभावना नहीं दिख रही है।

वहीं, कट्टर-वामपंथी इकोनॉमिक फ्रीडम फाइटर्स, जिन्हें EFF कहा जाता है, वो देश की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी है और इसका नेतृत्व ANC के एक उग्र पूर्व युवा नेता जूलियस मालेमा कर रहे हैं। पिछले नेशनल असेंबली में DA को लगभग 20% और EFF को 10% वोट मिले थे, जबकि ANC को 57.5% वोट मिले थे। और ऐसा भी नहीं लगता, कि विपक्षी दलों में से किसी की भी लोकप्रियता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

इसकी सबसे बड़ी वजह दर्जनों अन्य छोटी छोटी पार्टियों का होना है, जिन्होंने छोटे छोटे क्षेत्रों में अपना वर्चस्व बना रखा है।

दक्षिण अफ़्रीका की 80% आबादी अश्वेत है और यह एक बहुजातीय समाज है, जिसमें कई जातीयताएं और 12 आधिकारिक भाषाएं हैं। देश में अब समान रूप से विविधतापूर्ण राजनीतिक तस्वीर दिखाई देने लगी है। नई पार्टियों में से, MK पार्टी या यूमखोंटो वेसिज़वे (जिसका अर्थ है राष्ट्र का भाला) ने सबसे ज्यादा ध्यान आकर्षित किया है क्योंकि इसका नेतृत्व दक्षिण अफ़्रीकी राष्ट्रपति जैकब जुमा कर रहे हैं। जैकब जुमा पहले ANC में ही थे, लेकिन भ्रष्टाचार के आरोप लगने के बाद उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था और बाद में राष्ट्रपति रामफोसा के साथ विवाद के बाद उन्होंने ANC को छोड़ दिया।

जैकब जूमा को चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित कर दिया गया है, लेकिन वे अभी भी अपनी पार्टी के लिए प्रचार कर सकते हैं।

दक्षिण अफ्रीका में प्रमुख चुनावी मुद्दे क्या हैं?

बेरोज़गारी और गरीबी इस चुनाव में सबसे ज्यादा बड़े मुद्दे हैं। दक्षिण अफ्रीका को अफ्रीका महाद्वीप का सबसे उन्नत देश माना जाता है, लेकिन इसके विरोधाभास बहुत ज़्यादा हैं। विश्व बैंक के अनुसार, इसकी बेरोज़गारी दर 32% तक पहुंच चुकी है, जो दुनिया में सबसे ज़्यादा है - और आधे से ज्यादा नागरिक गरीबी रेखा के नीचे जी रहे हैं।

गरीबी और बेरोजगारी ने सबसे ज्यादा असंतोष को बढ़ावा दिया है, क्योंकि लाखों गरीब अश्वेत बहुसंख्यकों को लगता है, कि रंगभेद के तीन दशक बाद भी ANC ने उनके जीवन में पर्याप्त सुधार नहीं किया है। अफ्रीका में श्वेत अल्पसंख्यकों ने आजादी से पहले अश्वेत बहुसंख्यकों के ऊपर काफी क्रूर अत्याचार किए और नस्लीय हिंसा ने अफ्रीका के लोगों को क्रूर दर्द दिए हैं और देश अभी भी इससे बाहर नहीं निकल पाया है।

इसके अलावा, देश में बेतहाशा अपराध की घटनाओं ने ANC को लेकर लोगों में नाराजगी को जन्म दिया है और पिछले कुछ सालों से देश में भ्रष्टाचार और घोटाले के मामलों में जबरदस्त इजाफा हुआ है, वहीं इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट में भी सरकार को नाकामी ही हाथ लगी है। देश में भारी बिजली संकट भी है, जो चुनाव पर स्पष्ट असर डाल रहा है, लेकिन एक्सपर्ट्स का कहना है, कि अगर पूर्ण बहुमत की सरकार का गठन नहीं हो पाता है, तो आर्थिक विकास के कार्यक्रम पटरी से उतर सकते हैं।

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