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बोट से दो युवक और एक कुत्ते के आर्कटिक पहुंचने की दिलचस्प कहानी

By कैलम वाटसन

DEVELOP IMAGES

फ़रवरी 2018 में दो युवा आर्किटेक्ट्स ने एक रिटायर हो चुकी स्कॉटिश लाइफ़बोट ख़रीदी और इसे अपने आप में पूर्ण एक एक्सपेडीशन होम के तौर पर तब्दील कर दिया. 5,000 किमी चलकर ये आर्कटिक सर्किल पहुंच चुके हैं और इनका सफ़र जारी है. इस सफ़र में शेकलटन नाम का एक कुत्ता भी इनका साथ दे रहा है.

20 साल तक इस बोट का नाम क्लैंसमैन लाइफ़बोट नंबर एक था. यह 11 मीटर लंबी नारंगी फाइबरग्लास की बोट है. इसमें 100 लोगों को ले जाने की क्षमता है. यह आपदाओं के वक़्त इस्तेमाल होती थी.

लाइफ़बोट को अच्छी तरह से मेंटेन रखा गया था और हर महीने इसकी टेस्टिंग होती थी, लेकिन काफ़ी वक़्त से इसका इस्तेमाल नहीं हुआ था. दो साल पहले इसे सेवा से बाहर कर दिया था और इसकी जगह और ज़्यादा आधुनिक बोट्स ने ले ली.

नीलामी में इस बोट को इंग्लैंड के दो आर्किटेक्ट्स ने 7,000 पौंड्स में ख़रीद लिया. आर्किटेक्ट का कोर्स कर चुके 29 साल के गुली सिमॉन्ड्स और 28 साल के डेविड श्नेबल एक आम नौकरी नहीं करना चाहते थे.

DAVIDSCHNABEL

वे दोनों यूनिवर्सिटी में एक दूसरे को जानते थे, लेकिन फ़िलहाल अलग-अलग देशों में काम कर रहे थे. उन्होंने नॉर्वे में एक हाइकिंग ट्रिप की योजना बनाई.

गुली के दिमाग़ में आया कि क्यों न वह एक बोट के जरिए नॉर्वे में तैरते हुए जाएं. गुली बताते हैं, 'नॉर्वे के तट बेहतरीन हैं और बोट के जरिए यहां जाना एक अच्छा अनुभव था.'

अगली चुनौती डेविड को राज़ी करने की थी. गुली कहते हैं, ''वह ज़मीन पर रहने वाला शख्स था और समुद्र से उसका ज़्यादा वास्ता नहीं था.'

जल्द ही डेविड भी इस आइडिया पर राजी हो गए और फिर दोनों ने लाइफबोट नंबर एक को ख़रीद लिया. उन्होंने अपनी नौकरियां छोड़ दीं और अब वे अपनी ज़िंदगी के सबसे बड़े डिजाइन चैलेंज का सामना कर रहे थे.

लाइफ़बोट नं. 1 का अगला सफ़र एक हल्के लोडर पर शुरू हुआ. वह ग्रीनरॉक से रिवर क्लाइड के बगल से होकर पोर्ट ऑफ न्यूहैवन के मरीन यार्ड में पहुंची.

नए मालिकों ने बोट को फिर से ख़ुद डिजाइन करने का फ़ैसला किया. इसमें प्लंबिंग, इलेक्ट्रिक और इंजन को दोबारा तैयार करने जैसी चीज़ें शामिल थीं. इसकी एक वजह पैसा बचाना भी था, लेकिन वह यह भी जानते थे कि इस काम से उन्हें जबरदस्त अनुभव हासिल होने वाला है.

लाइफ़बोट में डीजल इंजन था, लेकिन इसकी ओवरहॉलिंग ज़रूरी थी. स्पॉन्सर्स और शेयरों की बिक्री से उन्हें इसके लिए पैसे मिल गए.

@ARTICLIFEBOAT

इसका मौजूदा लेआउट हटा दिया गया. इसमें दो डबल केबिन, गेस्ट्स के लिए बंक बेड्स, सिटिंग एरिया, चार्ट टेबल, किचेन, टॉयलेट और शावर बनाए गए. लकड़ी से जलने वाला एक चूल्हा भी इसमें लगाया गया जो आर्कटिक में ठंडी रातों में काम आने वाला था.

इसमें छोटी विंड टरबाइन लगाई गईं और छत को सोलर पैनल से कवर किया गया ताकि 9,000 वॉट की पावर मिल सके.

बोट में कर्व्ड खिड़िकियां लगाई गईं जबकि इसका पिछले हिस्से का सुपरस्ट्रक्चर हटा दिया गया. इसके जरिए नया प्लाइवुड और फाइबरग्लास का कॉकपिट तैयार किया गया.

इससे उन्हें स्टोरेज करने की जगह मिली. साथ ही उन्हें बार्बेक्यू और धूप वाली शामों में बीयर पीने की जगह भी मिल गई.

उन्हें इस काम को पूरा करने में पूरा एक साल लग गया. तब तक बोट को एक नया नाम मिल गया था. यह था स्टोडिग.

गुली कहते हैं, 'लाइफबोट को मूलरूप में नॉर्वे में तैयार किया गया. और हम नॉर्वे ही हम जा रहे थे तो ऐसे में एक नॉर्वे वाला नाम हमें उपयुक्त लगा.'

वह कहते हैं, 'स्टोडिग का मतलब होता है स्थिर और भरोसेमंद और हमें इसमें यह चीज दिखाई दे रही थी. यह एक बेहद सुरक्षित घर था. लेकिन, यह नाम थोड़ा सा गड़बड़ भी था, ये बोट्स थोड़े से तूफानी समुद्र में पलट भी सकती हैं, ऐसे में इसे टिकी रहने वाली बोट नहीं कहा जा सकता था.'

पिछले साल मई में डेविड, गुली और उनका नोवा स्कोटिया डक टोलिंग रिट्रीवर शेकलटन न्यूहैवन से चल पड़े. इनका गंतव्य डोवर था.

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इसका इंटीरियर का काम पूरा नहीं हुआ था और हड़बड़ी में कई सारी चीजें एक जगह जमा होने से बोट में शुरुआत में असमान भारीपन दिखा.

गुली कहते हैं, 'यह थोड़ा सा परेशानी भरा था. हमारे पास समुद्र में ट्रायल करने का ज्यादा वक्त नहीं था. ऐसे में हमें उत्साह और चिंता दोनों ही थीं. लेकिन, अपनी बोट में पहली बार खुले समुद्र में जाने की एक अच्छी फीलिंग हो रही थी.'

डोवर से उन्होंने दुनिया की सबसे व्यस्त शिपिंग लेन को क्रॉस किया और 5,000 किमी की यात्रा शुरू हुई जिसमें वह आठ देशों से होकर गुजरने वाले थे.

इंजन में आई दिक्कत के चलते उन्हें एक पखवाड़े के लिए स्वीडन में रुकना पड़ा, लेकिन जुलाई की शुरुआत में वे नॉर्वे के लिए तैयार थे.

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द स्कागेराक को पार करते वक्त उन्हें सबसे मुश्किल चुनौती का सामना करना पड़ा. यह चुनौती थी 4 मीटर ऊंची लहरों का सामना करना.

गुली बताते हैं, 'यह एक हैवी बोट है, इस वजह से इसमें लहरों को चीरकर बढ़ने की ताकत है, लेकिन ये लहरें हमारे ऊपर चढ़कर आ रही थीं. सोचिए आप एक रोलरकोस्टर पर बैठे हों और आपको यह पता नहीं हो कि आप कब इससे गिरने वाले हैं.'

यह मुश्किलभरा वक्त आधे दिन तक जारी रहा और इसका अंत उनके नॉर्वे पहुंचने पर ही हुआ. उनकी पहले की सोची गई यात्रा यहां से शुरू होने वाली थी. उन्हें जोर्ड्स और आइसलैंड्स की 3,000 किमी की यात्रा करनी थी.

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उनका शुरुआती पड़ाव स्टोडिग का जन्मस्थान- आरेंडल में नोर्सेफ फैक्ट्री थी. यहीं पर इस लाइफबोट को 23 साल पहले तैयार किया गया था.

यह यात्रा वैसे तो एक पखवाड़े में पूरी हो सकती थी, लेकिन उन्होंने इसमें चार महीने का वक्त लिया. इस दौरान वे निर्जन जगहों पर गए, फिशिंग की, क्लाइंबिंग की और चार-पांच दिनों में उन्होंने एक नया कस्बा घूमा.

वे अपने लैपटॉप्स पर छोटे-मोटे फ्रीलांस काम भी करते रहे. साथ ही दोस्त और स्पॉन्सर उन्हें छोटी विजिट्स के लिए रास्ते में मिलते गए.

गुली कहते हैं, 'मेरे लिए सबसे अहम मेरी आजादी है. रूटीन लाइफ से मुक्ति. मुझे हर वक्त घड़ी पर नहीं देखना होता.'

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गुली कहते हैं, 'हमें कहां जाना है, इसका फैसला हम खुद रोजाना कर रहे थे. हमें इसमें मजा आ रहा था. बोट की यही आजादी थी. लेकिन, एक आखिरी गंतव्य तक भी हमें पहुंचना था.'

सितंबर में 124 दिन की यात्रा के बाद वे आखिरकार ट्रोमसो पहुंचे जो कि 70 डिग्री नॉर्थ में है. यह आर्कटिक सर्किल का सबसे बड़ा शहर है.

गुली को वहां एक नौकरी मिल गई जबकि डेविड अपना फ्रीलांस का काम करते रहे.

जब वे काम नहीं कर रहे होते थे तो वे स्कीइंग और क्लाइंबिंग के अपने शौक पर निकल जाते थे.

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फ़रवरी में यहां बर्फ की मोटी चादर बिछ गई. ऐसे वक्त पर यह बोट एक आरामदायक घर साबित हुई.

उनका गर्मियों में फिर से यात्रा शुरू करने का प्लान था. वे नॉर्थ में और आगे जाना चाहते थे, लेकिन मार्च में कोरोना के चलते उनके लिए मुश्किल आ गई.

डेविड को अपने काम की वजह से यूके में छोटी ट्रिप करनी पड़ती थीं और ऐसी ही एक विजिट के दौरान नॉर्वे ने विदेशियों के लिए अपने पोर्ट्स और एयरपोर्ट बंद कर दिए.

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पिछले दो महीने से गुली और शेकलटन डेविड के साथ आने का इंतजार कर रहे हैं ताकि वे आगे की यात्रा शुरू कर सकें.

वह कम से कम साल के अंत तक स्टोडिग को साथ रखना चाहते हैं. लेकिन, जब वक्त आएगा तो वह इस बोट को बेच देंगे. इससे मिलने वाला मुनाफा चैरिटी होप हेल्थ एक्शन को दिया जाएगा जो कि हैती में प्रोजेक्ट्स चला रही है.

स्टोडिग एक शॉर्ट फिल्म है जिसे कोपा सायमरू एंड फेब्रिल फिल्म ने बनाया है. इसमें इन दोनों की यात्रा को दिखाया गया है. इसे इसी गर्मियों में रिलीज होना है.

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सख़्त सर्दियां नाव में ही बिताईं गईं

बॉक्सिंग डे के दिन ट्राम्सो के ऊपर आसमान में नॉर्थन लाइट्स.
BBC Hindi
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English summary
Interesting story of two young men and a dog arriving in the Arctic by boat
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