सांप के तेल से चीन में हो रहा कोरोना का इलाज, 100 साल पहले अमेरिका भी अपना चुका है ये नुस्खा
चीन में सदियों से उपचार के लिए पारंपरिक दवाओं पर काफी जोर दिया जाता है। मौजूदा दौर में भी जब मेडिकल साइंस ने इतनी तरक्की हासिल कर ली है फिर भी चीनी लोगों का भरोसा पारंपरिक दवाओं पर से डिगा नहीं है।

सांकेतिक फोटो (Wikipedia)
चीन के कोरोना का रौद्र रूप देखने को मिल रहा है। कई रिपोर्टों के मुताबिक चीन में हर दिन हजारों लोगों की मौत हो रही है। जाहिर है कि चीन में वैक्सीन बेअसर साबित हो रही है। ऐसे में चीन में कई लोग घरेलू उपचार का रुख कर रहे हैं। इससे पहले नींबू के सेवन से लेकर जड़ी-बूटियों का उपयोग करने की भी बात सामने आई थी। अब ऐसी खबर मिल रही है कि कोरोना के इलाज के लिए चीन में बड़े पैमाने पर एनीमल मटेरियल का यूज हो रहा है। इसमें सांप के तेल का भी इस्तेमाल शामिल है।

चीन में पारंपरिक दवाओं पर जोर
यह जगजाहिर है कि चीन में सदियों से उपचार के लिए पारंपरिक दवाओं पर काफी जोर दिया जाता है। मौजूदा दौर में भी जब मेडिकल साइंस ने इतनी तरक्की हासिल कर ली है फिर भी चीनी लोगों का भरोसा पारंपरिक दवाओं पर से डिगा नहीं है। पारंपरिक उपचार हजारों सालों से चीन में अपनाई गई विधा है। इसका सबसे पुराना लिखित रिकॉर्ड ईसापूर्व तीसरी सदी में मिलता है। चीन के पारंपरिक उपचार में शरीर में मौजूद ऊर्जा को ठीक करके बीमारियों के इलाज का दावा किया जाता है।

एक्यूपंचर भी उपचार का प्रचलित तरीका
चीन में पहले ऐसा माना जाता था कि शरीर के बीमार पड़ने का कारण ऊर्जा का शिथिल पड़ना है। चीनी पारंपरिक उपचार में इसी ऊर्जा को फिर से एक्टिव करने पर जोर दिया जाता है। इसके लिए उपचार के कई तरीके अपनाए जाते हैं। एक्यूपंक्चर, मॉक्सिबक्शन, हर्बल मेडिसिन आदि उपचार के अलग-अलग तरीके हैं। एक्यूपंक्चर सूइयों के द्वारा किया जाने वाला एक ट्रीटमेंट है। इसमें डॉक्टर के रोगियों के रोग का पता लगाकर उस जगह पर सुइयां लगाते हैं। वह सुइयां शरीर के एनर्जी पावर के बहाव को कंट्रोल करने में फायदा देती हैं।

कोरोना में हर्बल तरीके से उपचार
एक्यूपंचर की सबसे खास बात ये है कि इससे शरीर को कोई भी नुकसान नहीं पहुंचता। मॉक्सिबक्शन नामक उपचार में शरीर के प्रभावित हिस्से पर गर्म जड़ी-बूटियां छुआई जाती हैं। इसके अलावा चीनी पारंपरिक उपचार का सबसे प्रचलित तरीका हर्बल ट्रीटमेंट है। इसमें जड़ी-बूटियां ही नहीं, बल्कि जानवरों के मांस या तेल का भी सेवन किया जाता है। हर्बल तरीके से उपचार में लगभग 2000 प्रकार की दवाओं का इस्तेमाल किया जाता है। यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन में स्कूल ऑफ ओरिएंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज के मुताबिक साल 2020 में टीसीएम का कारोबार 160 बिलियन युआन से भी अधिक का रहा, ये आंकड़ा सिर्फ चीन का है, जबकि इसके अलावा हांगकांग, सिंगापुर, वियतनाम और जापान में भी टीसीएम का बाजार फैला हुआ है।

स्नेक ऑयल का इस्तेमाल
हर्बल ट्रीटमेंट में सांप, बिच्छू, कीड़े-मकोड़े तो छोड़िए गधे के मांस तक का इस्तेमाल होता है। सौ साल पहले दुनिया में स्पैनिश फ्लू फैल गया था। उस दौरान चीनी व्यापरियों ने इस फ्लू से बचने के लिए सांप के तेल का खूब व्यापार किया। उनका दावा था कि चीन में मिलने वाले सांपों में जादुई गुण पाए जाते हैं। पश्चिमी देशों में इन चीनी व्यापारियों ने स्नेक ऑयल का जमकर प्रचार-प्रसार किया और मोटा मुनाफा कमाया।

अमेरिकी कंपनियों ने भी बेचना किया शुरू
चीनी व्यापारियों की देखा-देखी अमेरिकी बाजार में व्यापारियों ने जमकर स्नेक ऑयल बेचना शुरू किया। तेल बनाने वाली अमेरिकी कंपनी क्लार्क स्टेनलेज ने देश के हर हिस्से में स्नेक ऑइल का जमकर प्रचार किया और बेचा। हालांकि जब बाद में जांच हुई तो पता लगा कि प्रोडक्ट में न तो स्नेक ऑइल था, न ही इसमें किसी भी प्रकार का हर्बल गुण ही था। हालांकि यह अमेरिका की अकेली कंपनी नहीं थी जो स्नेक ऑइल बनाने और उससे इलाज के दावे करती थीं।

गधे के मांस की चीन में डिमांड
चीन में कोरोना काल में भले ही स्नेक ऑयल के इस्तेमाल का प्रचलन बढ़ रहा हो मगर गधे के मांस और खाल का उपयोग वे पहले से करते आ रहे हैं। चीन में गधे की खाल इतनी बड़े पैमाने पर खपत होती है कि इसके कारण कई देशों में गधे विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गए हैं। गधे के मांस से बनने वाली एजिआओ नाम की दवा कथित तौर इम्युनिटी और यौन क्षमता बढ़ाती है। किसी चॉकलेट बार की तरह दिखती इस दवा के लिए बड़ी संख्या में हर साल गधों का आयात पाकिस्तान और अफ्रीकी देशों से हो रहा है।











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