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आर्कटिक के पिघलते बर्फ से निकल सकते हैं हजारों जानलेवा वायरस, दुनिया में मचने वाली है तबाही?

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आर्कटिक, अगस्त 04: पृथ्वी पर संकट गहराता जा रहा है। पूरी दुनिया में बढ़ते तापमान की वजह से आर्कटिक में जमा हजारों सालों का बर्फ अब पिघल रहा है, जिसको लेकर वैज्ञानिकों ने काफी गंभीर चेतावनी जारी की है। हीटवेव, सूखा, समुद्र में बढ़ता एसिड और लगातार बढ़ता जलस्तर पूरी दुनिया के सामने काल की तरह मुंह खोल रहा है। करीब 90% दुनिया उत्तरी गोलार्ध में रहती है, जिसमें प्रमुख जनसंख्या केंद्र उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में हैं और वैज्ञानिकों ने सनसनीखेज दावा करते हुए कहा है कि आर्कटिक में जमा ऐसे ऐसे जानलेवा वायरस इंसानों के बीच आने वाला है, जो इंसानी आबादी को पूरी तरह से खत्म करने की क्षमता रखता है।

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    जानलेवा बीमारियों का जखीरा

    जानलेवा बीमारियों का जखीरा

    दुनिया के प्रमुख वैज्ञानिकों ने काफी रिसर्च के बाद कहा है कि आर्कटिक में ऐसी परिस्थितियां बन रही हैं, जो एक झटके में इंसानी इतिहास को हमेशा के लिए खत्म कर सकते हैं। वैज्ञानिकों ने कहा है कि आर्कटिक में, दुनिया के अन्य हिस्सों के मुकाबले तापमान दोगुनी तेजी से बढ़ रहा है। नतीजतन, मिट्टी की मोटी परत, जिसे पर्माफ्रॉस्ट कहा जाता है और जहां साल भर बर्फ जमी रहती है, वो काफी तेजी से पिघल रही है।

    बर्फ का पिघलना क्यों खतरनाक?

    बर्फ का पिघलना क्यों खतरनाक?

    पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने से जलवायु संकट के प्रभाव और खतरनाक हो जाएंगे, क्योंकि इस प्रक्रिया के दौरान, बर्फ में जो कार्बन जमा हुआ है, वो बाहर आ जाएगा। वैज्ञानिकों ने कहा है कि वो कार्बन इंसानों के लिए मौत के समान है। इसी तरह, समुद्री बर्फ और जमीन को ढकने वाली बर्फ की चादरों के नष्ट होने से तापमान में काफी तेजी आएगी। आपको बता दें कि सफेद बर्फ सूर्य के प्रकाश को रिफ्लेक्ट कर पृथ्वी को ठंडा रखने का काम करती है, जबकि गहरा समुद्री जल गर्मी को अवशोषित करता है। ऐसे में अगर बर्फ की चादर पिघल जाएगी, तो इंसानों का बचना नामुमकिन हो जाएगा।

    तापमान बढ़ने के साइड इफेक्ट्स

    तापमान बढ़ने के साइड इफेक्ट्स

    वैज्ञानिकों ने कहा है कि औसत तापमान में वृद्धि कई दूसरे तरह से भी पर्यावरण को बर्बादी की तरफ ले जा रही है और इस बात के प्रमाण पहले ही मिल चुके हैं, कि विषुवत रेखीय पेटी को प्रभावित करने वाली बीमारियां उच्च अक्षांशों में फैल रही हैं। मच्छर, टिक्स और अन्य कीड़े इनमें से कई बीमारियों को फैलाते हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है वेस्ट नाइल वायरस, जिससे संयुक्त राज्य अमेरिका में हर साल सैकड़ों लोगों की मौत हो रही है। इसके बारे में पहली बार जानकारी 1999 में मिली थी। इस वायरल बीमारी का प्रसार मच्छरों के जीवन चक्र पर निर्भर है। बढ़ते तापमान के साथ आर्कटिक के कुछ हिस्सों सहित कनाडा में वेस्ट नाइल अधिक प्रचलित हो जाएगा। वैज्ञानिकों ने कहा है कि ये बस वक्त की बात है, जब ये बीमारी पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लेगा।

    पर्यावरण में बदलाव का असर

    पर्यावरण में बदलाव का असर

    दुनिया में बढ़ते तापमान की वजह से बत्तख और गीज़ जैसे जंगली पक्षियों के आवासों में भी बदलाव आ रहा है। जो एवियन फ्लू को पूरी दुनिया में फैला सकते है। इसी साल की शुरुआत में रूस ने H5N8 एवियन फ्लू के पक्षियों से मनुष्यों में जाने का पहला मामला दर्ज किया है। अन्य जंगली जानवरों जैसे लोमड़ी ने भी अपना घर बदलना शुरू कर दिया है, जिससे रेबीज बीमारी के तेजी से इंसानों में फैलने की आशंका जताई जा रही है। वैज्ञानिकों ने कहा है कि लोमड़ी की वजह से पैदा होने वाला रेबीज वायरस इंसानों के लिए काफी ज्यादा खतरनाक होगा।

    वायरस और बैक्टीरिया ने बढ़ाया टेंशन

    वायरस और बैक्टीरिया ने बढ़ाया टेंशन

    वैज्ञानिक भी पर्माफ्रॉस्ट और बर्फ के पिघलने से वायरस और बैक्टीरिया के बढ़ने को लेकर काफी चिंतित हैं। 2016 की गर्मियों में साइबेरिया के एक सुदूर हिस्से में एंथ्रेक्स नाम की बीमारी फैल गई थी। जिसकी चपेट में आने से दर्जनों लोग संक्रमित हुए और एक युवक की मौत हो गई। एंथ्रेक्स बीमारी की वजस से करीब 2,300 हिरन मारे गए। एंथ्रेक्स बीमारी, बैक्टीरिया के कारण होने वाला एक गंभीर संक्रामक रोग है जो बीजाणु के रूप में निष्क्रिय रह सकता है। जमी हुई मिट्टी और बर्फ में एंथ्रेक्स के बीजाणु कम से कम कुछ दशकों तक निष्क्रीय रह सकते हैं। लेकिन, अगर बर्फ पिघलता है तो ये बैक्टीरिया काफी तेजी से इंसानों के बीच फैल सकता है। वैज्ञानिकों ने एंथ्रेक्स बीमारी को लेकर जब खोजबीन की, तो पता चला कि उस 2016 में रिकॉर्ड स्तर पर टेम्परेचर बढ़ा था और एक मर चुके हिरण में एंथ्रेक्स बैक्टीरिया ने प्रवेश कर लिया था। और फिर ये बैक्टीरिया हिरण को खाने वाले छोटे जानवरों के होते हुए इंसानों तक पहुंच गया।

    हजारों साल तक निष्क्रीय रहते हैं वायरस

    हजारों साल तक निष्क्रीय रहते हैं वायरस

    एक और चिंता महामारी पैदा करने की क्षमता वाले वायरस और बैक्टीरिया का उभरना है। ये रोग पैदा करने वाले रोगाणु सैकड़ों या हजारों सालों तक बर्फ में निष्क्रिय रह सकते हैं। एच1एन-1 वायरस, जिसकी वजह से 1918 में स्पेनिश फ्लू फैला था, वो भी आर्कटिक में दबे बर्फ में से ही निकला था। 1918 में स्पेनिश फ्लू की वजह से करोड़ों लोगों की मौत हो गई थी। भारत में ही करीब 3 करोड़ लोग स्पेनिश फ्लू की वजह से मारे गये थे। इसके साथ ही बर्फ में वैज्ञानिकों को चेचक बीमारी का वायरस भी मिला है। हलांकि, चेचक को अब अलग अलग वैक्सीन के जरिए पूरी तरह से खत्म कर दिया गया है।

    आर्कटिक में स्पेनिश फ्लू पर रिसर्च

    आर्कटिक में स्पेनिश फ्लू पर रिसर्च

    स्पेनिश फ्लू को जन्म देने वाले एच-1एन-1 वायरस के मामले में वैज्ञानिकों ने अलास्का में एक संक्रमित व्यक्ति का शरीर अच्छी तरह से संरक्षित पाया था। और 2005 में जेफ़री टूबेनबर्गर नाम के वैज्ञानिक ने घातक एच-1एन-1 वायरस के जीनोम के पुनर्निर्माण के लिए इस व्यक्ति के नमूनों का उपयोग किया। मृत व्यक्ति से प्राप्त यह वायरल सीक्वेंस दूसरों को संक्रमित करने में सक्षम नहीं थे, लेकिन ऐसा होना जरूरी नहीं है। भारत के माइक्रोबायोलॉजिस्ट अनिर्बान महापात्रा ने हिंदुस्तान टाइम्स में लिखे अपने आर्टिकिल में कहा है कि वास्तव में, हमारे पास पर्याप्त सबूत हैं कि जमे हुए बर्फ, मिट्टी, जानवरों के शवों और मानव लाशों से संक्रामक वायरस और बैक्टीरिया को पुनर्जीवित किया जा सकता है। 2014 में शोधकर्ताओं ने विशाल वायरस की खोज की सूचना दी थी, जो करीब 30 हजार सालों से साइबेरियाई पर्माफ्रॉस्ट में निष्क्रिय पड़े हुए थे। ये विशेष वायरस इंसानों के लिए हानिकारक नहीं थे, लेकिन उन्होंने अमीबा को संक्रमित किया था। इसके अगले साल ही अलास्का पर्माफ्रॉस्ट से बैक्टीरिया बरामद किए गए थे। ये जीवाणु भी हजारों सालों से सुप्त अवस्था में थे।

    सिर्फ आर्कटिक तक ही सीमित नहीं खतरा

    सिर्फ आर्कटिक तक ही सीमित नहीं खतरा

    माइक्रोबायोलॉजिस्ट अनिर्बान महापात्रा ने हिंदुस्तान टाइम्स में लिखे अपने आर्टिकिल में कहा है कि ये स्थितियां अकेले आर्कटिक तक ही सीमित नहीं हैं। हजारों सालों से जमे हुए ग्लेशियर की बर्फ पिघल रही है। पिछले महीने, रिसर्चर्स ने माइक्रोबायोम पत्रिका में 15 हजार साल पुराने वायरस (पहली बार पहचाने गए 28 विभिन्न प्रकारों सहित) की रिपोर्ट करते हुए एक रिसर्च पेपर प्रकाशित किया था, जो उन्हें तिब्बती पठार से ग्लेशियर की बर्फ में मिले था। इन अध्ययनों से पता चलता है कि कुछ वायरस और बैक्टीरिया पर्माफ्रॉस्ट और बर्फ में हजारों वर्षों तक जीवित रह सकते हैं, और उनमें से कुछ के लिए मनुष्यों को संक्रमित करने की क्षमता वास्तविक है। लिहाजा, इंसानों को किसी भी हाल में धरती का तापमान बढ़ने से रोकना होगा, ताकि वायरस और बैक्टीरिया को बर्फ से निकलने से रोका जा सके।

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    English summary
    Scientists have said that a plethora of bacteria and viruses are hidden in the Arctic, which can become deadly for the whole world at any time.
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