जिहाद से जीता अफगानिस्तान, भीख मांगकर देश चलाएगा तालिबान? कई देशों के सामने फैलाया कटोरा

अफगानिस्तान में जिहाद के जरिए तालिबान जंग तो जीत चुका है, लेकिन तालिबान के लिए सरकार चलाना काफी ज्यादा मुश्किल होने वाला है। The Taliban has won the war through jihad in Afghanistan, but it is going to be much more diffi

काबुल, अगस्त 23: तालिबान ने जिहाद का नारा बुलंद कर हथियारों के दम पर अफगानिस्तान तो जीत लिया, लेकिन क्या अब तालिबान भीख मांगकर देश चलाएगा। अफगानिस्तान पर कब्जा करना तो तालिबान के लिए बहुत आसान साबित हुआ, लेकिन अफगानिस्तान को चलाना तालिबान को अभी से भारी पड़ने लगा है। काबुल और लगभग पूरे देश पर कब्जा करने के एक हफ्ते बाद तालिबान को यह अहसास हो गया है कि हथियारों के दम पर सत्ता हासिल करना और देश का शासन शांति के साथ चलाना, दो अलग अलग बातें हैं।

तालिबान के लिए 'मिशन इम्पॉसिबल'

तालिबान के लिए 'मिशन इम्पॉसिबल'

अफगानिस्तान पूरी दुनिया के लिए एक बहुत बड़ी समस्या की तरह है और तालिबान के लिए अफगानिस्तान में शासन चलाना तो बहुत दूर की बात है, अफगानिस्तान का प्रबंधन करना भी काफी ज्यादा मुश्किल होने वाला है। इसमें कोई शक नहीं कि तालिबान की मानसिकता छठी शताब्दी की है और वो 'माल-ए-धनीमत' (युद्ध में बर्बादी) पर अभी भी यकीन करता है और उसे लगता है कि सब बर्बाद करने के बाद शासन किया जा सकता है। इसमें कोई शक नहीं है कि तालिबान का पब्लिक रिलेशन काफी ज्यादा मजबूत है और वो 'कहानियां बनाने' में काफी ज्यादा कामयाब हो रहा है और उसकी कहानियों से लोग भ्रमित भी हो रहे हैं, लेकिन जब खजाना खाली हो तो बड़े से बड़े अर्थशास्त्री का माथा भी चकरा जाता है, यहां तो हर किसी ने हाथों में बंदूक थाम रखा है। पूरी दुनिया तालिबान द्वारा बनाए गये इस्लामिक अमीरात अफगानिस्तान के लिए अपने दरवाजे बंद कर रही है और कट्टरपंथियों के देश पाकिस्तान में भले ही जश्न का माहौल हो, लेकिन तालिबान के पास हाथ में कटोरा पकड़ने के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचा है।

कैसे शासन चलाएगा तालिबान ?

कैसे शासन चलाएगा तालिबान ?

इस्लामिक अमीरात अफगानिस्तान के लिए देश की प्रशासनिक व्यवस्था, राजनीतिक व्यवस्था, विदेश नीति, सुरक्षा, संगठनात्मक और दूसरी चुनौतियों को संभालना बहुत बड़ा सिरदर्द तो साबित होगा ही, सबसे बड़ा सिरदर्द तालिबान के लिए आर्थिक चुनौतियों से पार पाना होगा। सीधे शब्दों में कहें को इस्लामिक अमीरात को चलाने के लिए तालिबान के पास पैसे कहां हैं? अफगानिस्तान का बैकिंग सिस्टम चरमराने के कगार पर है, रिजर्व बैंक के गवर्नर और कई बड़े अधिकारी देश से जा चुके हैं, अफगानिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार अमेरिका फ्रीज कर चुका है और दूसरे वित्तीय संस्थानों ने अफगानिस्तान को आर्थिक मदद देनी बंद कर दी है। अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था पहले से ही 20 अरब डॉलर से कम है और स्थिति ये है कि एक अमेरिकी डॉलर की कीमत 8600 अफगानिस्तानी करेंसी के बराबर हो गया है, जो एक हफ्ते पहले तक सिर्फ 86 था। यानि, आप समझ सकते हैं कि अफगानिस्तान की स्थिति सिर्फ एक हफ्ते में कैसी हो गई है।

अफगानिस्तान का विदेशी व्यापार चौपट

अफगानिस्तान का विदेशी व्यापार चौपट

विदेश व्यापार, जो किसी भी देश के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है, वो अफगानिस्तान में बुरी तरह बाधित हो गया है। निवेशकों का भरोसा अफगानिस्तान पर नहीं के बराबर है। राज्य को चलाने और लोगों को सुविधाएं देने के लिए जो भी पैसों की जरूरत थी, वो अब कहीं से नहीं आ रहा है। यानि, सरकारी इनकम अभी नहीं के बराबर है। जिन उद्योगपतियों ने अफगानिस्तान में व्यापार लगाया भी था, उनमें से ज्यादातर पिछले तीन महीने में अफगानिस्तान से कारोबार समेट चुके हैं और जो थोड़े-बहुत कारोबारी बचे हैं, वो भागने के इंतजार में हैं। अमनपसंद और पढ़े लिखे प्रतिभाशाली लोग, जिनके पास थोड़े-बहुत पैसे भी हैं, वो या तो अफगानिस्तान से जा चुके हैं या किसी तरह अफगानिस्तान से बाहर निकल जाना चाहते है। सरकारी कर्मचारियों को वेतन कौन देगा और वेतन देने के लिए पैसा कहां से आएगा, किसी को नहीं पता और एक्सपर्ट्स का कहना है कि ये तो अभी बस शुरूआत है।

अभी कैसे हैं आर्थिक हालात

अभी कैसे हैं आर्थिक हालात

अफगानिस्तान सरकार को जितना रेवेन्यू मिलता है, उससे वो सिर्फ अपने बजट का 20 फीसदी काम करने के लिए ही सक्षम थी, जिसमें ज्यादातर पैसे सीमा शुल्क से आता था। वहीं, बाकी पैसा पश्चिमी देशों से आया करता था, जो करीब 4-5 बिलियन डॉलर था। अफगान राष्ट्रीय रक्षा और सुरक्षा बलों (ANDSF) के लिए लगभग 3-4 बिलियन डॉलर आते थे, जो अब खत्म हो चुका है। अब हक्कानी नेटवर्क, अलकायदा, आईएसआईएस, तालिबान, टीटीपी, जैश-ए-मोहम्मद, ईटीआईएम को मिलाकर अफगानिस्तान फोर्स का निर्माण करना होगा, जिसपर निर्माण के साथ ही प्रतिबंध लगा दिया जाएगा, यानि वो एक नया आतंकी संगठन ही बनकर रह जाएगा और फिर उस नये 'सैन्य संगठन' को चलाने के लिए करोड़ों डॉलर कहां से आएंगे? वहीं, तालिबान राज स्थापित होते ही व्यापार एक हफ्ते में ही ठप हो गया है, जिसके बाद सीमा शुल्क में तेजी से गिरावट दर्ज की गई है और आने वाले वक्त में सीमा शुल्क काफी कम हो जाएगा।

अब कहां से पैसे लाएगा तालिबान?

अब कहां से पैसे लाएगा तालिबान?

नशीले पदार्थों, जबरन वसूली, तस्करी और अन्य अवैध गतिविधियों से तालिबान अभी तक करीब 1-1.5 बिलियन डॉलर कमा लेता था, लेकिन इन गतिविधियों से आतंकी संगठन चलाया जा सकता है, एक पूरे के पूरे देश की अर्थव्यवस्था ड्रग्स पर खड़ी नहीं हो सकती है। अर्थव्यवस्था चलाने के लिए उद्योग ही चाहिए। एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट ही तरीका है, एफडीआई ही विकल्प है। और तालिबानी मॉडल से चलने वाली सरकार के राज में कौन सा उद्योगपति अपना करोड़ों गंवाने के लिए अफगानिस्तान जाएगा। जिहादी राज में कौन कारोबारी बर्बाद होने जाएगा? यानि, तालिबान के लिए जिहादी-नार्को राज्य बनकर देश चलाना नामुमकिन है। और अभी भले तालिबान को पाकिस्तान समर्थन दे रहा है, लेकिन तालिबान में शामिल कई ऐसे आतंकी संगठन हैं, जो पाकिस्तान के लिए ही खतरनाक है। लिहाजा, तमामा अफगान एक्सपर्ट्स एक बात पर सहमत हैं अगले एक से दो महीने में अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था और तंत्र पूरी तरह से टूट जाएगा और तालिबान के लिए लोगों का मुंह बंद रखने के लिए गोली मारने के अलावा कोई और विकल्प नहीं होगा।

कौन करेगा तालिबान की मदद?

कौन करेगा तालिबान की मदद?

तो फिर सवाल ये है कि तालिबान की मदद कौन करेगा? कंगाल पाकिस्तान? पाकिस्तान सिर्फ अफगानिस्तान में आग लगा सकता है, उसके पास उस आग को बुझाने के लिए भी पैसे नहीं हैं। पाकिस्तान के पास तालिबान की आर्थिक मदद करने की औकात नहीं है। हां, पाकिस्तान तालिबान के आतंकियों को भीख कैसे मांगा जा सकता है, इसका तरीका सीखा सकता है, जो पाकिस्तान का हर प्रधानमंत्री करता है। चीन किसी भी देश को सरकार चलाने के लिए कोई फंड नहीं देता है। चीन के पास ऐसा कोई बजट नहीं होता है, चीन सिर्फ लोन देता है, वो भी ऊंचे ब्याज दरों पर और चीन जानता है कि तालिबान वाले जिहादी उसके पैसे वापस नहीं कर पाएंगे, इसीलिए चीन किसी भी कीमत पर पैसे नहीं दे सकता है। रूस की आर्थिक स्थिति पहले से ही खराब है, वो तालिबान को मान्यता देने के लिए अलावा एक फूटी कौड़ी नहीं दे सकता है। अमेरिकी प्रतिबंध ने ईरान की कमर पहले से ही तोड़ रखी है और तुर्की ने जब पाकिस्तान को पैसे नहीं दिए तो फिर तालिबान को क्या देगा।

भीख मांगेगें तालिबान के जिहादी नेता?

भीख मांगेगें तालिबान के जिहादी नेता?

तालिबान के सत्ता में आते ही पाकिस्तान के प्रधानमंत्री दुनिया के तमाम मुल्कों से अफगानिस्तान के लोगों की मदद की अपील करने लगे। जाहिर सी बात है इमरान खान तालिबान के लिए भीख मांगने लगे और भीख कैसे मांगा जाए, उसका तरीका तालिबान को सिखाने लगे। जैसे इस्लाम के नाम पर इस्लामिक देशों को ब्लैकमेल करो। लेकिन, तमाम इस्लामिक देश, जैसे सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात ने अफगानिस्तान मुद्दे से पूरी तरह अपने आप को अलग कर रखा है। आपने अफगानिस्तान मुद्दे पर पाकिस्तान के अलावा किसी भी इस्लामिक देश का नाम नहीं सुना होगा। लिहाजा, इमरान खान के भीख मांगने की आवाज इस्लामिक देशों तक नहीं पहुंच पा रही है। वहीं, रिपोर्ट है कि चीन और रूस के सामने तालिबान मदद करने की बात रख चुका है, लेकिन तालिबान को पता चल गया है कि उसे एक फूटी कौड़ी नहीं मिलने वाली है, इसीलिए तालिबान के जिहादी नेता अभी तक सरकार नहीं बना पाए हैं और अभी भी अफगानिस्तान की पिछली सरकार के नेताओं से बात कर रहे हैं।

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