अमेरिका की इस रणनीति को कैसे चुनौती दे रहा चीन और भारत है किस ओर
एशिया-प्रशांत क्षेत्र के देश हाल में काफ़ी दुविधा से गुज़र रहे हैं कि वो दो विश्व शक्तियों के बीच कैसे तालमेल बनाएं.
अब तक ये देश अर्थव्यवस्था के लिए चीन और सुरक्षा के लिए अमेरिका पर भरोसा करते रहे हैं और हाल के सालों में इन दोनों ही देशों में दुश्मनी काफ़ी बढ़ चुकी है.
हाल ही में जो बाइडन ने एशिया का दौरा किया था जहां पर उन्होंने क्वाड सम्मेलन में भाग लिया था. क्वाड सम्मेलन के दौरान इंडो-पैसिफ़िक इकोनॉमिक फ़्रेमवर्क (IPEF) पर समझौता हुआ है.
इस क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव का सामना करने के लिए यह अमेरिका की चिंता को दिखाता है. दूसरी ओर चीन के ब्रिक और प्रशांत क्षेत्र के द्वीप देशों के साथ क़रीबी संबंध हैं.
वहीं, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया और फ़िलीपींस में नई सरकारें बनी हैं जिसके बाद से यह समझा जा रहा है कि यह वर्तमान भू-राजनीतिक स्थिति को अधिक जटिल बना रहा है.
अमेरिका के इकोनॉमिक फ़्रेमवर्क के ख़िलाफ़ चीन का अभियान
चीन लगातार कोशिशें कर रहा है कि वो ख़ुद को इन क्षेत्रीय देशों का हितैषी दिखा सके. उसने इन व्यापार साझेदारी के फ़ायदों को भी बताया है. साथ ही उसने अमेरिका के समझौते पर भी उंगली उठाई है.
अमेरिका के समझौते को 'दबावपूर्ण' बताते हुए चीन कह रहा है कि ये इन देशों को आर्थिक तौर पर कमज़ोर करेगा और क्षेत्र में शांति और स्थिरता को प्रभावित करेगा.
चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने IPEF पर आरोप लगाते हुए कहा है कि बाइडन के एशिया दौरे का मुख्य काम चीन को अलग-थलग करते हुए जानबूझकर आर्थिक विघटन, तकनीकी नाकाबंदी या औद्योगिक श्रृंखला को तोड़ना था.
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वांग ने चेताते हुए कहा कि अमेरिका इन क्षेत्रीय देशों पर लगातार दबाव डाल रहा है कि वो अर्थव्यवस्था के मामले में चीन या अमेरिका का पक्ष ले.
उन्होंने 'साज़िश' का आरोप लगाते हुए कहा कि यह 'नेटो का एशिया-प्रशांत संस्करण है जो एशिया प्रशांत क्षेत्र में नया शीत युद्ध छेड़ेगा.' चीन ने ज़ोर देते हुए कहा है कि अमेरिका का यह समझौता नाकाम होने के लिए ही बना है.
चीन की सत्ताधारी पार्टी कम्युनिस्ट पार्टी के आधिकारिक अख़बार पीपल्स डेली ने 27 मई की अपनी रिपोर्ट में लिखा था कि चीन और अमेरिका के दोस्त एक ही गुट के हैं और आशियान देश दोनों शक्तियों में से किसी एक का पक्ष नहीं लेना चाहते हैं.
सिंगापुर के प्रधानमंत्री ली शिएन लूंग ने भी इसी तरह की इच्छा जताते हुए कहा था कि एशिया-प्रशांत क्षेत्र के देश दो विश्व शक्तियों के साथ सहयोग करना चाहते हैं. उन्होंने चेताया कि एशियाई देशों को चीन समर्थित या अमेरिका समर्थित कैंपों में बांटना ठीक नहीं होगा.
चीन के सरकारी अख़बार ग्लोबल टाइम्स ने अपनी रिपोर्ट में IPEF में शामिल होने वाले देशों के बीच में विभाजन को भी दिखाया था. रिपोर्ट में कहा गया कि दक्षिण कोरिया, भारत और सिंगापुर इस फ़्रेमवर्क में शामिल होने को लेकर दुविधा में हैं क्योंकि वो 'चीन को नियंत्रित' करते हुए दिखना चाहते हैं.
ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया, फिलीपींस में नई सरकार
IPEF में शामिल 13 देशों में ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया और फिलीपींस भी शामिल हैं और इन सभी देशों में इसी दौरान नई सरकारें सत्ता में आई हैं. नई सत्ता के आने के बाद चीन के साथ उनके संबंधों के नए समीकरणों को लेकर कुछ भी साफ़ नहीं है.
ग्लोबल टाइम्स ने अपने एक संपादकीय लेख में उम्मीद जताई थी कि ऑस्ट्रेलिया के नए प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज़ चीन के प्रति 'तर्कसंगत' रवैया अपनाएंगे क्योंकि उनसे पहले देश के पूर्व प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन की चीन विरोधी नीति रही थी.
हालांकि, 24 मई को क्वाड सम्मेलन में शामिल होने के बाद उसी अख़बार ने अल्बनीज़ के ख़िलाफ़ मोर्चा खोलते हुए कहा था कि वो अपने पूर्ववर्ती की परछाई से बाहर नहीं निकले हैं.
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वहीं, दक्षिण कोरिया के नए राष्ट्रपति यून सुक-योल ने 10 मई को शपथ ली थी, उनको लेकर भी चीन के सरकारी मीडिया ने बहुत उम्मीदें जताई थीं.
ग्लोबल टाइम्स ने यून प्रशासन की अमेरिका के एंटी-मिसाइल डिफ़ेंस सिस्टम THAAD को छोड़ने की तारीफ़ की थी क्योंकि यह उसकी मुख्य नीतियों में शामिल था.
अख़बार ने भरोसा जताया था कि वो चीन के साथ बेहद 'सुचारू रूप से और सकारात्मक' रिश्तों को आगे बढ़ाएंगे.
हालांकि, दक्षिण कोरिया ने चीन से दूरी दिखाते हुए वो फिर से अमेरिका की ओर गया और IPEF में शामिल हुआ. उसने अमेरिका के साथ एक साझा बयान जारी किया जिसमें बताया गया था कि चीन के आयात पर निर्भरता को कम करने के लिए ये 'सप्लाई चेन समझौता' है.
दक्षिण कोरिया में चीन के राजदूत शिंग हेमिंग ने 20 मई को इस फ़ैसले की आलोचना करते हुए कहा था कि चीन को औद्योगिक और सप्लाई चेन से बाहर रखना 'क़ानून और बाज़ार के हितों के ख़िलाफ़' है.
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26 मई को उन्होंने साझा बयान के ख़िलाफ़ बोलते हुए दक्षिण कोरिया से निवेदन किया कि वो 'वन चाइना के सिद्धांत' के साथ ही रहें.
फिलीपींस में 9 मई को फ़र्डिनेंड मार्कोस जूनियर ने राष्ट्रपति की रेस को जीत लिया था जिसे चीन ने द्विपक्षीय संबंधों के लिए एक 'अच्छा संकेत' बताया था.
चीन की सरकार समर्थित राष्ट्रवादी समाचार वेबसाइट गुआंचा ने मार्कोस के बयान को प्रमुखता से छापते हुए उम्मीद जताई थी कि द्विपक्षीय संबंध नई ऊंचाइयों की ओर जाएंगे.
हालांकि, मार्कोस ने 26 मई को दक्षिण चीन सागर पर 2016 के अंतरराष्ट्रीय फ़ैसले को लागू करने का वादा किया था और चेतावनी दी थी कि वो अपनी 'समुद्री सीमा के अधिकारों में एक मिलिमीटर भी दख़ल नहीं देने देंगे.'
इस बात पर चीन की ओर से कोई कड़ी प्रतिक्रिया नहीं आई थी लेकिन चीन ने दोहराया था कि वो 'बातचीत के ज़रिए' मतभेद सुलझाने की कोशिश करेंगे.
गुआंचा ने मार्कोस की टिप्पणी को 'चीन पर अब तक की सबसे कड़ी टिप्पणी' बताया था. हालांकि उन्होंने मार्कोस के उस बयान को भी प्रमुखता से छापा था कि फिलीपींस चीन के साथ युद्ध नहीं कर सकता है.
चीन ब्रिक, प्रशांत क्षेत्र के द्वीपों की रणनीति
बाइडन जब दक्षिण कोरिया और जापान के दौरे पर थे तब चीन ने ब्रिक देशों के साथ बैठक करते हुए इस गुट के अन्य उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं के साथ विस्तार की मांग की थी. अर्जेंटीना के राष्ट्रपति अलबर्टो फ़र्नांडिस पहले ही इस गुट में शामिल होने में रुचि दिखा चुके हैं और इंडोनेशिया एक अन्य उम्मीदवार भी है.
चीन के विशेषज्ञों की मांग है कि ब्रिक देश व्यापार समझौतों को बढ़ाएं और अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता को कम करने के लिए राष्ट्रीय मुद्रा में तेज़ी लाएं.
26 मई से 4 जून तक वांग यी ने प्रशांत द्वीप के देशों का दौरा किया था. चीनी मीडिया ने इसे अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के अभियानों के ख़िलाफ़ चीन का अभियान बताया था.
ग्लोबल टाइम्स में विश्लेषकों ने कहा था, "अमेरिका अपनी 'भारत-प्रशांत रणनीति' के तहत चीन को सीमित करने की कोशिश कर रहा है लेकिन अब चीन के इस क्षेत्र में क़दम सर्वव्यापी हैं और यह साबित करता है कि अमेरिका की सीमित करने की रणनीति काम नहीं कर रही है."
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विदेशी मीडिया ने हाल में यह भी कहा था कि चीन और प्रशांत क्षेत्र के द्वीप देशों के विदेश मंत्रियों के बीच 30 मई को हुई बैठक में किसी क्षेत्रीय समझौते पर नहीं पहुंचा जा सका था. ग़ौरतलब है कि इससे पहले चीन और सोलोमन आइलैंड्स के बीच सुरक्षा सहयोग समझौता है जिसकी अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया आलोचना करते रहे हैं.
वांग ने इस बैठक में शामिल हो रहे सहयोगियों से अपील की थी कि वो चीन के लक्ष्य को लेकर 'चिंता' न करें और उन्होंने कहा था कि 'चीन और विकासशील देशों का साझा विकास दुनिया को अधिक निष्पक्ष, सामंजस्यपूर्ण और स्थिर बना देगा.'
इससे तीन दिन पहले फ़िजी ने घोषणा की थी कि वो IPEF में शामिल होगा. अमेरिका के इस समझौते में शामिल होने वाला प्रशांत क्षेत्र का वो पहला देश था.
दक्षिण कोरिया से लेकर फ़िजी तक दिखता है कि इस क्षेत्र में चीन और अमेरिका के बीच वर्चस्व की प्रतियोगिता और गहरी होगी.
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