रूस-यूक्रेन संकट के बीच भारत कैसे बनाए बैलेंस? दोस्त रूस, पार्टनर अमेरिका- किसे चुने मोदी सरकार?
एक्सपर्ट्स का कहना है कि, यूक्रेन पर रूसी हमले के बीच भारतीय प्रधानमंत्री का रूसी राष्ट्रपति को फोन करना और ‘हिंसा की तत्काल समाप्ति’ का आह्वान करना एक अच्छा कदम है।
मॉस्को/कीव/वॉशिंगटन/नई दिल्ली, फरवरी 25: यूक्रेन पर रूसी हमले के बीच गुरुवार देर शाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को फोन कॉल में "हिंसा की तत्काल समाप्ति" की अपील की और राजनयिक वार्ता और डिप्लोमेटिक रास्ते पर लौटने के लिए सभी पक्षों से ठोस प्रयास करने का आह्वान किया। भारतीय प्रधानमंत्री कार्यालय ने कहा, कि उन्होंने अपना "लंबे समय से दृढ़ विश्वास व्यक्त किया कि रूस और नाटो समूह के बीच मतभेदों को केवल ईमानदार और ईमानदार बातचीत के माध्यम से सुलझाया जा सकता है"। लेकिन, सवाल ये है कि, क्या भारत अमेरिका और रूस के बीच 'फंस' गया है। जबकि, अमेरिका ने कहा है कि, रूस के साथ कौन कौन है, उसपर उसकी नजर है।

भारत कैसे बनाए बैलेंस?
एक्सपर्ट्स का कहना है कि, यूक्रेन पर रूसी हमले के बीच भारतीय प्रधानमंत्री का रूसी राष्ट्रपति को फोन करना और 'हिंसा की तत्काल समाप्ति' का आह्वान करना एक अच्छा कदम है और पीएम मोदी के इस कदम की पश्चिमी देशों में भी सराहना की जाएगी। लेकिन, भारत दोनों पक्षों के प्रमुख रणनीतिक साझेदारों के साथ कूटनीतिक दुविधा में फंसा हुआ नजर आ रहा है। स्थिति का जायजा लेने के लिए पीएम मोदी ने गुरुवार को सुरक्षा मामलों की कैबिनेट कमेटी की बैठक भी की और उसके बाद ही उन्होंने रूसी राष्ट्रपति से बात की। दूसरी तरफ भारतीय विदेश मंत्री की टेलीफोन पर यूक्रेन संकट को लेकर अमेरिका के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन से भी बात हुई है।

रूसी हमले पर भारत का रूख
यूक्रेन पर रूसी हमले के पहले दिन भारत ने हमले को लेकर 'खेद' जरूर जताया है, लेकिन यूक्रेन पर रूस के हमले की निंदा करने से पहले भारत रुक गया। विदेश मंत्री एस जयशंकर को विदेश मामलों और सुरक्षा नीति पर यूरोपीय संघ के उच्च प्रतिनिधि जोसेप बोरेल और ब्रिटिश विदेश सचिव लिज़ ट्रस के फोन आए। वहीं, G7 देशों (कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, यूके और यूएस) और यूक्रेन के राजदूतों ने दिल्ली में मुलाकात कर एकजुटता व्यक्त भी की, जिसे उन्होंने "रूस की अनुचित सैन्य आक्रामकता" कहा, लेकिन भारत ने अभी तक रूसी कदम की आलोचना नहीं की है और ना ही भारत ने रूस के खिलाफ कुछ कहा है।

भारत पर पश्चिमी देशों का प्रेशर
इसमें कोई शक नहीं, कि अमेरिका के नेतृत्व वाले पश्चिमी गुट का भारत पर भारी दबाव है और यह दबाव नई दिल्ली के लिए एक रणनीतिक विकल्प बनाने को लेकर एक परीक्षा है। ऐसे में भारत के लिए एक तरफ सिद्धांत और मूल्य हैं, तो दूसरी तरफ व्यावहारिकता और हित भी जुड़े हुए हैं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में एक आपात बैठक में दिए गए भारत के बयान में कहा गया है कि, 'सुरक्षा परिषद ने दो दिन पहले बैठक की थी और स्थिति पर चर्चा की थी। हमने तनाव को तत्काल कम करने का आह्वान किया था और स्थिति से संबंधित सभी मुद्दों को हल करने के लिए निरंतर और केंद्रित कूटनीति पर जोर दिया था।"

यूएनएससी में भारत का संतुलित रूख
यूएनएससी की बैठक में भी भारत ने बेहद संतुलित रूख अपानाया और संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि टीएस तिरुमूर्ति ने कहा कि, "हम खेद के साथ इस बात को कहना चाहते हैं कि, तनाव को दूर करने के लिए पार्टियों द्वारा की गई हालिया पहलों को समय देने के लिए अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के आह्वान पर ध्यान नहीं दिया गया। स्थिति एक बड़े संकट में तब्दील होने के कगार पर है। हम घटनाक्रम पर अपनी गहरी चिंता व्यक्त करते हैं, जिसे अगर सावधानी से नहीं संभाला गया, तो यह क्षेत्र की शांति और सुरक्षा को कमजोर कर सकता है।" भारतीय दूत ने दोनों देशों से "तत्काल डी-एस्केलेशन और किसी भी आगे की कार्रवाई से परहेज करने का आह्वान किया जो स्थिति को बिगड़ने में योगदान दे सकता है"।

भारत को किस तरह से देख रहा पश्चिम?
यूएनएससी में भारत ने जो बयान दिया है, वो पूरी तरह से कूटनीति पर आधारित था और पश्चिमी देश इसे भारत का रूस की कार्रवाइयों को अनदेखा करने और दोहरे मानकों के रूप में देखा जा रहा है, जब भारत चीन की बात करता है तो "क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता" का मुद्दा उठाता है। वहीं, इस हफ्ते की शुरुआत में, भारत ने डोनेट्स्क और लुहांस्क के अलगाववादी क्षेत्रों को स्वतंत्र राज्य के रूप में रूस के मान्यता देने के फैसले की भी भारत ने निंदा नहीं की।

दोनों तरफ भारत के पार्टनर
बात अगर भारत के रूस की बांह मरोड़ने को लेकर है, तो नई दिल्ली ऐसा कभी नहीं करेगी और नई दिल्ली मास्को के साथ घनिष्ठ सैन्य संबंधों कभी भी खतरे में नहीं डालना चाहती है। हालांकि भारत ने अन्य देशों के साथ सैन्य साजोसामान खरीदना शुरू जरूर कर दिया है, लेकिन अभी भी भारत की लगभग 60-70% सैन्य आपूर्ति रूस से ही होती है। वहीं, रूस के साथ भारत के सात दशक पुराने ऐतिहासिक संबंध हैं। जबकि कुछ क्षेत्रों में संबंध स्थिर हो गए हैं और कई क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच के संबंध और भी मजबूत ही हो रहे हैं। दो महीने पहले भी रूसी राष्ट्रपति कोरोना महामारी को दरकिनार करते हुए भारत की यात्रा की थी और पिछले 2 सालों में ये सिर्फ दूसरा मौका था, जब रूसी राष्ट्रपति ने विदेश दौरा किया, जो उनके भारत के प्रति लगाव और उनके भारत को दिए गये कूटनीतिक स्थान को दिखाता है, लिहाजा भारत अमेरिका और रूस के बीच फंसा नजर आता है। भारत रूस को अलग-थलग करने का जोखिम नहीं उठा सकता है, खासकर जब भारतीय और चीनी सैनिक सीमा गतिरोध में रहते हैं।

रूस-चीन संबंध से भी भारत चिंतित
वहीं, रूस-चीन की धुरी को लेकर भी भारत चिंतित है। रूस से एस-400 वायु रक्षा प्रणाली की खरीद का उद्देश्य चीन और पाकिस्तान के हमलों को रोकना है। भारत इस बात से भी अवगत है, कि पश्चिम और रूस के बीच शत्रुता मास्को और बीजिंग के संबंधों को और मजबूत करेगा। 2014 में पश्चिमी देशों द्वारा रूस पर लगाए गये प्रतिबंध के वक्त रूस और चीन का द्विपक्षीय व्यापार महज 45 अरब डॉलर के करीब था, लेकिन प्रतिबंध के बाद ये व्यापार सिर्फ 7 सालों में बढ़कर करीब 150 अरब डॉलर के करीब हो गया है और इस वक्त जो प्रतिबंध लगाए गये हैं, इसके बाद रूस को पूरी तरह से चीन पर ही निर्भर रहना होगा। लिहाजा अब भारत के लिए रूस के साथ किस तरह के संबंध रखने हैं और किस तरह की कूटनीति अमरेका और रूस के बीच बनानी है, ये देखने वाली बात होगी, लेकिन तमाम एक्सपर्ट्स एक बात पर सहमत हैं... कि भारत के लिए किसी भी रास्ते पर चलना आसान नहीं होने वाला है।












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