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सऊदी अरब पहुँचे पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान ख़ान

By BBC News हिन्दी

इमरान ख़ान
Getty Images
इमरान ख़ान

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान सात मई से लेकर 9 मई तक सऊदी अरब के दौरे पर हैं.

ये दौरा ऐसे वक़्त हो रहा है जब दोनों देशों के बीच रिश्ते तल्ख़ है. माना जा रहा है इमरान ख़ान के इस दौरे से दोनों देशों के बीच रिश्ते बेहतर हो सकते हैं.

सालों से पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच रणनीतिक तौर पर मज़बूत रिश्ते रहे हैं लेकिन हाल के दिनों में कुछ क्षेत्रीय मुद्दों को लेकर दोनों के बीच के द्विपक्षीय रिश्तों में तनाव बढ़ा है और दोनों के गठबंधन पर भी ख़तरा मंडरा रहा है.

दोनों के बीच तनाव का पहला संकेत साल 2015 में मिला जब यमन में हो रही सैन्य कार्रवाई में सऊदी अरब के नेतृत्व वाली गठबंधन सेना में शामिल होने के लिए पाकिस्तान ने अपनी सेना भेजने से इनकार कर दिया.

बाद में आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए सऊदी अरब के नेतृत्व वाली इस्लामी सैन्य गठबंधन में पाकिस्तान के सेना भेजने की सहमति के बाद दोनों के बीच रिश्तों में थोड़ा सुधार आया.

इसके बाद दोनों के बीच द्विपक्षीय रिश्तों को आगे बढ़ाते हुए सऊदी अरब पाकिस्तान को तीन अरब डॉलर का कर्ज़ा देने के लिए राज़ी हो गया.

साथ ही साल 2018 में वो पाकिस्तान को 3.2 अरब डॉलर का ऑइल क्रेडिट सुविधा देने पर भी सहमत हो गया. ये वो वक़्त था जब पाकिस्तान गंभीर वित्तीय संकट से जूझ रहा था और उसकी मुद्रा में जारी गिरावट थमने का नाम नहीं ले रही थी.

इस मुश्किल से निकलने के लिए पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से राहत पैकेज के लिए चर्चा कर रहा था.

सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की तस्वीर
AAMIR QURESHI
सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की तस्वीर

दोनों मुल्कों के बीच ऐसे बढ़ी दरार

2018 में तुर्की के इंस्ताबुल के सऊदी वाणिज्यिक दूतावास में पत्रकार जमाल ख़ाशोज्जी की हत्या के बाद पूरी दुनिया में सऊदी अरब की आलोचना हुई.

इसके बाद अक्टूबर 2018 में जब सऊदी इन्वेस्टमेंट कॉन्फ्रेंस का आयोजन हुआ तो दुनिया के कई मुल्कों के नेताओँ ने इसमें शामिल न होने का फ़ैसला किया. लेकिन इमरान ख़ान इस कॉन्फ्रेंस में शामिल होने पहुंचे, जिसके बाद दोनों देशों के रिश्तों में थोड़ा सुधार आया.

लेकिन दोनों के बीच एक बार फिर तल्ख़ी उस वक़्त देखने को मिली जब साल 2019 में पाकिस्तान ने भारत सरकार के एक फ़ैसले को लेकर सऊदी नेतृत्व वाले इस्लामी देशों से संगठन (ऑर्गेनाइज़ेशन ऑफ़ इस्लामिक कोऑपरेशन, ओआईसी) से हस्तक्षेप की गुहार लगाई.

पाकिस्तान कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 को हटाए जाने के विरोध में था.

लेकिन इस मामले में सऊदी अरब ने कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने को भारत का अंदरूनी मामला बताया.

इस मुद्दे पर ओआईसी में मामला ठंडा पड़ने के बाद पाकिस्तान ने मुसलमान देशों के एक नए संगठन को समर्थन देने का फ़ैसला किया. इस समूह में तुर्की, मलेशिया, ईरान और क़तर शामिल थे.

पाकिस्तान ने कुआलालुंपुर में होने वाले उस सम्मेलन में जाने का फ़ैसला किया, जिसमें दुनिया भर से 400 मुसलमान स्कॉलर शामिल होने वाले थे.

पाकिस्तान ने इस फ़ैसले के साथ सऊदी अरब से नाराज़गी मोल ली. सऊदी ने कहा कि वो इस सम्मेलन को "मुस्लिम दुनिया में अपने प्रभाव के लिए ख़तरा मानता है." सऊदी अरब की नाराज़गी के बाद पाकिस्तान ने इस आयोजन में जाने का अपना फ़ैसला बदल दिया.

डॉन अख़बार में छपी एक ख़बर के अनुसार पाकिस्तान को "सऊदी अरब की प्रतिक्रिया" के बाद अपने फ़ैसले पर फिर से विचार करने के लिए बाध्य होना पड़ा.

पाकिस्तानी विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी
Russian Foreign Ministry/Handout via REUTERS
पाकिस्तानी विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी

दोनों मुल्कों के बीच की दरार तब और बढ़ गई जब पाकिस्तानी विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी ने सऊदी नेतृत्व वाले ओआईसी से कहा कि वो कश्मीर मसले पर "चर्चा को और न टाले" और इस मुद्दे पर विदेश मंत्रियों की काउंसिल की बैठक बुलाने के लिए कहा.

अख़बार डॉन के अनुसार शाह महमूद क़ुरैशी ने "कड़ी चेतावनी देते हुए" कहा कि "अगर आप बैठक का आयोजन नहीं कर सकते तो मुझे प्रधानमंत्री इमरान ख़ान से इस मुद्दे पर हमारा साथ देने के लिए तैयार इस्लामिक देशों के साथ बैठक करने के लिए कहने को बाध्य होना पड़ेगा."

पाक विदेश मंत्री के बयान ने सऊदी अरब की नाराज़गी बढ़ाई और सऊदी से पाकिस्तान से कहा कि वो तीन अरब का उसका कर्ज़ वापस करे.

द एक्सप्रेस ट्रिब्यून में छपी एक ख़बर के अनुसार "ये अपने आप में अजीब था कि सऊदी अरब ने कर्ज़ वापस करने के लिए कहा जबकि इससे पहले के मौक़ों पर उसके कर्ज़ को अनुदान में तब्दील किया था या फिर उसकी मियाद को आगे बढ़ाया था."

इस पूरे मामले से पैदा हुई स्थिति से निपटने की कोशिशें तेज़ हुईं और अगस्त 2020 में पाकिस्तान के सेना प्रमुख क़मर जावेद बाज़वा को सऊदी अरब के दौरे पर जाना पड़ा.

हालांकि इस दौरान सऊदी क्राउन प्रिंस से मुलाक़ात की उनकी गुज़ारिश को "ठुकरा" दिया गया.

दोनों के बीच तनाव कुछ महीनों के लिए बरकरार रहा जिसके बाद इस साल मार्च में सऊदी अरब से पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को सऊदी दौरे पर आने का न्योता दिया और पाक प्रधानमंत्री और सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के बीच फ़ोन पर बात हुई और रिश्तों को सुधारने के बारे में चर्चा हुई.

द एक्सप्रेस ट्रिब्यून के अनुसार "15 महीनों में ये पहली बार था जब दोनों मुल्कों के नेताओं में किसी तरह की बातचीत हुई थी."

राजनीति में आते बदलाव

ऐतिहासिक तौर पर देखा जाए तो पाकिस्तान को लंबे वक़्त से सऊदी अरब का समर्थन मिलता रहा है. अब ऐसा लगता है कि अमेरिका में सत्ता परिवर्तन के साथ नई विश्व वयवस्था के अनुरूप सऊदी अरब अपनी रणनीति भी बदल रहा है.

बीते साल द प्रिंट में छपी एक ख़बर में नायला इनायत ने लिखा, "दशकों तक आर्थिक मदद के लिए पाकिस्तान सऊदी अरब पर निर्भर रहा है और उसने दोनों के बीच के रिश्तों को मज़बूत करने के लिए धार्मिक और सांस्कृतिक रिश्तों का इस्तेमाल किया है."

बाइडन के राष्ट्रपति बनने के बाद व्हाइट हाउस ने कहा कि वह सऊदी अरब के साथ अपने संबंधों के बारे में "फिर से विचार" करेगा.

आज की स्थिति ये है कि अमेरिका साल 2015 में ईरान के साथ किए गए परमाणु करार को फिर से बहाल करना चाहता है. माना जा रहा है इससे मध्य-पूर्व में भौगोलिक राजनीति काफी हद तक बदल सकती है. हाल के दिनों में इस क्षेत्र में अपने कट्टर प्रतिद्वंदी ईरान के लिए सऊदी क्राउन प्रिंस के नरम रुख़ को इस पृष्ठभूमि पर समझा जा सकता है.

इधर लंबे वक़्त से सऊदी अरब और ईरान के बीच संतुलन बना कर रखने वाले पाकिस्तान ने तुरंत इसका स्वागत किया.

https://twitter.com/ImranKhanPTI/status/1387473020114149378

जानकार मानते हैं कि पाकिस्तान और सऊदी अरब दोनों ही मध्य-पूर्व में बदलते संबंधों और भौगोलिक स्थिति को लेकर जागरूक हैं और क्षेत्र में असुरक्षा से निपटने के लिए आपसी सहयोग के महत्व को समझते हैं.

विश्लेषक ख्वाजा दाऊद तारिक़ ने द एक्सप्रेस ट्रिब्यून में छपे एक लेख में कहा, "हाल में आए भोगौलिक रणनीतिक बदलावों ने पुराने सहयोगी रहे दोनों देशों को एक बार फिर रणनीतिक तौर पर अपने रिश्तों के बारे में सोचने के लिए उकसाया है."

वो कहते हैं, "पाकिस्तान अपनी प्राथमिकताएं बदल रहा है और आर्थिक परिदृश्य को मज़बूत करना चाहता है. ऐसे में वो सऊदी अरब से मदद चाहता है. वहीं सऊदी अरब अपने भौगोलिक और रणनीतिक हितों की रक्षा के लिए क्षेत्रीय सुरक्षा चाहता है जो पाकिस्तान उसे दे सकता है."

उम्मीद की किरण

तनाव और ग़लत बयानी के एक लंबे दौर के बाद सऊदी अरब के साथ एक बार फिर रिश्ते बेहतर करने की उम्मीद को लेकर पाकिस्तान खुश है.

आने वाले वक्त में दोनों मुल्कों के रिश्तों को मज़बूत करने के इरादे से इमरान ख़ान के सऊदी दौरे के दौरान कई बैठकों का आयोजन किया जा रहा है. इन बैठकों में ओआईसी के महासचिव और सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और अन्य अधिकारियों के साथ भी अहम बैठक शामिल है.

माना जा रहा है कि दोनों मुल्क कई अहम समझौतों पर भी हस्ताक्षर कर सकते हैं जिनमें कैदियों की रिहाई के मुद्दे पर समझौते होने की उम्मीद जताई जा रही है.

पाकिस्तान के संचार मंत्री फव्वाद हुसैन के अनुसार पाक प्रधानमंत्री का ये यात्रा "द्विपक्षीय संबंधों में एक मील का पत्थर साबित होगा."

पत्रकार कामरान ख़ान भी मानते हैं कि दोनों के द्विपक्षीय संबंधों के लिए ये यात्रा एक "अहम मोड़" साबित होगी.

डॉन अख़बार समते कई और ने पिछले साल ये सुझाव दिया था कि "आने वाले वक्त में पाकिस्तान को हर हाल में सऊदी अरब के साथ द्विपक्षीय रिश्तों संबंधों को सुधारने और मज़बूत करने की दिशा में काम करना चाहिए."

पाकिस्तान में बीते कुछ वक्त से आर्थिक, सैन्य और क्षेत्रीय समर्थन के लिए सऊदी अरब पर बहुत अधिक निर्भर होने की संभावना को लेकर भी चर्चा चल रही है.

इन हालातों के बीच अख़बार डॉन का कहना है कि "द्विपक्षीय संबंधों में सुधार होना चाहिए लेकिन ये संप्रभुता की कीमत पर नहीं होना चाहिए."

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English summary
Pakistan Prime Minister Imran Khan reached Saudi Arabia
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