पाकिस्तान ने तालिबान में बोया कलह का बीज, तीन हिस्सों में टूट सकते हैं अफगान शासक, जानें कैसे?
सिराजुद्दीन हक्कानी को आईएसआई ने ट्रेनिंग दी है और उसका हक्कानी नेटवर्क पाकिस्तान के इशारों पर ही काम करता है, जबकि तालिबान ने काबुल पर कब्जे के बाद ही कह दिया था, कि वो किसी के गुलाम नहीं हैं।

Rift in Taliban News: पाकिस्तान अपनी कुटिल चालों के लिए पूरी दुनिया में कुख्यात रहा है और अफगानिस्तान में अशांति फैलाने के पीछे पाकिस्तान का हमेशा से हाथ रहा है। पाकिस्तान ने तालिबान को फलने-फुलने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी, लेकिन पाकिस्तान इस बात को लेकर भी सतर्क रहा, कि तालिबान को वो कैसे कंट्रोल कर सकता है, लिहाजा पाकिस्तान की कोशिश तालिबान के अंदर भी वक्त आने पर फूट कराने की रही है और ताजा रिपोर्ट्स में कहा गया है, कि तालिबान के अंदर गंभीर कलह शुरू हो गया है और उस तनाव के पीछे पाकिस्तान का बहुत बड़ा हाथ है।

तालिबान में कलह के पीछे की वजह
तालिबान ने 18 महीने पहले अफगानिस्तान पर कब्जा जमाया था और अब 18 महीनों के बाद पाकिस्तान समर्थित तालिबान के सर्वोच्च नेता हिबतुल्ला अकुंदज़ादा और काबुल में अमीरात सरकार के बीच एक गंभीर आंतरिक दरार फूट पड़ा है। अफगानिस्तान के आंतरिक मंत्री सिराजुद्दीन हक्कानी, जो हक्कानी नेटवर्क का सरगना है और जो पाकिस्तान का प्यादा है, वो लड़कियों की पढ़ाई-लिखाई के मुद्दे पर कंधार स्थिति तालिबान के बड़े नेताओं से भिड़ गया है। लड़कियों की पढ़ाई के साथ साथ महिलाओं के कामकाज को लेकर सिराजुद्दीन हक्कानी ने तालिबान शासकों के सामने सवाल उठाए हैं और उनकी खुलेआम आलोचना करनी शुरू कर दी है और माना जा रहा है, कि ऐसा वो पाकिस्तान के इशारे पर कर रहा है, लिहाजा तालिबान शासकों के अंदर फूट पड़ने की नौबत आ गई है। (फोटो- सिराजुद्दीन हक्कानी)

सिराजुद्दीन हक्कानी के बगावती तेवर
11 फरवरी को हक्कानी नेटवर्क के प्रमुख सिराजुद्दीन हक्कानी ने अपने घरेलू क्षेत्र खोस्त में कहा है, कि "हमारे विचार हमारे ऊपर इतने ज्यादा हावी हो गये हैं, कि उससे सत्ता पर एकाधिकार होने लगा है और वो विचार ऐसे हो गये हैं, कि हमारे तंत्र की बदनामी होने लगी है और इस स्थिति को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है।" सिराजुद्दीन हक्कानी ने तालिबान के शासकों के ऊपर निशाना साधते हुए कहा, कि "तालिबान प्रशासन को उन नीतियों को अपनाने से बचना चाहिए, जो शासक व्यवस्था और लोगों के बीच एक कील पैदा करती हैं, जिससे दूसरों को इस्लाम को बदनाम करने के लिए इसका फायदा उठाने की अनुमति मिलती है।" आपको बता दें, कि तालिबान और हक्कानी नेटवर्क में बड़ा अंतर है। हालांकि, इस वक्त अफगानिस्तान पर दोनों मिलकर शासन कर रहे हैं, लेकिन तालिबान और हक्कानी को अगर अलग अलग करके देखें, तो हथियारों की ताकत हक्कानी नेटवर्क के पास ज्यादा है, क्योंकि उसे सीधे तौर पर पाकिस्तान से समर्थन हासिल रहा है।

तालिबान का कंधार गुट भी है शक्तिशाली
तालिबान का कंधार गुट, जिसका अगुआ हैबतुल्लाह अखुंदजादा है, जो तालिबान का सुप्रीम लीडर है और उसने सिराजुद्दीन हक्कानी के बगावती तेवर के खिलाफ उसे चेतावनी दे दी और अखुंदजादा ने सीधे तौर पर सार्वजनिक तौर पर कहा, कि "निश्चित तौर पर हक्कानी को सार्वजनिक रूप से तालिबान को बदनाम करने से बचना चाहिए, क्योंकि लड़कियों की पढ़ाई और लड़कियों का काम करना, इस्लामी नैतिकता के खिलाफ है"। अखुंदजादा ने हक्कानी को चेतावनी देते हुए कहा, कि " आंतरिक मंत्री को अपनी शिकायतों को निजी तौर पर सावधानीपूर्वक प्रकट करना चाहिए"। (फोटो- हैबतुल्लाह अखुंदजादा)

अफगानिस्तान में तालिबान को समझिए
पहले की ही तरह, अफगानिस्तान में राजनीति और सत्ता हमेशा क्रूर बाहुबल, धन, जनजाति और निश्चित रूप से पाकिस्तान के नए कुटिल चाल के साथ हमेशा से जटिल होती रही है। तालिबानी नेता मुल्ला अकुंदजादा ने भी अपना पूरा जीवन (अगस्त 2021 से पहले) पाकिस्तान के पेशावर और कराची में ही गुजारा और अमेरिकी सशस्त्र ड्रोन हमले के खिलाफ रावलपिंडी जीएचक्यू (पाकिस्तानी सेना का मुख्यालय) की सुरक्षा घेरे में था। यह वही पाकिस्तानी थे, जिन्होंने मई 2016 में बलूचिस्तान में दूसरे तालिबान के दूसरे अमीर, अख्तर मंसूर की पहचान अमेरिका को बताई थी और उसके बाद एक घातक अमेरिकी ड्रोन हमले में अख्तर मंसूर मारा गया था। वहीं, अखुंदजादा एक दुर्रानी पश्तून है, जबकि, सिराजुद्दीन हक्कानी, पूर्वी अफगानिस्तान में लोया पक्तिया हक्कानी जनजाति से संबंधित है। वहीं, तालिबान की नींव रखने वाला मुल्ला उमर कंधार के ज़बुल घिलजई पश्तून है, जिसका बेटा मुल्ला याकूब फिलहाल अफगानिस्तान का रक्षा मंत्री है।

तालिबान में कौन किसका वफादार?
खुफिया सूचनाओं और उपलब्ध जानकारियों के मुताबिक, काबुल में फिलहाल तालिबान ने जिस इस्लामिक शासन को लागू किया हुआ है, उसे तालिबान ने अमीर-उल-मोमिनीन नाम दिया है, यानि वफादारों का कमांडर। इस शासन का मकसद अफगानिस्तान के अल्पसंख्यकों के साथ साथ मुस्लिम महिलाओं के ऊपर अति-रूढ़िवादी इस्लामिक शरिया कानून को लागू करना है। इस शासन को तालिबान के साथ साथ हक्कानी नेटवर्क और मुल्ला याकूब का भी समर्थन हासिल है। वहीं, अखुंदजादा अभी तक अमेरिका से डरा हुआ है, लिहाजा वो काबुल में नहीं, बल्कि कंधार में रहता है। अखुंदजादा के आदेश पर ही 15 अगस्त 2021 को तालिबान ने अफगानिस्तान में महिलाओं के ऊपर तमाम प्रतिबंध लगाने की घोषणा की और बाद में लड़कियों की पढ़ाई पर भी पाबंदी लगा दी गई। (फोटो- तालिबान के संस्थापक मुल्ला उमर का बेटा मुल्ला याकूब)

तालिबान शासन में गुटबाजी कैसी है?
तालिबान को जानने वाले एक्सपर्ट्स के मुताबिक, आतंकवादी संगठन हक्कानी नेटवर्क के प्रमुख सिराजुद्दीन हक्कानी और पूर्व मुजाहिद मुल्ला याकूब को भी अकुंदजादा के सामने नरमपंथी के रूप में देखा जाता है। हक्कानी और मुल्ला याकूब का कहना है, कि तालिबान को ऐसी शासन व्यवस्था लागू करना चाहिए, ताकि उसे वैश्विक स्तर पर मान्यता मिलने के करीब लाया जा सके। लेकिन, अखुंदजादा ऐसा नहीं चाहता है, लिहाजा जानकारों का कहना है, कि तालिबान में दो गुट बनने लगे हैं, एक अखुंदजादा का गुट तो एक मुल्ला याकूब का गुट। चूंकी मुल्ला याकूब के पिता ने ही तालिबान की स्थापना की थी, लिहाजा तालिबान के कई बड़े नेता मुल्ला याकूब के प्रति सहानुभूति रखते हैं। वहीं, सिराजुद्दीन हक्कानी, जो हक्कानी नेटवर्क का प्रमुख है, उसने भी अपने बगावती तेवर दिखा दिए हैं, यानि ऊपर से देखा जाए, तो तालिबान शासन तीन हिस्सों में बंटता दिखाई दे रहा है।

तालिबान का आंतरिक कलह आया सामने
स्थिति ये है, कि अब तालिबान के भीतर का आंतरिक कलह खुलकर सामने आ चुका है, लिहाजा अब पूरी संभावना इस बात को लेकर है, कि काबुल के अंदर नेतृत्व परिवर्तन हो सकता है। वहीं, कंधारी मौलवियों को, जिसे देश के बाकी हिस्सों के कट्टर मौलवियों का समर्थन प्राप्त है, उन्हें मतभेदों को सुलझाने के लिए लोया जिरगा नाम के स्थान पर बुलाया जा सकता है और एक्सपर्ट्स का कहना है, कि ज्यादा संभावना इस बात को लेकर है, कि अकुंदजादा को शासन से सम्मानपूर्वक बाहर जाना होगा और उसकी जगह पर किसी और को तालिबान का सुप्रीम लीडर बनाया जा सकता है। सम्मानपूर्वक इसलिए, क्योंकि उसे तालिबान में अमीर उल मोमिनीन का दर्जा दिया गया है, यानि उसे जीवन भर के लिए नेता माना गया है। लेकिन, कई एक्सपर्ट्स का कहना है, कि अफगान राजनीति इससे कहीं ज्यादा जटिल है और इन सवालों के जवाब, डुरंड रेखा के उस पार रावलपिंडी जीएचक्यू में पाकिस्तानी सेना के पास हैं।
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तालिबान और पाकिस्तान में मतभेद
आज की तारीख में देखा जाए, तो अफगानिस्तान में तालिबान शासकों और पाकिस्तान सरकार के बीच गंभीर मतभेद बन गये हैं, और तालिबान ने अंग्रेजों के बनाए डूरंड लाइन को मानने से साफ इनकार कर दिया है। तालिबान साफ कह चुका है, कि वो पाकिस्तान के अंदर पूरे पश्तून क्षेत्र को अफगानिस्तान में शामिल करेगा और यही वो प्वाइंट है, जहां से तालिबान के नेता एक साथ आ जाते हैं और तालिबान के ऊपर से पाकिस्तान का कंट्रोल छूट जाता है। तालिबान अपने इस इरादे से टस से मस होने को तैयार नहीं हैं, क्योंकि तालिबान के लिए ये राष्ट्रवाद का मामला है। तालिबान अपनी इस इरादे के साथ पाकिस्तान से लगती सीमा पर गोलीबारी भी कर चुका है, लिहाजा ये मामला इतना जटिल हो गया है, कि विश्वसनीय रिपोर्टों से संकेत मिलता है, कि तालिबान सरकार ने आईएसआई के मौजूदा प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल नदीम अंजुम को अफगानिस्तान का वीजा देने तक से इनकार कर दिया, जो पाकिस्तान के लिए बड़ा झटका है, लिहाजा अब पाकिस्तान तालिबान को ही तोड़ने पर तुल गया है, ताकि वो फिर से अफगानिस्तान पर अपना वर्चस्व जमा सके। (ISI प्रमुख नदीम अंजुम)












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