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नेपालः ओली और प्रचंड एक पार्टी में होकर भी इतने बेगाने क्यों हुए?

By सुमैया अली

ओली और प्रचंड
Getty Images
ओली और प्रचंड

नेपाल के प्रधानमंत्री खड्ग प्रसाद शर्मा ओली के लिए इन दिनों कई चीज़ें परेशानी खड़ी कर रही हैं.

देश के कोरोना संकट के साथ-साथ प्रधानमंत्री को सत्तारूढ़ नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के अंदरूनी असंतोष का भी सामना करना पड़ रहा है.

सत्तारूढ़ नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि प्रधानमंत्री ओली ने ख़ुद को अलग-थलग कर लिया है. उनके विरोधी उनसे इस्तीफ़े की मांग कर रहे हैं.

हालांकि ओली अपने रुख़ पर कायम हैं. उन्होंने काठमांडू में अपने विरोधियों और पड़ोसी देश भारत पर सरकार गिराने की कोशिश का आरोप लगाया है.

लेकिन काठमांडू में प्रधानमंत्री ओली का विरोध कर रहे लोगों में जो शख़्स सबसे ख़ास है, वो नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के वरिष्ठ नेता पुष्प कमल दहाल प्रचंड हैं.

नेपालः ओली और प्रचंड एक पार्टी में होकर भी इतने बेगाने क्यों हुए?

नेपाल में प्रचंड

प्रचंड की राजनीतिक अहमियत का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि वो प्रधानमंत्री ओली के साथ सत्तारूढ़ नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के सह-अध्यक्ष भी हैं.

साल 2018 में प्रचंड की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ नेपाल (माओइस्ट सेंटर) और ओली की अगुवाई वाली कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ नेपाल (एकीकृत मार्क्सिस्ट) के विलय के बाद नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी का गठन हुआ था.

प्रचंड नेपाल की अहम राजनीतिक शख़्सियतों में से एक हैं.

उन्होंने कभी वाम विचारधारा वाले विद्रोहियों की अगुवाई की थी जिन्हें नेपाल में माओवादी कहकर भी बुलाया जाता था.

नेपाल की राजनीति में चल क्या रहा है?

नेपालः ओली और प्रचंड एक पार्टी में होकर भी इतने बेगाने क्यों हुए?

नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी में इस तनाव की शुरुआत जून के महीने में तब हुई जब ओली सरकार ने एक नए राजनीतिक नक़्शे को मंज़ूरी दे दी.

इस नक्शे में उन इलाक़ों को नेपाल में दिखलाया गया है जिन पर भारत का दावा और नियंत्रण रहा है.

कोरोना संकट से निपटने को लेकर आलोचनाओं का सामना कर रही ओली सरकार को इस घटनाक्रम से थोड़ी राहत मिली क्योंकि आम नेपाली लोगों ने नए नक़्शे का स्वागत किया.

लेकिन इसके बाद उन्होंने इस फ़ैसले का पूरा श्रेय लेने की कोशिश की, इससे पार्टी में नाराज़गी का माहौल बना.

नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने ये आरोप लगाना शुरू कर दिया कि ओली के 'एकतरफ़ा' तरीक़े से काम करने से पार्टी में दरार पड़ रही है.

ओली का बयान

राजनीतिक माहौल में उस समय और कड़वाहट बढ़ गई जब ओली ने आरोप लगाया कि भारत और 'काठमांडू में हो रही बैठकें' उन्हें सत्ता से बेदखल करने की कोशिश कर रही है.

'काठमांडू' वाले इल्ज़ाम को प्रचंड और उनके समर्थकों से जोड़ कर देखा गया.

जून के आख़िर में ओली के हवाले से ये बयान आया, "जो बौद्धिक बहसें चल रही हैं, नई दिल्ली से आने वाली रिपोर्टों, (भारतीय) दूतावास की गतिविधियों और काठमांडू के अलग-अलग होटलों में हो रही मीटिंग्स को देखते हुए ये समझना बहुत मुश्किल नहीं लगता है कि किस तरह से लोग सक्रिय रूप से मुझे सत्ता से हटाने की कोशिश कर रहे हैं."

इन आरोपों के बाद ओली के मुख्य विरोधी प्रचंड और माधव कुमार नेपाल, झाला नाथ खनाल और बाम देव गौतम जैसे पार्टी के दूसरे वरिष्ठ नेता ने ओली का इस्तीफ़ा मांगना शुरू कर दिया.

ओली के विरोधियों की मांग है कि वो या तो प्रधानमंत्री पद से इस्तीफ़ा दें या फिर पार्टी के अध्यक्ष पद से. लेकिन ओली ने दोनों ही पदों से इस्तीफ़ा देने से इनकार कर दिया.

केपी शर्मा ओली
Reuters
केपी शर्मा ओली

राष्ट्रवाद का मुद्दा

प्रधानमंत्री ओली ने राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी से भी मिलकर उनका समर्थन हासिल करने की कोशिश की है.

और एक चौंकाने वाला क़दम उठाते हुए ओली ने संसद के सत्रावसान की सिफ़ारिश पर कैबिनेट की मुहर लगवा ली. राष्ट्रपति ने इसे मंज़ूरी दे दी और संसद का सत्र दो जुलाई को ख़त्म हो गया.

हालांकि ओली और प्रचंड के बीच इस महीने आमने-सामने की मुलाक़ातें हुई हैं लेकिन उनते मतभेद बने हुए हैं.

13 जुलाई को प्रचंड ने ओली पर निशाना साधते हुए कहा, "कोई भी राष्ट्रवाद के मुद्दे पर एकाधिकार नहीं जता सकता."

प्रचंड ने ये भी कहा कि देश के राजनीतिक नक्शे को फिर से खींचने के लिए पूरी पार्टी ने काम किया है. अभी तक वे पार्टी में किसी विभाजन की आशंका से इनकार करते रहे हैं.

"बड़ी पार्टी में विचारों में मतभेद, विवाद और बहस होती रहती है लेकिन मैं पार्टी को बिखरने नहीं दूंगा."

नेपाल
Getty Images
नेपाल

नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी

प्रधानमंत्री ओली ने पार्टी के संकट पर अभी तक कोई स्पष्ट रूप से कुछ नहीं कहा है.

इस बीच कुछ विश्लेषकों ने नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के मतभेदों में चीनी राजदूत हाउ यांकी की संभावित भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए हैं.

इसकी वजहें भी थीं क्योंकि चीनी राजदूत हाउ यांकी ने नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के कई नेताओं से मुलाक़ात की थी.

स्थानीय मीडिया में छपी रिपोर्टों के अनुसार, हाउ यांकी ने प्रचंड, झाला नाथ कमल और माधव कुमार नेपाल से अलग-अलग मुलाक़ातें की थीं.

काठमांडू में चीनी दूतावास के एक प्रवक्ता ने कहा, "राजदूत हाउ यांकी ने उम्मीद जताई है कि एनसीपी नेता अपने मतभेद सुलझा लेंगे और पार्टी में एकता में बनाए रखेंगे."

नेपाल में ऐसे हालात क्यों बने?

ओली का रुख़ कोरोना संकट की गंभीरता को कमतर करके आँकने का रहा है. वे नए राजनीतिक नक्शे का क्रेडिट लेने की कोशिश कर रहे हैं.

वे सार्वजनिक तौर पर ये कहते रहे हैं कि उनके ख़िलाफ़ राजनीतिक साज़िशें हो रही हैं. नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के राजनीतिक संकट का मुख्य कारण इन्हीं बातों को बताया जा रहा है.

जून में काठमांडू में हुए विरोध प्रदर्शनों में कोरोना संकट से निपटने के तौर-तरीक़ों को लेकर ओली सरकार के ख़िलाफ़ आवाज़ें उठीं.

उन्होंने कोरोना महामारी को हल्के में लेते हुए कहा, "कोरोना फ़्लू की तरह है. अगर कोई संक्रमित होता है, तो उसे सर्दी होगी, छींक आएगी. गर्म पानी पीना चाहिए. इससे वायरस चला जाएगा."

ओली के इन बयानों के वीडियो क्लिप्स सोशल मीडिया पर वायरल हो गए और लोगों ने उन्हें भ्रामक जानकारियां फैलने से रोकने के लिए कहा.

नेपालः ओली और प्रचंड एक पार्टी में होकर भी इतने बेगाने क्यों हुए?

राजनीतिक गतिरोध

लेकिन नए नक़्शे और राजनीतिक साज़िशों वाले इलज़ाम से उन्हें ज़्यादा मदद नहीं मिली. नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के नेता इन बयानों को 'भड़काऊ' करार देते हैं.

ओली और प्रचंड की बेनतीजा रही मुलाक़ातों से भी एनसीपी का राजनीतिक गतिरोध बढ़ा है.

पार्टी के लोगों का कहना है कि प्रधानमंत्री ओली को जैसे ही आलोचनाओं का अंदाज़ा लगता है, वे महत्वपूर्ण मुद्दों पर बहस से किनारा कर लेते हैं.

स्थानीय मीडिया के मुताबिक़ पार्टी के एक नेता ने चार जुलाई को कहा, "ऐसा लगता है कि वो ये भूल गए हैं कि वे प्रचंड के साथ इस पार्टी के सह-अध्यक्ष हैं."

एक अन्य वरिष्ठ नेता ने भी 'पार्टी में किनारे कर दिए जाने का एहसास' जाहिर किया.

नेपालः ओली और प्रचंड एक पार्टी में होकर भी इतने बेगाने क्यों हुए?

क्या प्रतिक्रियाएं हैं?

राजनीतिक विश्लेषक और नेपाली मीडिया दोनों की सत्तारूढ़ पार्टी के अंदरूनी मतभेद और भारत के साथ विवाद पर नज़र रही है.

अंग्रेज़ी अख़बार 'काठमांडू पोस्ट' ने 30 जून को पर्यवेक्षकों के हवाले से कहा, "ओली ने ये कहकर कि भारत उन्हें सत्ता से बेदखल करने की साज़िश कर रहा है, सरकार के प्रमुख की कूटनीतिक मर्यादा भंग की है. इससे दोनों देशों के रिश्ते और कमज़ोर होंगे."

उसी दिन नेपाली भाषा में छपने वाले अख़बार 'नागरिक' ने प्रधानमंत्री ओली से पार्टी और देश में एकता बनाए रखने और पड़ोसी देशों और दोस्ताना रिश्तों वाले देशों पर आरोप लगाने के बजाय आम सहमति की संस्कृति बनाने की अपील की.

न्यूज़ वेबसाइट 'नेपाली टाइम्स' का कहना है कि दहाल और ओली सरकार के गठन के बाद से ही सत्ता के लिए एक दूसरे से संघर्ष कर रहे हैं.

'नेपाली टाइम्स' ने दो जुलाई को लिखा, "बीमार चल रहे ओली के पास सबसे बेहतर रास्ता तो यही है कि वे अपना नाम वापस ले लें. वामपंथियों में ये परंपरा रही है कि वे अपनी आलोचना ख़ुद करते हैं. ओली चाहें तो इसका निर्वाह कर सकते हैं. उन्हें अपना एक पद छोड़ देना चाहिए और पार्टी की एकता बनाए रखनी चाहिए."

प्रधानमंत्री ओली का स्वास्थ्य चिंता का एक मुद्दा रहा है. इस मार्च में 69 वर्षीय ओली का दूसरी बार किडनी प्रत्यारोपण हुआ है.

BBC Hindi
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English summary
Nepal: Why did Oli and Prachanda become so ill in a party?
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