तालिबान, बलूच, TTP, TJP... पालतू सांपों ने ही पाकिस्तानी आर्मी को डंसा, 2014 के बाद सबसे बड़े संकट में फंसी
Pakistan Military: दशकों से पाकिस्तान आतंकियों को पालता आया है, लेकिन सालों से पाले-पोसे गये इन सांपों ने अब पाकिस्तान की सेना को ही डंसना शुरू कर दिया है। आतंकियों के एक के बाद एक हमलों ने पाकिस्तानी सेना की कमर तोड़कर रख दी है और ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तानी सेना 2014 के बाद से अपने सबसे खराब संकट का सामना कर रही है।
जिन आतंकियों को पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ हमला करने के लिए, अफगानिस्तान की दुर्दशा के लिए दूध पिलाया, उन आतंकियों ने अब पाकिस्तान में ही हमले करने शुरू कर दिए हैं।

पिछले हफ्ते के दो हमले, ग्वादर में सेना के काफिले पर हमला, जिसमें 14 सैनिक मारे गए और पाकिस्तान वायु सेना के मियांवाली एयरबेस पर हमला, इस बात का प्रतीक है, कि आतंकियों के सामने पाकिस्तानी सेना कितनी बेबस हो चुकी है।
2014 में पाकिस्तानी सेना ने तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) सहित आतंकवादी समूहों के नेटवर्क पर बड़े पैमाने पर कार्रवाई शुरू की थी। जिसके बाद ये आतंकी समूह बौखला उठे और उन्होंने एक तरह से पाकिस्तानी सेना के खिलाफ जंग का ऐलान कर दिया।
सिर्फ आतंकियों ने ही नहीं, बल्कि पाकिस्तानी सेना को राजनीतिक प्रदर्शनकारियों के क्रोध का भी सामना करना पड़ा है। 9 मई को पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की गिरफ्तारी के बाद देश का गुस्सा पाकिस्तान की सेना के खिलाफ फूट पड़ी और प्रदर्शनकारियों ने सेना के कई प्रतिष्ठानों पर हमला किया है और यहां तक कि लाहौर कोर कमांडर के घर को भी जला दिया। पाकिस्तान के अंदर सेना के खिलाफ भारी गुस्सा भर चुका है और लोग सेना को, देश की बर्बादी का जिम्मेदार मान रहे हैं।
आतंकियों से जूझती पाकिस्तानी सेना
कुछ हिंसा के लिए पाकिस्तान की सेना ने, अफगानिस्तान में तालिबान की मौजूदगी और सीमा पर सक्रिय आतंकवादी समूहों को उसके मौन समर्थन के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है।
ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन के कबीर तनेजा ने कहा, कि "टीटीपी को पुनर्जीवित किया गया है और अफगान तालिबान के समर्थन से उसे सशक्त बनाया गया है। इसे तालिबान के कंधार गुट से समर्थन मिल रहा है, संभवतः हथियार भी, जो शायद हक्कानी गुट के खिलाफ एक दीर्घकालिक सैन्य बफर बनाना चाह रहा है।"
कबीर तनेजा ने आगे कहा, कि "पाकिस्तान में सुरक्षा बलों के खिलाफ हिंसा इस नाटक का प्रतिबिंब है।" अन्य विशेषज्ञों का मानना है कि टीटीपी ने 2014 के बाद अपनी खोई हुई ताकत वापस पा ली है।
लेफ्टिनेंट जनरल अभय कृष्ण (सेवानिवृत्त) जिन्होंने भारतीय सेना के दक्षिण पश्चिमी, पूर्वी और मध्य कमान की कमान संभाली है, उन्होंने कहा, कि "हमलों में इस वृद्धि को नूर वली महसूद के पुनरुत्थान के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, जिसके कारण स्वात और वजीरिस्तान के 30 से ज्यादा स्थानीय गुटों ने उसके प्रति निष्ठा की प्रतिज्ञा की है। इसने टीटीपी को धीरे-धीरे अपनी ताकत हासिल करते हुए देखा है, जो एक बार ज़र्ब-ए-अज़ब युग के दौरान प्राप्त हुई थी।"
उन्होंने कहा, कि अफगानिस्तान में तालिबान को दुविधा का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि टीटीपी के खिलाफ कोई भी कार्रवाई TTP को आईएसआईएस और अन्य आतंकी गुटों के साथ गठबंधन बना सकती है। लिहाजा, ये संगठन खुलकर पाकिस्तान की सेना को निशाना बना रहा है और अफगान तालिबान मौन रहकर तमाशा देखती है।
उन्होंने कहा, कि "पाकिस्तानी सेना खुद को कमजोर महसूस कर रही है, क्योंकि उसे बलूचिस्तान में उग्रवाद को एक साथ संबोधित करना होगा, टीटीपी का सामना करना होगा और पाकिस्तान में राजनीतिक उथल-पुथल के दौरान राजनीतिक शक्ति के केंद्र के रूप में अपनी भूमिका बनाए रखनी होगी।"
दिक्कत ये है, कि आतंकी संगठनों को बनाने के लिए सेना ने सरहदी जिलों में जिहादी विचारधारा फैलाई और लोगों को कट्टरपंथी विचारधारा की तरफ जोड़ा, लेकिन अब लोग उस विचारधारा में इतने लिप्त हो चुके हैं, कि वो अब आतंकियों का खुलकर समर्थन करते हैं, उन्हें किसी धमाके से पहले पूरी मदद करते हैं और स्थानीय लोगों की मदद से आतंकी बहुत आसानी से पाकिस्तानी सेना को निशाना बनता हैं।
स्थानीय लोगों के आतंकी संगठनों टीटीपी या टीजेपी से लिंक को हटाना अब संभव नहीं है, लिहाजा जिस जिहाद के जहर से पाकिस्तानी सेना भारत को नुकसान पहुंचाना चाहती थी, वो जिहादी जहर अब खुद पाकिस्तान की खत्म कर रहा है।












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