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SCO Summit Analysis: कश्मीर पर चुप रहकर गंभीर डिप्लोमेसी का सबूत देंगे शहबाज शरीफ?

SCO Summit Pakistan: यह कोई खुजली नहीं है, जिसे लैक्टो कैलामाइन लोशन से ठीक किया जा सकता है या कोई एलर्जी नहीं है, जिसे सेट्रीज़ीन से ठीक किया जा सकता है। ये पाकिस्तान है, जो हर वक्त कश्मीर कश्मीर चिल्लाता रहता है, जिसका इलाज आसानी से नहीं होने वाला है।

पाकिस्तान एससीओ शिखर सम्मेलन 2024 के लिए लाल कालीन बिछा रहा है, जिसमें चीनी प्रधानमंत्री ली कियांग चार दिवसीय यात्रा पर इस्लामाबाद पहुंचे हैं, लिहाजा प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और उनके साथियों की कश्मीर पर हल्ला मचाने की इच्छा, खासकर भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर के सामने, दबाई नहीं जा सकेगी।

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कश्मीर पर मुंह बंद रखेंगे शहबाज शरीफ?

कश्मीर का जिक्र करने से दोहरा मकसद पूरा होता है, एक तो यह घरेलू दर्शकों को खुश करता है और साथ ही पाकिस्तान के "आयरन ब्रदर" चीन को भी खुश करता है। यह सिर्फ कूटनीति का काम नहीं है, बल्कि यह राजनीतिक नाटक है।

हालांकि, कोई सवाल उठा सकता है, कि क्या एससीओ शिखर सम्मेलन में कश्मीर का नाम नहीं लेकर शहबाज अपने बड़े भाई नवाज शरीफ की नकल करने की कोशिश करेंगे, जिन्होंने लाहौर घोषणा के तुरंत बाद कारगिल संघर्ष को भड़काकर उनकी प्रतिष्ठा को धूमिल कर दिया था। पूर्व सैन्य शासक जनरल परवेज मुशर्रफ़ पर उंगली उठाना आसान है, लेकिन उस समय नवाज प्रधानमंत्री थे। क्या वह सिर्फ कठपुतली थे, या फिर उनकी मिलीभगत थी?

शहबाज से चमत्कार की उम्मीद करना शायद बहुत महत्वाकांक्षी हो, कि कम से कम वह कश्मीर मुद्दे का राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करने से बच सकते हैं। कम से कम, वह कश्मीर मुद्दे पर मुंह बंद रख सकते हैं, ताकि इस भू-राजनीतिक खेल में मोहरा बनने से बचा जा सके। क्या वह इस अवसर पर खड़े होंगे, या वह चीनी हितों की कठपुतली बनकर रह जाएंगे, जो उनके इशारों पर नाचते हुए अपनी भारत विरोधी बयानबाजी के जरिए क्षणिक तालियां बटोरते रहेंगे? वह एक प्रतिष्ठित राजनेता बनेंगे या "चीनी नूडल" बने रहेंगे, यह पूरी तरह से उन पर निर्भर करता है।

अब तक उनका रिकॉर्ड प्रभावशाली नहीं रहा है। वह एक और शरीफ हैं, जिन पर भारत को भरोसा नहीं है। मार्च 2024 में जब से शहबाज ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री का पद संभाला है, तब से भारत विरोधी बयानबाजी पाकिस्तान के राजनीतिक विमर्श का एक प्रमुख हिस्सा बनी हुई है, खास तौर पर कश्मीर के मामले में। यह बयानबाजी पाकिस्तान के ऐतिहासिक रुख से मेल खाती है, जिसका मकसद भारत की नीतियों को आक्रामक दिखाना है, और साथ ही घरेलू और अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाना है।

शहबाज शरीफ की एंटी-इंडिया बयानबाजी

शहबाज शरीफ ने लगातार अंतरराष्ट्रीय मंचों का इस्तेमाल भारत विरोधी बयान देने में किया है। सितंबर में संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में अपने संबोधन के दौरान, दुनिया में चल रहे दूसरे संघर्षों से तुलना करते हुए उन्होंने कश्मीर में हालातों के साथ समानताएं खींचने की कोशिश करते हुए, उन्होंने कश्मीर की तुलना फिलिस्तीन से की, और दावा किया, कि इस क्षेत्र पर भारत ने "अवैध रूप से कब्जा" कर रखा है।

उन्होंने भारत पर कश्मीरियों के खिलाफ मानवाधिकारों के उल्लंघन का झूठा आरोप लगाया और जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले संवैधानिक प्रावधान अनुच्छेद 370 को हटाने की निंदा की। शहबाज ने जोर देकर कहा, कि भारत को शांति के लिए इस फैसले को पलटना चाहिए, उन्होंने पाकिस्तान के रुख को दोहराया कि कश्मीर एक विवादित क्षेत्र है जिसका भविष्य संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों के अनुसार जनमत संग्रह द्वारा निर्धारित किया जाना चाहिए।

इसके अलावा, उन्होंने मुस्लिम अल्पसंख्यकों के संबंध में भारत की घरेलू नीतियों की आलोचना की और उन्हें "हिंदू वर्चस्ववादी एजेंडे" का हिस्सा बताया।

सिर्फ शहबाज शरीफ ही नहीं, पूर्व पाकिस्तानी प्रधानमंत्री बिलावल भुट्टो और अन्य पाकिस्तानी नेत भी भारत के खिलाफ जहरीली बयानबाजी करते रहे हैं।

उदाहरण के लिए, सूचना मंत्री मरियम औरंगजेब ने कश्मीर पर भारत के खिलाफ तीखी टिप्पणियां की हैं। विभिन्न पाकिस्तानी नेता लगातार इस बात पर जोर देते हैं कि कश्मीर पाकिस्तान का पसंदीदा भारत विरोधी विषय बना हुआ है। ये बयान अक्सर पाकिस्तान द्वारा कश्मीर एकजुटता दिवस के वार्षिक आयोजन और भारत द्वारा अनुच्छेद 370 को निरस्त करने की वर्षगांठ जैसे प्रमुख वर्षगांठों के दौरान बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए जाते हैं।

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क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय लाभ लेने की कोशिश

पाकिस्तान की ओर से लगातार भारत विरोधी बयानबाजी घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों उद्देश्यों को पूरा करती है। घरेलू स्तर पर, यह कश्मीर पर सख्त रुख अपनाने वाले राजनीतिक गुटों से समर्थन जुटाता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, पाकिस्तान इन बयानों का इस्तेमाल कूटनीतिक समर्थन पाने के लिए करता है, खास तौर पर मुस्लिम बहुल देशों और इस्लामिक सहयोग संगठन जैसे संगठनों से।

शहबाज शरीफ और अन्य नेताओं ने अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप की मांग की है, और कश्मीर को पाकिस्तान की विदेश नीति के एजेंडे में केंद्र बिंदु बनाए रखने पर जोर दिया है।

हालांकि, इन बयानों ने भारत और पाकिस्तान के बीच कूटनीतिक तनाव को और बढ़ा दिया है। भारत ने कश्मीर पर पाकिस्तान के दावों को स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया है, और इसे भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करार दिया है। इस शत्रुतापूर्ण माहौल ने दो परमाणु-सशस्त्र पड़ोसियों के बीच बातचीत की किसी भी संभावना को खारिज किया है। भारत ने कहा है कि किसी भी वार्ता को फिर से शुरू करने से पहले पाकिस्तान को सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ सार्थक कार्रवाई करनी चाहिए।

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कश्मीर पर चुप रहकर संबंधों को सामान्य बनाएंगे शहबाज?

शहबाज शरीफ के कार्यकाल की शुरुआत से ही भारत विरोधी बयानबाजी पाकिस्तान की राजनीतिक कथा का एक प्रमुख तत्व बनी हुई है, खास तौर पर कश्मीर पर केंद्रित। शरीफ, बिलावल भुट्टो जरदारी और अन्य मंत्रियों के भाषणों से पता चलता है, कि पाकिस्तान कश्मीर को अपने कूटनीतिक एजेंडे में सबसे आगे रखने का इरादा रखता है।

हालांकि, इस रुख के कारण भारत के साथ तनाव बढ़ा है, जिससे दोनों देशों के बीच संबंधों में गतिरोध जारी है। जब तक पाकिस्तान कश्मीर के प्रति आकर्षित रहेगा, तब तक इस तरह की जहरीली बयानबाजी जारी रहने की संभावना है, जो भारत-पाकिस्तान संबंधों की जटिल गतिशीलता को आकार देती रहेगी। लिहाजा सवाल ये हैं, कि क्या एससीओ शिखर सम्मेलन के दौरान कश्मीर पर चुप रहकर शहबाज शरीफ, भारत के साथ संबंधों को सामान्य करने की पहल की शुरूआत करेंगे?

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