रूस के ख़िलाफ़ जंग में एक महीने बाद भी कैसे टिका हुआ है यूक्रेन
यूक्रेन पर रूस के हमले के एक महीने पूरे हो चुके हैं. अब तक की इस लड़ाई में यूक्रेन ने कई बाधाओं को पार किया है.
टैंक, सेना, एयरक्राफ़्ट समेत बाकी हर आंकड़े में रूस से कहीं पीछे होने के बावजूद यूक्रेन के आम नागरिकों ने सेना को मज़बूती दी. कई जगहों पर उन्होंने रूसी सैनिकों से टक्कर भी ली.
- रूस-यूक्रेन युद्ध में डीपफ़ेक राष्ट्रपति का भी हो रहा है इस्तेमाल
- यूक्रेन से जंग में क्या रूस की सेना ने ग़लतियां की हैं?
यूक्रेन ने कई हिस्से गवाएं हैं, ख़ासकर क्राइमिया के आसपास वाला क्षेत्र. क्राइमिया पर रूस ने साल 2014 में ही क़ब्ज़ा कर लिया था.
मौजूदा हमले में रूस का असली मक़सद था यूक्रेन की राजधानी कीएव समेत दूसरे बड़े शहरों पर जल्द से जल्द क़ब्ज़ा और सरकार का इस्तीफ़ा लेकिन इस मक़सद में रूस साफ़तौर पर नाकाम रहा है.
अभी भी पासा यूक्रेन के ख़िलाफ़ पलट सकता है. यूक्रेन की सेना एंटी-टैंक, एंटी एयरक्राफ़्ट मिसाइल जैसे हथियारों की कमी से जूझ रही है, जो लगातार बढ़ती आ रही रूस की सेना को रोकने के लिए ज़रूरी हैं.
यूक्रेन के पूर्वी हिस्से में सैनिकों के घिरने और मार दिए जाने का ख़तरा है. साथ ही देश की एक चौथाई आबादी अपने घरों को छोड़कर जा चुकी है, जो लोग बचे हैं वो अपने शहर को रूसी हथियारों और बमबारी की वजह से बंजर में तब्दील होता देख रहे हैं.
इन सब फ़ैक्टर्स के बाद भी युद्ध में यूक्रेन की सेना कई स्तरों पर रूस की सेना से बेहतर प्रदर्शन कर रही है.
इसी हफ्ते पेंटागन के प्रवक्ता जॉन किर्बी ने यूक्रेन की तारीफ़ करते हुए कहा था कि वो बहुत चालाकी, फ़ुर्ती और क्रिएटिव तरीक़े से अपने देश के अलग-अलग हिस्सों की सुरक्षा कर रहे हैं.
ऐसे में ये जानना ज़रूरी है कि आख़िर यूक्रेन की कामयाबी का राज़ क्या है?
1. प्रेरणा से भरपूर
रूस और यूक्रेन इन दोनों ही देशों की सेनाओं के मनोबल में बड़ा अंतर है. यूक्रेन के लोग अपने देश के अस्तित्व के लिए लड़ रहे हैं, वो अपने देश को संप्रभु राष्ट्र के तौर पर देखते रहना चाहते हैं.
युद्ध शुरू होने से ठीक पहले पुतिन ने अपने भाषण में कहा था कि यूक्रेन मूल रूप से सिर्फ़ एक कृत्रिम रूसी निर्माण है.
यूक्रेन के लोग अपनी सरकार और राष्ट्रपति के साथ खड़े हैं. यही कारण है कि जिन आम नागरिकों के पास मिलिट्री का कोई अनुभव नहीं है वो भी हथियार उठाकर अपने शहर और कस्बों की सुरक्षा के लिए तैयार हैं. वो भी ऐसे वक़्त में जब उनका सामना रूस की तरफ़ से होने वाली भारी गोलीबारी से है.
शीत युद्ध के दौरान जर्मनी में बतौर ब्रिटिश आर्मी ऑफिसर 35 साल काम करने वाले ब्रिगेडियर टॉम फॉक्स कहते हैं, ''लोग अपने अस्तित्व के लिए इसी तरह लड़ते हैं. वो अपनी मातृभूमि और परिवार की रक्षा ऐसे ही करते हैं. उनका साहस, शानदार और चौंकाने वाला दोनों है.''
वहीं अगर रूस की बात करें तो इसके उलट ज़्यादातर रूसी सैनिक स्कूल से अभी-अभी पासआउट हुए युवा हैं. उन्हें लगा था कि वो सिर्फ़ एक अभ्यास पर जा रहे हैं अब वो ख़ुद को युद्ध क्षेत्र में पाकर भ्रमित हैं.
ज़्यादातर रूसी सैनिक इस तरह की लड़ाई के लिए तैयार नहीं थे या उनके पास बिलकुल थोड़ा अनुभव था. ऐसे में खाने की कमी, और लूटपाट जैसी ख़बरें सामने आ रही हैं.
2. आदेश और नियंत्रण
ऐसा अनुमान था कि रूसी साइबर अटैक की वजह से यूक्रेन के संचार तंत्र पूरी तरह से बर्बाद हो जाएंगे लेकिन ऐसा हुआ नहीं. बजाय इसके, यूक्रेन ने युद्ध के मोर्चे पर प्रभावी समन्वय बनाए रखने में कामयाबी हासिल की है.
यूक्रेन की सरकार कीएव में सक्रिय दिख रही है और लगातार नज़रों में भी है.
वहीं रूस की सेना के पास किसी भी तरह का एकीकृत नेतृत्व नहीं है. अलग-अलग युद्ध के मोर्चे के बीच समन्वय की भी कमी है. इससे रूसी सैनिकों के मनोबल पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने का अनुमान है.
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ऐसा माना जा रहा है कि रूस के कम से कम पांच जनरल की मौत की वजह भी ये है कि वो सैनिकों को फंसने से बचाने के लिए युद्ध के मोर्चे के काफ़ी क़रीब पहुंच गए थे.
नॉन कमीशन्ड ऑफिसर (एनसीओ) जो होते हैं, जैसे कॉरपोरेल और सार्जेंट रैंक के सैनिक, वो रूस के नियमों के हिसाब से कोई पहल ख़ुद नहीं कर सकते हैं, सभी जूनियर रैंक के जवानों को ऊपर से आदेश का इंतज़ार करना होता है.
किंग्स कॉलेज लंदन के मिलिट्री एक्सपर्ट प्रोफ़ेसर माइकल क्लार्क कहते हैं कि रूसी एनसीओ भ्रष्टाचार और अक्षमता से घिरे हुए हैं.
3.युद्ध में सैनिकों और हथियारों का बेहतर इस्तेमाल
यूक्रेन के सैनिकों की संख्या रूस के सैनिकों के मुक़ाबले कहीं कम है लेकिन इसके बाद भी वो ज़मीन और अपने हथियारों का इस्तेमाल रूस से बेहतर कर रहे हैं.
एक तरफ़ रूस है जो कतारों में सैनिकों और सैन्य वाहनों को रखता है. धीमी गति से वो एक साथ आगे बढ़ते हैं तो दूसरी तरफ़ यूक्रेन के सैनिक छापामार तरीक़े का युद्ध कर रहे हैं.
वो 'हिट एंड रन' नीति अपना रहे हैं, वो चुपके से एंटी-टैंक मिसाइल को फ़ायर करते हैं और रूस की जवाबी कार्रवाई आने से पहले ही निकल जाते हैं.
इस लड़ाई से पहले अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा के नेटो ट्रेनर्स यूक्रेन में लंबा वक़्त गुज़ार चुके हैं. ऐसे में वो यूक्रेन के सैनिकों को रक्षात्मक युद्ध में तेज़ी लाने के बारे में और मिसाइल सिस्टम का बेहतर इस्तेमाल करने के बारे में निर्देश दे चुके हैं. जैसे जेवलीन और स्वीडिश डिज़ाइन NLAW एंटी टैंक हथियारों का इस्तेमाल कैसे करना है या एंट्री-एयरक्राफ़्ट मिसाइल का इस्तेमाल कैसे करना है.
प्रोफ़ेसर क्लार्क कहते हैं, ''यूक्रेनी सैनिक, रूसी सैनिकों की तुलना में ज़्यादा चालाक हैं.'' क्लार्क ये बताते हैं कि यूक्रेनी सैनिक ड्रोन, टैंक और दूसरे हथियारों समेत सभी सैन्य उपकरणों का पूरा इस्तेमाल कर चुके हैं जैसा कि हमला करने आए रूसी सैनिक अभी नहीं कर सके हैं.
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एक और सैन्य रणनीतिकार जस्टिन क्रंप कहते हैं कि यूक्रेनी सैनिक, रूसी सेना के कमज़ोर बिंदुओं को तलाशने में और उस पर कड़ी चोट देने में माहिर हैं.
वो कहते हैं, ''यूक्रेन ने अत्यधिक प्रभावी रणनीति का इस्तेमाल किया है.'' जिसमें रूस की कमज़ोर कड़ियों पर हमला करना शामिल है जैसे सप्लाई करने वाले काफ़िले पर हमला. इसके अलावा सटीक और अधिक प्रभावी टारगेट के लिए नेटो के हथियारों का भी यूक्रेन से बेहद अच्छी तरह इस्तेमाल किया है.
इस वक्त हताहतों के सटीक आंकड़े की जानकारी हासिल कर पाना मुश्किल है. पेंटागन के आंकड़ों के हिसाब से रूस के 7000 सैनिकों ने जान गंवाई है. ये संख्या सिर्फ़ एक महीने के युद्ध के बाद सामने आ रही है. अफ़ग़ानिस्तान में 10 साल की लड़ाई में सोवियत संघ के जितने लोग मारे गए थे ये संख्या उसकी आधा है.
इतने सारे रूसी जनरल फ्रंट लाइन पर कैसे मारे गए, इसको लेकर ब्रिगेडियर टॉम फॉक्स का तर्क है, ''ये मुझे जानबूझकर चलाया गया अत्यधिक सफल स्नाइपर कैंपेन की तरह लगता है, जिससे रूसी कमांड स्ट्रक्चर को धक्का लग सकता है.''
4. सूचना के मोर्चे पर 'युद्ध'
और आख़िर में बात सूचना के मोर्चे पर युद्ध की. यूक्रेन इस मोर्चे पर पूरी दुनिया में जीतता दिख रहा है. हालांकि, रूस में नहीं क्योंकि यहां पर ज़्यादातर मीडिया पर क्रेमलिन का ही नियंत्रण है.
जस्टिन क्रंप कहते हैं, ''यूक्रेन ने घरेलू और दुनिया के स्तर पर बढ़त हासिल करने के लिए सूचना के क्षेत्र का ज़बरदस्त इस्तेमाल किया है.''
किंग्स कॉलेज लंदन में पोस्ट-सोवियत स्टडीज़ की सीनियर लेक्चरर डॉक्टर रूथ डेयरमंड कहती हैं, ''यूक्रेनी सरकार ने साफ़तौर पर दुनियाभार में युद्ध के नैरेटिव पर सफलतापूर्वक नियंत्रण हासिल किया है. यूक्रेन की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा के लिए इस संघर्ष ने जो किया है वो बेहद उल्लेखनीय है.''
लेकिन, मौजूदा वक़्त में एक महीने के जिंदगी और मौत का संघर्ष भी यूक्रेन को युद्ध से उबारने के लिए पर्याप्त नहीं है. बड़ी संख्या में रूसी सैनिकों की मौजूदगी, यूक्रेन के पक्ष में नहीं है. अगर किसी भी स्थिति में पश्चिम से मिलने वाले हथियारों की आपूर्ति रुक जाती है तो यूक्रेन ज़्यादा समय तक रूस के सामने टिक नहीं पाएगा.
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