नेपाल: ओली फिर बने प्रधानमंत्री लेकिन 30 दिन बाद क्या होगा?

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नेपाल की संसद में सबसे बड़े राजनीतिक दल कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ नेपाल (यूएमएल) के अध्यक्ष की हैसियत से खड्ग प्रसाद शर्मा ओली ने देश के प्रधानमंत्री पद की बागडोर एक बार फिर संभाल ली है.

केपी शर्मा ओली को नेपाल के प्रधानमंत्री पद से हटे हफ़्ता भी नहीं बीता था कि राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी ने शुक्रवार को उन्हें प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई.

प्रधानमंत्री ओली देश की संसद में विश्वासमत हासिल नहीं कर पाए थे जिसके बाद वे कार्यवाहक सरकार के मुखिया की भूमिका में थे.

लेकिन राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी ने गुरुवार को ओली को फिर से प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त करने का फ़ैसला किया क्योंकि वैकल्पिक सरकार के गठन के लिए किसी भी अन्य राजनीतिक दल के संसद में बहुमत हासिल करने की सूरत नहीं दिख रही थी.

प्रधानमंत्री के तौर पर ये ओली का तीसरा कार्यकाल है. नेपाल में नए संविधान के लागू होने के बाद वे साल 2015 में पहली बार प्रधानमंत्री बने थे. दूसरी बार, साल 2017 के चुनावों में प्रचंड की पार्टी के साथ गठबंधन की जीत के बाद उन्हें नेतृत्व का फिर से मौक़ा मिला.

ओली की संवैधानिक स्थिति

राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी ने संविधान के अनुच्छेद 76(2) के प्रावधानों के तहत गुरुवार शाम को आह्वान किया कि दो या उससे अधिक राजनीतिक दलों का गठबंधन संसद में बहुमत का दावा कर सकता है.

लेकिन दी गई मोहलत के भीतर किसी भी राजनीतिक दल या गठबंधन ने बहुमत का दावा नहीं किया.

जिसके बाद राष्ट्रपति ने अनुच्छेद 76(3) के प्रावधानों के तहत केपी शर्मा ओली को प्रधानमंत्री पद पर फिर से नियुक्त कर दिया.

नेपाल का संविधान ये स्पष्ट रूप से कहता है कि अनुच्छेद 76(3) के अनुसार नियुक्त किए गए किसी भी प्रधानमंत्री को पद पर नियुक्ति के 30 दिनों के भीतर संसद में विश्वास मत हासिल करना होगा.

ऐसे में ये सवाल उठता है कि ओली अगर इस एक महीने में विश्वास मत का प्रस्ताव हासिल नहीं कर पाए तो क्या होगा.

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नेपाल में नई सरकार के गठन पर क्या चल रहा है?

नेपाली संविधान के अनुच्छेद 76(5) में कहा गया है कि राष्ट्रपति संसद के किसी भी सदस्य को प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त कर सकती हैं, अगर उन्हें इस बात पर विश्वास हो कि वो संसद में विश्वासमत हासिल कर सकने की स्थिति में है.

लेकिन संविधान विशेषज्ञ बिपिन अधिकारी कहते हैं कि राष्ट्रपति पर अनुच्छेद 76(5) के पालन करने की कोई बाध्यता नहीं है.

अधिकारी कहते हैं, "राजनीतिक दल संसद भंग करके मध्यावधि चुनाव का विकल्प चुन सकते हैं. वे राष्ट्रपति को ये बता सकते हैं कि मौजूदा संसद एक स्थिर सरकार देने की स्थिति में नहीं है."

"संविधान के अनुच्छेद 76(5) के तहत किसी सरकार के गठन की बहुत कम संभावना है. बेहतर तो यही है कि प्रक्रियाओं में उलझने के बजाय चुनाव कराए जाएं."

हालांकि राजनीति और संविधान के जानकारों का ये भी कहना है कि अगर ओली महीने भर के भीतर संसद के अन्य राजनीतिक दलों को मनाकर विश्वास मत हासिल कर लेते हैं तो मौजूदा राजनीतिक अस्थिरता का माहौल खुद खत्म हो जाएगा.

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आगे क्या चुनौतियां हैं?

प्रधानमंत्री ओली के सामने दो प्रमुख चुनौतियां हैं. पहली ये कि क्या ओली अपनी ही पार्टी के नाराज़ गुटों के साथ सुलह को स्थायी रूप से जारी रख पाएंगे.

इसके लिए उन्हें असंतुष्ट नेताओं की मांग के मुताबिक़ मई, 2018 के बाद लिए गए अपने हर फ़ैसले को पलटना होगा.

ओली की पार्टी के असंतुष्ट धड़े के नेता गोकर्ण बिष्ट ने कहा है, "सीपीएन (यूएमएल) और सीपीएन (माओइस्ट सेंटर) के विलय को रद्द करने के सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद हमारा मानना है कि हमें 16 मई, 2018 की स्थिति में लौट जाना चाहिए. पार्टी अध्यक्ष ओली और माधव कुमार नेपाल के बीच इस मुद्दे पर सहमति बनने से सीपीएन (यूएमएल) में एकता बनाए रखने में मदद मिलेगी."

एक रिट याचिका की सुनवाई करते हुए मार्च में नेपाल के सुप्रीम कोर्ट ने ओली की सीपीएन (यूएमएल) और पुष्प कुमार दाहाल 'प्रचंड ' के नेतृत्व वाले सीपीएन (माओइस्ट सेंटर) के विलय को खारिज कर दिया था.

पार्टी के असंतुष्ट नेताओं के विरोध के बीच ओली ने प्रचंड की पार्टी से सीपीएन (यूएमएल) में शामिल हुए कुछ लोगों को अपनी कैबिनेट में जगह दी है. ये वो लोग हैं जो सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद सीपीएन (यूएमएल) में शामिल हुए हैं.

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हालांकि ओली ने अपनी पार्टी के असंतुष्ट धड़े के एक भी चेहरे को शुक्रवार को गठित 25 सदस्यीय कैबिनेट में शामिल नहीं किया है.

ओली ने अपनी पिछली कैबिनेट के मंत्रियों को भी सरकार में बनाए रखा है.

गोकर्ण बिष्ट का कहना है कि मई, 2018 की स्थिति में लौटने का मकसद ये है कि इससे पार्टी की कमेटियां और शाखाएं फिर से सक्रिय हो जाएंगी जिनका चुनाव पार्टी की महासभा से होता है.

वे कहते हैं, "राम बहादुर थापा (गृह मंत्री) और पार्टी से जुड़ने के लिए इच्छुक अन्य नेताओं को सीपीएन (यूएमएल) में शामिल कराने का फ़ैसला आम सहमति बनाने के बाद लिया जा सकता है. इससे पार्टी को और मजबूत बनाने में मदद मिलेगी."

राम बहादुर थापा और कुछ अन्य नेता सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद प्रचंड का साथ छोड़कर ओली की पार्टी में आ गए हैं.

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गोकर्ण बिष्ट ने इस बात पर भरोसा जताया है कि गुरुवार को माधव कुमार नेपाल और ओली के बीच बनी सहमति के आधार पर दोनों धड़ों के नेताओं का एक टास्ट फोर्स गठित किया जाएगा.

अपने सियासी कुनबे में एकता बनाए रखने के बाद ओली के सामने दूसरी सबसे बड़ी चुनौती संसद में बहुमत हासिल करने की है.

ओली की सीपीएन (यूएमएल) के पास नेपाल की संसद में 121 सीटें हैं और बहुमत हासिल करने के लिए उसे 15 और सांसदों का समर्थन चाहिए.

ऐसा लग रहा है कि ओली अगर जनता समाजवादी पार्टी के महंथ ठाकुर धड़े को मनाने में कामयाब हो जाते हैं तो वे बहुमत का जादुई आंकड़े तक पहुंचने में कामयाब हो जाएंगे.

उनके पास राजनीतिक बाधाओं से पार पाने के लिए फिलहाल 30 दिनों का समय है.

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