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भारत से 'अच्छे संबंध' बनाने की कोशिश में था तालिबान, लेकिन पाकिस्तान ने 'खेल' कर दिया?

भारत-तालिबान की बातचीत में क्या निकला? क्या हक्कानी नेटवर्क का साथ देकर पाकिस्तान ने तालिबान को धोखा और भारत की राह अफगानिस्तान में मुश्किल कर दी है।

नई दिल्ली/दोहा, सितंबर 05: दोहा में तालिबान के साथ भारत सरकार की बातचीत की घोषणा के चार दिन बाद विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला ने कहा कि तालिबान अब तक "आश्वस्त" और "उचित" रहा है, लेकिन उन्होंने जोर देकर कहा कि, भारत सरकार काबुल में नए शासन से सावधानी के साथ संपर्क करना जारी रखेगी। भारतीय विदेश सचिव का बयान उस वक्त आया है, जब तालिबान अफगानिस्तान में सरकार बनाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन विभिन्न गुटों के बीच मतभेदों की खबरों के बीच अफगानिस्तान में नई सरकार का गठन नहीं हो पाया है। रिपोर्ट के मुताबिक, तालिबान और हक्कानी नेटवर्क के बीच मतभेद की वजह से नई सरकार का गठन नहीं हो पाया है।

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    भारत का तालिबान पर बयान

    भारत का तालिबान पर बयान

    भारत के विदेश सचिव ने भारत-तालिबान बातचीत के बाद कहा कि, "मुझे लगता है कि उन्होंने [तालिबान] अपनी तरफ से हमें आश्वस्त करने वाली बातें की हैं। तालिबान के साथ हमारा जुड़ाव सीमित रहा है, लेकिन, इसका मतलब ये नहीं कि हमारे बीच मजबूत बातचीत नहीं हुई है। लेकिन अब तक हमने जो भी बातचीत की है, तालिबान ने ऐसा संकेत दिया है, कि उनका रवैया भारत को लेकर 'उचित' होगा''। भारतीय विदेश सचिव के बयान से इस बात का पता चलता है कि भारत और तालिबान के बीच पहले भी बातचीत हो चुकी है और तालिबान ने भारत को लेकर सकारात्मक सोच दिखाया है।

    तालिबान ने की थी पेशकश

    तालिबान ने की थी पेशकश

    वहीं, भारत सरकार की तरफ से कहा गया कि तालिबान की पेशकश के बाद ही भारत ने उनके साथ बातचीत की है और भारत सरकार के दावे का खंडन तालिबान की तरफ से नहीं किया गया, लिहाजा माना जा रहा है कि तालिबान भारत के साथ बहुत अच्छा नहीं, तो खराब संबंध भी नहीं रखना चाहता है। हालांकि, भारत सरकार की तरफ से विस्तृत जानकारी नहीं दी गई, कि तालिबान के साथ किन मुद्दों पर बातचीत की गई है, बस ये कहा गया कि अफगानिस्तान में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का मुद्दा भारत ने तालिबान के सामने उठाया।

    अफगानिस्तान में सरकार गठन में देरी

    अफगानिस्तान में सरकार गठन में देरी

    अफगानिस्तान में तालिबान की सरकार बनने में देरी हो रही है और रिपोर्ट यही है कि हक्कानी नेटवर्क के साथ तालिबान के मतभेद काफी गंभीर हो चुके हैं। बात हक्कानी नेटवर्क की करें तो ये संगठन पूरी तरह से पाकिस्तान के इशारे पर काम करता है और भारत के बड़े दुश्मनों में से एक है। हक्कानी नेटवर्क ने अफगानिस्तान में 2008-09 में भारतीय दूतावास के बाहर भयानक बम विस्फोट किया था। इसके साथ ही हक्कानी नेटवर्क भारतीय हितों को निशाना बनाने की कोशिश करता रहा है।

    हक्कानी नेटवर्क और तालिबान में अंतर

    हक्कानी नेटवर्क और तालिबान में अंतर

    वैसे तो काबुल पर कब्जे से पहले हक्कानी नेटवर्क और तालिबान एक सिक्के के ही दो पहलू थे। लेकिन, अब जब विवाद सार्वजनिक हो चुके हैं, तो पता चल रहा है कि तालिबान दो धड़ों में बंट गया है। तालिबान का नेतृत्व हैबतुल्लाह अखुंदज़ादा और उनके डिप्टी अब्दुल गनी बरादर के हाथों में है तो हक्कानी नेटवर्क के नेता सिराजुद्दीन हक्कानी, खलील हक्कानी और अनस हक्कानी हैं। काबुल पर तालिबान का नहीं, बल्कि हक्कानी नेटवर्क का ही नियंत्रण है, जो उसने सरकार बनाने के लिए हुई बैठक के दौरान कहा है। हक्कानी नेटवर्क ने साफ तौर पर तालिबान को कहा है कि काबुल पर उसने कब्जा किया है, लिहाजा सरकार में बड़ी जिम्मेदारी हक्कानी नेटवर्क की होगी, लेकिन तालिबान को इससे एतराज है। कुछ एक्सपर्ट्स ने तो यहां तक कहा कि, हक्कानी नेटवर्क पर रणनीतिक बढ़त हासिल करने के लिए ही तालिबान चाहता है कि वो भारत से रिश्ता मजबूत करे, ताकि पाकिस्तान उसपर प्रेशर नहीं बढ़ा सके।

    भारत के लिए चिंता की बात

    भारत के लिए चिंता की बात

    अगर अफगानिस्तान में सत्ता संघर्ष में हक्कानी नेटवर्क को कामयाबी मिलती है तो इसका मतलब साफ है, अफगानिस्तान में भारत की भूमिका ना के बराबर हो जाएगी और भारत के लिए टेंशन की बात भी हो जाएगी। ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के सीनियर फेलो और लेखक कबीर तनेजा ने हिंदू अखबार से बातचीत के दौरान कहा कि ''अगर हक्कानियों को अफगानिस्तान में अपना रास्ता मिल जाता है, तो भारत को चिंतित होना चाहिए, क्योंकि इससे भारतीय कूटनीति की कोई भी योजना कम हो जाएगी।'' उन्होंने कहा कि ''अगर पाकिस्तान द्वारा नियंत्रित और भारत के प्रति शत्रुतापूर्ण विचारधारा रखने वाला हक्कानी नेटवर्क तालिबान की सरकार में प्रमुख पदों पर आ जाता है, तो भारत के लिए जमीन पर उपस्थिति मुश्किल होगी।

    पाकिस्तान की भूमिका

    पाकिस्तान की भूमिका

    पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल फैज हमीद का शनिवार को काबुल में आना काफी आश्चर्यजनक था। लेकिन, इससे जाहिर होता है कि अफगानिस्तान पर असल में पाकिस्तान की ही छद्म सरकार बनने जा रही है। खासकर जब यह रिपोर्ट आ रही हो कि तालिबान के सह-संस्थापक मुल्ला बरादर को राष्ट्रपति बनाए जाने के पक्ष में पाकिस्तान नहीं है और पाकिस्तान चाहता है कि सरकार के प्रमुख पदों पर हक्कानी नेटवर्क को जगह मिले, तो फिर यह साफ हो जाता है कि, अफगानिस्तान में भारत का सफर अब खत्म होने के कगार पर पहुंच गया है। अफगानिस्तान के पूर्व मंत्री नरगिस नेहन कहती हैं कि ''पाकिस्तान खुफिया एजेंसी के चीफ का अफगानिस्तान में बनने वाली सरकार का ऑब्जर्वर बनकर आना, पाकिस्तान के मंत्रियों का बयान इस तरह से आना, मानो वो अफगानिस्तान की सरकार की प्रतिनिधि हैं, ये साफ जाहिर करता है कि अफगानिस्तान का नियंत्रण असल में किसके हाथों में जा रहा है।

    कश्मीर और चीन

    कश्मीर और चीन

    कश्मीर पर तालिबान के नेताओं के द्वारा दिया गया अलग अलग बयान भ्रमित करने वाली हैं। शुक्रवार को तालिबान के प्रवक्ता सुहैल शाहीन ने कहा कि तालिबान को "कश्मीर में मुसलमानों के लिए आवाज उठाने का अधिकार है"। तालिबान प्रवक्ता का ये बयान, तालिबान के दूसरे नेताओं के बयान से काफी अलग है, जिन्होंने कहा था कि वो भारत-पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय मुद्दों पर कोई हस्तक्षेप नहीं करेंगे और कश्मीर का मसला भारत-पाकिस्तान के बीच का मसला है। लिहाजा, तालिबान का कश्मीर पर बदला बयान भी भारत के लिए चिंता की बात है। एक और चिंताजनक संकेत चीन के साथ अफगानिस्तान की नई सरकार का जुड़ाव कैसा होगा, ये देखने वाली बात होगी। खासकर तालिबान के प्रवक्ता जबीउल्लाह मुजाहिद के इस बयान के बाद कि, नई सरकार बीजिंग से आर्थिक मदद हासिल करने की उम्मीद करती है, जो अफगान अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण के लिए "तैयार" है।

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