कैसे माउंट एवरेस्ट बनता जा रहा है रोगाणुओं-कीटाणुओं की चोटी ? जानिए

माउंट एवरेस्ट पर जाने वाले पर्वारोहियों की संख्या हर साल बढ़ती ही जा रही है। दुनिया की यह दुर्गम चोटी धीरे-धीरे पर्वतारोहियों के पिकनिक स्पॉट बनती जा रही है। लेकिन, वहां पर उनकी वजह से रोगाणुओं की जमघट लग रही है।

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माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई करने वाले लोगों की संख्या में बढ़ोतरी का इसकी सेहत पर बहुत ही विपरीत असर पड़ रहा है। अबतक तो हम सिर्फ यहां फैलने वाली गंदगई और कचरे को लेकर चिंतित हो रहे थे। लेकिन, अब यह पता चल रहा है कि जो लोग भी विश्व की सबसे ऊंची चोटी पर जा रहे हैं, वे वहां पर ऐसे रोगाणुं-कीटाणु छोड़कर आ रहे हैं, जो सदियों तक जीवित रह सकते हैं और खुद को विकसित भी कर सकते हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि इंसानों द्वारा छोड़े गए कुछ सूक्ष्मजीवों ने वहां के माहौल में अनुकूलन प्राप्त कर ली है और वह नई परिस्थितियों का सामना करने के लिए तैयार हो चुके हैं।

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माउंट एवरेस्ट पर सदियों के लिए अपनी छाप छोड़ रहे हैं पर्वतारोही
दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर रोगाणुओं-कीटाणुओं और विषाणुओं का अंबार संरक्षित होता जा रहा है। यह चोटी दुनिया भर के पर्वतारोहियों के लिए रोमांच से भरपूर साहसिक पर्वतारोहण के लिए अद्वितीय जगह है, तो इसके साथ कुछ अप्रिय भी घट रहा है। अभी तक तो यह जानकारी आ रही थी कि पर्वतारोहियों की बढ़ती तादाद के चलते इसपर कचरा जमा होता जा रहा है, जो कि पर्यावण के लिए बहुत ही खतरनाक है। लेकिन, अब वैज्ञानिकों को जो कुछ पता चला है, वह उससे भी गंभीर और चिंताजनक है। यह खतरा कुछ वर्षों या दशकों के लिए नहीं है, बल्कि यह सदियों बाद के लिए भी संकट बन चुका है।

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खांसने और छींकने से संरक्षित हो रहे हैं सू्क्ष्मजीव- शोध
एक नए शोध में पता चला है कि माउंट एवरेस्ट की यात्रा करने के दौरान जब कोई व्यक्ति खांसता या छींकता है, तो रोगाणुओं और कीटाणुओं के रूप में वह वहां के बर्फीले वातावरण में सदियों के लिए संरक्षित हो जाता है। शोधकर्ताओं ने पाया है कि वह कठोर माइक्रोब्स के रूप में जमी हुई विरासत छोड़ते जा रहे हैं, जो मुश्किल से मुश्किल परिस्थितियों में सदियों तक निष्क्रिय पड़े रह सकते हैं। इस शोध में एवरेस्ट पर पर्यटन की बहुतायत के प्रभाव पर बात की गई है।

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'एवरेस्ट की ऊंचाई पर ह्यूमैन सिग्नेचर जमी हुई है'
यह शोध आर्कटिक, अंटार्कटिक एंड अल्पाइन रिसर्च में प्रकाशित हुआ है। इसमें पृथ्वी के सबसे ऊंचे पहाड़ की तलछट में मौजूद सूक्ष्मजीवों के बारे में चर्चा की गई है, जिनके बारे में कम ही पता है, कि वह इस तरह से सतह तक पहुंचे और इतनी मुश्किल ऊंचाई पर कैसे जीते और सक्रिय रहते हैं। इस शोध पत्र के सीनियर ऑथर स्टीव श्मिट ने कहा है, 'एवरेस्ट के माइक्रोबायोम में इतनी ऊंचाई पर भी एक ह्यूमैन सिग्नेचर जमी हुई है।' माउंट एवरेस्ट की मिट्टी में क्या कुछ है, उन सबके बारे में सबकुछ पता लगाने के लिए शोधकर्ताओं ने इस बार नेक्स्ट जेनरेशन जीन सीक्वेंसिंग टेक्नेलॉजी का इस्तेमाल किया है।

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      कुछ रोगाणु विकसित हो चुके हैं- शोध
      उन्होंने पाया कि लगभग हर जगह पर इंसान द्वारा छोड़े गए सूक्ष्मजीवों के साथ रोगाणु मौजूद थे, जो उन्होंने पगडंडियों या कैंपों के आसपास छोड़े थे। वैज्ञानिकों को यह भी पता चला है कि कुछ रोगाणु तो विकसित (evolved) हो चुके हैं। आमतौर पर यह गर्म और गीले वातावरण में पनपते हैं लेकिन नहीं, शोध में पाया गया है कि कुछ रोगाणु ने तो अनुकूलन क्षमता विकसित कर ली है और कठोर परिस्थितियों में खुद को जीवित रखने के लिए निष्क्रिय रखना सीख चुके हैं। मिट्टी के यह सैंपल उन शोधकर्ताओं द्वारा जमा जमा की गई थी, जो पृथ्वी के सबसे ऊंचे मौसम केंद्र स्थापित करने के लिए 2019 में एवरेस्ट पर गए थे।

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      रिसर्च में दोनों तरह की तकनीकों का इस्तेमाल
      जब उन्होंने सैंपल इकट्ठा कर लिए तो उन्होंने उसमें मौजूद किसी भी जीवित और मृत रोगाणुओं के डीएनए की पहचान के लिए जीन सीक्वेंसिंग और परंपरागत कल्चरल तकनीकों का इस्तेमाल किया। शोधकर्ताओं ने कहा है कि उन्होंने जो ज्यादातर सूक्ष्मजीवों वाला डीएनए सीक्वेंस पाया है, वह उसी तरह के सख्त या extremophilic सूक्ष्म जीव के थे, जो पहले एंडीज और अंटार्कटिका के ऊंचाई वाली जगहों पर मिल चुके थे। पुराने और नए दोनों तरीकों का इस्तेमाल करते हुए उन्होंने सबसे प्रचुर मात्रा में जो सूक्ष्मजीव पाया, वह जीनस नग्नेशिया में एक फंगस था।

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      इंसान की नाक, त्वचा और मुंह से मिला कनेक्शन
      लेकिन, इसके साथ ही उन्होंने इंसानों से जुड़े कुछ सूक्ष्मजीवों का माइक्रोबियल डीएनए भी पाया है,जिसमें स्टैफिलोकोकस भी शामिल है, जो त्वचा और नाक में पायी जाने वाली सामान्य बैक्टीरिया है। वहीं, उन्हें स्ट्रेप्टोकोकस भी मिले हैं, जो इंसान के मुंह में पाया जाने वाला प्रमुख जीनस(वंश) है।

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