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Explainer: मिलिट्री डायलॉग, ट्रेड वार पर तेवर ढीले.. बाइडेन-जिनपिंग की बैठक, भारत को क्यों रहना चाहिए सतर्क?

Joe Biden-Xi Jinping Meeting: व्हाइट हाउस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने रविवार को कहा, कि तनाव बरकरार रहने के कारण अमेरिका और चीनी सेनाओं के बीच फिर से बातचीत बहाल करना, राष्ट्रपति जो बाइडेन के लिए प्राथमिकता होगी, जब वह बुधवार को अपने चीनी समकक्ष शी जिनपिंग से मुलाकात करेंगे।

व्हाइट हाउस का ये बयान उस वक्त आया है, जब अमेरिका पहले ही संकेत दे चुका है, कि वो चीन के साथ व्यापार युद्ध को शांत करने के लिए विकल्पों की तलाश कर रहा है। अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेक सुलिवन ने सीबीएस न्यूज के "फेस द नेशन" में कहा, कि "राष्ट्रपति मिलिट्री-टू-मिलिट्री संबंधों की पुन: स्थापना के लिए प्रतिबद्ध हैं।"

biden xi jinping meeting

सुलिवन ने कहा, कि "उनका (बाइडेन का) मानना है कि प्रतिस्पर्धा को जिम्मेदारी से मैनेज करने और यह सुनिश्चित करने के लिए, कि प्रतिस्पर्धा संघर्ष में न बदल जाए, मिलिट्री टू मिलिट्री कम्युनिकेशन बहाल होना आवश्यक है।" उन्होंने कहा, कि "..और हमें कम्युनिकेशन की उन पंक्तियों की आवश्यकता है, ताकि गलतियां या गलत अनुमान या गलत कम्युनिकेशन न हो।"

उन्होंने एक और अलग इंटरव्यू में सीएनएन को बताया, कि यह चीन ही था, जिसने व्यापार, ताइवान और अन्य मुद्दों पर तनाव के बीच "मूल रूप से उन कम्युनिकेशन लाइन्स को तोड़ दिया था।"

आपको बता दें, कि अमेरिका के एनएसए जैक सुलिवन का ये बयान उस वक्त आया है, जब इस बुधवार को जो बाइडेन और शी जिनपिंग, एशिया-प्रशांत आर्थिक सहयोग (एपीईसी) शिखर सम्मेलन के मौके पर मिलने वाले हैं और दोनों नेता इस दौरान एक द्विपक्षीय बैठक करने के लिए तैयार हो गये हैं।

biden xi jinping meeting

शी जिनपिंग-बाइडेन की मुलाकात

राष्ट्रपति बनने के बाद जो बाइडेन दूसरी बार शी जिनपिंग से मुलाकात करने वाले हैं। इससे पहले, दोनों नेताओं के बीच पिछले साल इंडोनेशिया के बाली में हुए जी20 शिखर सम्मेलन के दौरान द्विपक्षीय बैठक हुई थी। लिहाजा, सवाल उठ रहे हैं, कि क्या जिस अमेरिका ने चीन को अपने लिए सबसे बड़ा खतरा बताया है, क्या वो अहम मुद्दों पर चीन के साथ समझौते के मूड में आ गया है?

या फिर, अमेरिका उस खतरे को कम करने की कोशिश कर रहा है, जो विश्व के दो हिस्सों में बंटने की वजह से उभर आई हैं, जहां दुनिया इस वक्त दो युद्धों में फंसी हुई है और ताइवान को लेकर तीसरा युद्ध छिड़ सकता है।

भारत के प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकार ब्रह्मा चेलानी ने अपने एक आर्टिकिल में लिखा है, कि "मौजूदा संकट, संघर्ष और युद्ध इस बात पर प्रकाश डालते हैं, कि हाल के वर्षों में भू-राजनीतिक परिदृश्य कितनी गहराई से बदल गया है, क्योंकि महान-शक्ति प्रतिद्वंद्विता फिर से अंतरराष्ट्रीय संबंधों का केंद्र बन गई है। गाजा और यूक्रेन में युद्धों ने वैश्विक विभाजन को बढ़ा दिया है और एक नये ग्लोबल ऑर्डर का निर्माण हो रहा है।"

चीन इस वक्त यूक्रेन युद्ध में रूस के साथ और इजराइल युद्ध में फिलीस्तीन को समर्थन दे रहा है।

लिहाजा, अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन, उनके इस दांव को समझते हैं और अब चीन के साथ तनाव कम करने की कोशिश कर रहे हैं। विशेष रूप से, बीजिंग में अपने कई कैबिनेट अधिकारियों को भेजने के बाद जो बाइडेन, इस हफ्ते सैन फ्रांसिस्को में शी जिनपिंग से मुलाकात करने वाले हैं।

उन्होंने और उनके G7 साझेदारों ने इस बात पर जोर दिया है, कि वे चीन के साथ अपने संबंधों को 'जोखिम से मुक्त' करना चाहते हैं, ना कि दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था से खुद को 'अलग' करना चाहते हैं।

भले ही इसके कोई और अर्थ क्यों ना निकाले जाएं, लेकिन जो स्थिति बन रही है, वो साफ तौर पर दर्शाता है, कि एक नया ग्लोबल ऑर्डर बन रहा है, एक नया व्यापारिक पैटर्न बन रहा है, निवेश के तरीके में बदलाव आ रहा है और वैश्विक अर्थव्यवस्था दो गुटों में विभाजित हो रही है।

उदाहरण के लिए, चीन अब पश्चिम की तुलना में ग्लोबल साउथ के साथ ज्यादा व्यापार करता है। आर्थिक नुकसान की आशंकाओं के बावजूद, चीन अपनी अर्थव्यवस्था को चुपचाप अमेरिका और पश्चिम से अलग करने की कोशिश कर रहा है, ताकि भविष्य में अमेरिकी प्रतिबंधों से उसके व्यापार पर न्यूनतम असर हो।

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अपनी ही गलती की सजा भुगत रहा अमेरिका

बहुत हद तक, इस स्थिति के लिए अमेरिका खुद ही दोषी है। चार दशकों तक चीन के आर्थिक उत्थान को सक्रिय रूप से सुविधाजनक बनाकर और बढ़ावा देकर, इसने चीन को अब तक का सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी बनाने में मदद की है।

आज, चीन दुनिया की सबसे बड़ी नौसेना बनाने का दावा कर रहा है और वैश्विक वित्तीय प्रणाली और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में पश्चिमी प्रभुत्व को खुलेआम चुनौती दे रहा है। दरअसल, चीन अब खुद को केंद्र में रखकर एक वैकल्पिक विश्व व्यवस्था बनाने के लिए कड़ी मेहनत कर रहा है।

लिहाजा, अमेरिका विकल्पहीन नजर आ रहा है। वहीं, दुनिया की सत्तावादी ताकतें, जैसे अरब देश भी चीन से जुड़ रहे हैं और रूस पर पश्चिमी देशों के प्रतिबंध ने उन्हें अमेरिकी अर्थव्यवस्था से खुद को अलग करने के लिए प्रोत्साहित किया है।

अमेरिका ने प्रतिबंधों को हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया है और सऊदी अरब जैसे देश इसलिए अमेरिका से अलग हो रहे हैं, और चीन इसका जबरदस्त फायदा उठा रहा है।

जैसे-जैसे अमेरिका के नेतृत्व वाली संस्थाएं कमजोर होती जा रही हैं, वैसे-वैसे दुनिया की राजनीति में अमेरिका का अधिकार भी कमजोर होता जा रहा है। यहां तक कि इजराइल और यूक्रेन, जो अपने सबसे बड़े सैन्य, राजनीतिक और आर्थिक सहयोग के लिए अमेरिका पर निर्भर हैं, उन्होंने भी कई बार अमेरिकी सलाह को ठुकरा दिया है।

लिहाजा, अमेरिका चाहता है, कि चीन के साथ तनाव को कम ही रखा जाए, ताकि गंभीर संघर्षों में चीनी सहयोग भी हासिल रखा जाए, और ऐसे में सवाल ये उठते हैं, कि की चीन के साथ तनाव की स्थिति में अमेरिका पर भारत कितना निर्भर रहे?

एक्सपर्ट्स लगातार सलाह देते हैं, कि अमेरिका पर निर्भरता खतरनाक साबित हो सकता है, क्योंकि अमेरिका सबसे पहले अपना हित देखेगा और वो उन स्थितियों को पार नहीं करेगा, जहां वो चीन के मुकाबले खुद को और कमजोर अवस्था में महसूस करे। लिहाजा, शी जिनपिंग और जो बाइडेन के बीच होने वाली मुलाकात के बाद के हालातों के लिए भारत को तैयार रहना होगा और भविष्य के ग्लोबल ऑर्डर में एक सशक्त भूमिका बनाने की स्थिति में आना होगा।

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