इंडोनेशिया: ज्वालामुखी से सुनामी कैसे आती है

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इंडोनेशिया को सुनामी की कोई भनक तक नहीं थी. निश्चित रूप से कोई चेतावनी भी नहीं थी. अब तक की जो तस्वीर उभरकर सामने आई है उससे पता चलता है कि अनक क्राकटाउ द्वीप पर ज्वलामुखी के फटने के कारण शनिवार को सुंडा खाड़ी में सुनामी ने दस्तक दी.

ज़ाहिर है इस बात को सभी लोग जानते होंगे कि अनक क्राकटाउ में ज्वालामुखी समुद्र चैनल में 100 साल से भी कम वक़्त के पहले फटी थी.

इसकी गड़गड़ाहट और विस्फोट के बारे में स्थानीय विशेषज्ञों का कहना है कि अपेक्षाकृत लो स्केल का था और इसकी निरंतरता में भी वो गति नहीं थी. दूसरे शब्दों में कहे तो यह इसकी पृष्ठभूमि का हिस्सा है.

यह सबको पता है कि ज्वालामुखी में बड़ी लहरें पैदा करने की क्षमता होती है. इन लहरों में समंदर के पानी का बड़ा हिस्सा तटों से बाहर आ जाता है.

शनिवार को आई सुनामी की सैटलाइट तस्वीरों से पता चलता है कि पश्चिम-दक्षिणपश्चिम में ज्वालामुखी फटना सुनामी का सबसे बड़ा कारण रहा. इससे लाखों टन में चट्टानी कचरे समंदर में आते हैं, जिससे समंदर की लहरों पर चौतरफ़ा दबाव बढ़ता है.

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ब्रिटेन की लीड्स यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर एंडी हूपर ज्वालामुखी स्टडी के विशेषज्ञ हैं. प्रोफ़ेसर हूपर को यूरोप के अंतरिक्षयान के सेंटनल-1 रेडार की तस्वीरों की स्टडी करते हुए इसकी व्याख्या में किसी भी किस्म का कोई शक नहीं हुआ.

वो कहते हैं, ''ज्वालामुखी के आकार के बढ़ने और पश्चिम में समुद्री प्रपात के ढलान से लहरें पैदा हुईं और इसी तरह समुद्री किनारों पर बदलाव देखने को मिला.'' प्रोफ़ेसर हूपर का कहना है कि शनिवार की सैटलाइट तस्वीरों और सेंटनल तस्वीरों की तुलना से यही पता चलता है.

पहले नहीं लगाया जा सकता है अनुमान

हालांकि इसका अनुमान पहले नहीं लगाया जा सका. जब तक टीम ज्वालामुखी के इलाक़े में निश्चित सर्वे के लिए नहीं पहुंच जाती तब तक इसे जानना आसान नहीं है. ऐसा करना भी अपने आप में ख़तरनाक होता है क्योंकि सुनामी की आशंका बनी रहती है.

समय-समय पर वैज्ञानिकों ने अनक क्राकटाउ द्वीप के भविष्य को लेकर चिंता ज़ाहिर की है. प्रसिद्ध क्राकटाउ पर्वत पर इमारतें बढ़ी हैं और 1883 में इसके कुछ हिस्सों को तूफ़ान का सामना करना पड़ा था. दक्षिण-पश्चिम किनारों पर ज्वालामुखी सबसे अस्थिर होती है.

इंडोनेशिया में बिना भूकंप के ही कैसे आई सुनामी

यहां समुद्री लहरें दसियों मीटर ऊंची उठती हैं और पास के द्वीप सर्तुंग, पंजांग और रकाटा से मिनट से भी कम वक़्त में टकराने की आशंका रहती है. ये लहरें सुंडा खाड़ी में फैलती हैं और दूर तक जाती हैं.

फैलने के वक़्त भी इसकी ऊंचाई एक से तीन मीटर तक होती है. सुनामी कब आएगी इसे लेकर पर्याप्त रहस्य बना रहता है.

समुद्री लहरों और उसकी गतिविधियों पर नज़र रखने के लिए टाइड गेज मशीन लगी होती है. शनिवार की शाम सुंडा खाड़ी में अनक क्राकटाउ में विस्फोट से पहले टाइड गेज के रिकॉर्ड में जल स्तर ऊंचा दिखा था.

आने वाले हफ़्तों में यह इलाक़ा निश्चित रूप से सुरक्षा के सवालों से जूझेगा. भूस्खलन और चट्टानों के खिसकने से आई सुनामी का असर बहुत गहरा होता है. भूगर्भीय रिकॉर्डों के अनुसार ये बड़े हादसों के लिए ज़िम्मेदार होते हैं.

भूकंप का सुनामी से नाता

2017 में ग्रीनलैंड के पश्चिमी इलाक़े फियोर्ड में चट्टानों के खिसकने से 100 मीटर ऊंची लहरें पैदा हुई थीं. इसी साल सितंबर में भी इंडोनेशिया में सुनामी आई थी और सुलावेसी द्वीप इससे बुरी तरह से प्रभावित हुआ था.

अगर भूकंप के साथ सुनामी आती तो स्थानीय लोगों को व्यापक पैमाने पर विस्थापित होना होता. ब्रिटेन की ओपन यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर डवे रोथरी का कहना है, ''पानी के भीतर चट्टानों के खिसकने के बाद भूकंप से सुनामी की चेतावनी दी जाती है.

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यह चेतावनी बूई डिवाइस से दी जाती है. यह बूई डिवाइस अनक क्राकटाउ में थी. लेकिन समुद्री लहरों की गति का अंदाज़ा इससे नहीं लग सका.'' इससे पता चलता है कि इस इलाक़े में ख़तरों का अंदाज़ा लगाने के लिए नए सिस्टम की ज़रूरत है.

भूकंप और सुनामी को समझने के लिए रिसर्च अब भी जारी है. 2004 की आपदा सुंडा समुद्री खाई से ही आई थी. इस इलाक़े में साइंस को अभी और काम करने की ज़रूरत है.

जॉर्जिया इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी के प्रोफ़ेसर हर्मान फ़्रिट्ज़ ने अमरीकन जियोफ़िजिकल कॉन्फ़्रेंस में कहा था कि सुमात्रा और जावा में ध्यान केंद्रित करने की ज़रूरत है. उन्होंने कहा कि 2011 में जापान, 2010 में चिली और 2004 में सुमात्रा इस लिहाज़ के काफ़ी अहम रहे हैं.

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