मसूद अजहर: कैसे 10 वर्षों से जिद पर अड़ा चीन बस एक माह में हुआ राजी!
न्यूयॉर्क। बुधवार एक मई को वह पल आ गया जब यूनाइटेड नेशंस (UN) ने जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर (Masood Azhar) को ग्लोबल आतंकी (Global Terrorist) घोषित कर दिया। चीन (China) ने अपना अड़ियल रवैया छोड़कर भारत के लिए इस काम को आसान किया जब उसने अजहर पर लगा टेक्निकल होल्ड हटा दिया। मसूद अजहर का ग्लोबल आतंकी घोषित होना भारत के लिए एक बड़ी जीत है। जनवरी 2016 में हुए पठानकोट आतंकी हमले के बाद से ही भारत इस दिशा में काम कर रहा था और आखिर करीब साढ़े तीन वर्ष बाद उसकी कोशिशें रंग लाई। 14 फरवरी को पुलवामा में हुए आतंकी हमले के बाद अमेरिका, फ्रांस और यूके भारत के साथ आकर खड़े हुए थे।

इंडोनेशिया के राजदूत ने दी खबर
अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक बुधवार को अमेरिका के न्यूयॉर्क में सुबह करीब नौ बजे के बाद यूएन में भारत के स्थायी प्रतिनिधि सैयद अकबरुद्दीन को इंडोनेशिया के राजदूत की ओर से यह गुड न्यूज दी गई थी। उन्होंने अकबरुद्दीन को मैसेज भेजकर जानकारी दी गई कि यूएनएससी की 1267 प्रतिबंध समिति को बता दिया गया है कि मसूद अजहर को ग्लोबल आतंकी साबित करने के प्रस्ताव पर किसी भी देश की तरफ से कोई विरोध नहीं किया गया है। चीन ने 10 वर्षों बाद अपना विरोध खत्म किया, अजहर पर टेक्निकल होल्ड हटाया और उसे एक ग्लोबल आतंकी साबित करने में बड़ा योगदान दिया। दिल्ली के लिए यह बड़ी जीत तो है लेकिन इसके पीछे कई माह की मेहनत और कोशिशें थीं। चीन ने 13 मार्च को चौथी बार अजहर को साबित करने वाले प्रस्ताव पर टेक्निकल होल्ड लगाकर इसमें अड़ंगा डाल दिया था।

कश्मीर में आतंकी हमले की निंदा
चीन का विरोध जारी था लेकिन अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस जैसी सुपरपावर की ओर से लगातार अजहर को लेकर दबाव जारी था। अमेरिका की ओर से 13 मार्च को चीन के फैसले के बाद एक और प्रस्ताव लाया गया था और इसे फ्रांस और यूके का भी समर्थन हासिल था। भारत को अजहर पर सफलता मिलेगी इसका अंदाजा उसी समय हो गया था, जब पुलवामा हमले के बाद पहली बार यूएन की ओर से आतंकी हमले की निंदा करने वाला बयान जारी किया गया। पहला मौका था जब यूएन सिक्योरिटी काउंसिल ने कश्मीर में हुए किसी हमले की सार्वजनिक तौर पर निंदा की थी। 21 फरवरी को सिक्योरिटी काउंसिल की तरफ से बयान जारी हुआ जिसमें जैश का नाम लिया गया था। यहां से भारत के लिए रास्ता आसान हुआ और उसने अजहर को आतंकी घोषित करने वाली अपनी कोशिशें और तेज कर दीं। अकबरुद्दीन के मुताबिक सिक्योरिटी काउंसिल की ओर से 21 फरवरी को आया बयान काफी अहम साबित हुआ। इस बयान के साथ ही यह पता लग पाया कि यूएनएससी में अजहर को लेकर आम सहमति है।

अमेरिका समेत दुनिया के कई देश भारत के साथ
इसके छह दिन बाद ही अमेरिका, यूके और फ्रांस की ओर से दूसरा प्रस्ताव लाया गया जिसमें अजहर को आतंकी घोषित करने की मांग की गई थी। भारत की मांग को काउंसिल और काउंसिल के बाहर भी समर्थन मिलता जा रहा था। अकबरुद्दीन ने बताया कि इस बार सिर्फ भारत हीं नहीं बल्कि अफ्रीका, यूरोप, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जापान और कनाडा भी जैश सरगना को आतंकी घोषित करने की मांग करने लगे थे। मार्च में काउंसिल की दूसरी मीटिंग हुई और चीन ने फिर से वीटो का प्रयोग करके प्रस्ताव पर अड़ंगा डाल दिया। इस बार फिर से लगा कि भारत को छह माह का इंतजार करना पड़ेगा। सूत्रों की मानें तो इस बीच चीन के साथ लगातार वार्ता जारी थी और लगने लगा था कि चीन कुछ हद तक अजहर पर अपना मन बना चुका है।

चीन की प्रतिष्ठा थी दांव पर
वहीं अमेरिका ने तय कर लिया था कि छह माह नहीं बल्कि मार्च के अंत में ही इस कोशिश को फिर से आगे बढ़ाया जाएगा। सूत्रों की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक अभी जो मौका है अगर उसे गंवा दिया तो फिर अजहर कभी आतंकी नहीं घोषित नहीं हो पाएगा। ऐसे में जब अमेरिका ने नया प्रस्ताव पेश किया तो सिक्योरिटी काउंसिल को बता दिया गया था कि वह यूके और फ्रांस के साथ प्रस्ताव ला रहा है। इसके बाद ही काउंसिल में चर्चा के बाद वोटिंग प्रक्रिया का रास्ता खुला। अमेरिका मान रहा था कि इस बार अगर चीन ने फिर से बाधा डाली तो वह परेशानी में पड़ सकता है। चीन अगर सार्वजनिक तौर पर एक आतंकी का बचाव करता तो दुनिया को पता लग सकता। चीन को मालूम था कि सार्वजनिक स्तर पर चर्चा से बचाना ही सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि इससे उसकी इमेज पर असर पड़ सकता था।

जिनपिंग ने दिया इमरान को संदेश
इन सबके बीच ही विदेश सचिव विजय गोखले अमेरिका, चीन और रूस की यात्रा पर गए। इसके साथ ही भारत ने इस मुद्दे पर दुनिया को संदेश देना शुरू कर दिया था। चीन ने अपना मन बना लिया था। उसने इस बार सभी फायदों और नुकसान को परखा और फिर अपनी प्रतिष्ठा को भी समझा। भारत और चीन के बीच कई मुद्दों जैसे एनएसजी और यूएनएससी की सदस्यता के बीच अजहर का मुद्दा सबसे अहम होता जा रहा था। इसकी वजह से चीन के करीबी दोस्त पाकिस्तान पर भी दबाव बढ़ रहा था। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान हाल ही में चीन गए थे। यहां पर उन्होंने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात की और इसी मुलाकात में जिनपिंग ने इमरान को अपने फैसले के बारे में बता दिया था।












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