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पाकिस्तानी सियासत को 'इस्लामिक टच' देने का रिवाज कितना पुराना है?

इमरान ख़ान के लॉन्ग मार्च के दौरान क़ासिम सूरी ने उन्हें सलाह दी कि वे अपने भाषण में 'थोड़ा इस्लामिक टच' रखें. पाकिस्तान की राजनीति को 'इस्लामिक टच' देने की यह परंपरा आख़िर कितनी पुरानी है.

By BBC News हिन्दी
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पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास पर पिछले चार दशक से नज़र रखने वाले एक दोस्त मुस्कुराकर कहने लगे कि अबरार-उल-हक़ होते तो कहते, 'थोड़ा जिया सियासत नूँ दे देव इस्लामी टच...'

बातचीत का केंद्र क़ासिम सूरी थे जिन्होंने तहरीक-ए-इंसाफ़ के हालिया मार्च में अपने भाषण के दौरान इमरान ख़ान को सलाह दी कि वे अपने भाषण को 'थोड़ा इस्लामिक टच' दें.

उनकी यह सलाह इमरान ख़ान ने कुबूल भी की और अपने भाषण में उन्होंने कुछ यूं कहा कि मैं 'आशिक़-ए-रसूल हूं...'

हालांकि पाकिस्तान के नेताओं में कौन 'आशिक़-ए-रसूल' है और कितना? यह सवाल चर्चा का विषय नहीं है. बात ये है कि क्या इमरान ख़ान पहले राजनेता हैं, जो पाकिस्तान के मज़हब पर मर मिटने वाले जनमत को मज़हबी नारे से प्रभावित करते हैं या इस मैदान के कुछ दूसरे भी शह-सवार हैं? यदि हैं, तो वे कौन हैं और कौन किस पर भारी है?

पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास में इस दिशा में सबसे पहली और बड़ी कोशिश पाकिस्तान के संस्थापकों में से एक यानी पहले प्रधानमंत्री नवाब लियाक़त अली ख़ान के ज़माने में हुई थी. यह कोशिश 'ऑब्जेक्टिव रिज़ोल्यूशन' के रूप में हुई. यह एक ऐसा बुनियादी दस्तावेज़ रहा, जिसने पाकिस्तान के हर क़ानून को आधार मुहैया कराया.

पाकिस्तान डेवलपमेंट फ़ोरम के नासिरुद्दीन महमूद के मुताबिक़ यह प्रस्ताव काफ़ी गंभीर, ठोस और ताक़तवर दस्तावेज़ है. इसे न तो ख़त्म किया जा सकता है और न ही इसमें संशोधन हो सकता है, क्योंकि यह देश की बुनियाद है.

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पाकिस्तान के आधुनिक राजनीतिक इतिहास में ऐसा ही एक मौक़ा ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो के ज़माने में आया था. वहां का मौजूदा संविधान (1973 का) उन्हीं की देन है. भुट्टो इस्लामी समाजवाद का नारा देकर सत्ता में आए थे. सत्ता संभालने के बाद सवाल यही था कि वो संविधान कैसा बनाएंगे.

इतिहासकार प्रोफ़ेसर सलीम मंसूर ख़ालिद इस बारे में एक दिलचस्प बात बताते हैं. उन्होंने कहा, 'वो सत्ता में आए तो उन पर बड़ा दबाव था. उनके कुछ ताक़तवर साथी चाहते थे कि नया संविधान समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता की बुनियाद पर बनाया जाए, लेकिन उन्होंने इन सबको नज़रअंदाज़ करते हुए संविधान को ऐसा आधार दिया, जिसकी मदद से क़ानून बनाने में क़ुरान और सुन्नत से हटना मुमकिन नहीं रहा.'

ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो की राजनीति में धार्मिक मामलों को तीन हिस्सों में बांटा जा सकता है.

पहला, संविधान बनाने में इस्लाम की शिक्षाओं की प्रमुख भूमिका. उसके बाद, संविधान का दूसरा संशोधन, जिसके ज़रिए जनांदोलन की मांग पर अहमदियों को 'ग़ैर मुस्लिम अल्पसंख्यक' क़रार दे दिया गया.

वहीं तीसरे का संबंध 1977 में भुट्टो के ख़िलाफ़ हुए तेज़ जनांदोलन से है, जिसे बेअसर बनाने के लिए उन्होंने शराब और जुए पर पाबंदी लगाने के साथ हफ़्ते की छुट्टी शुक्रवार के दिन करने का एलान किया.

प्रोफ़ेसर सलीम मंसूर ख़ालिद, भुट्टो के पहले दो फ़ैसलों के बारे में कहते हैं, 'ये दोनों निर्णय ठोस और गंभीर थे, जिसने न केवल पाकिस्तान की वैचारिक पहचान को उजागर किया, बल्कि बुनियाद इतनी मज़बूत बना दी कि कोई उन्हें छोड़ नहीं सकता.'

जहां तक इश्क़-ए-रसूल का मामला है, तो स्तंभकार हारून रशीद ने वरिष्ठ पत्रकार मुस्तफ़ा सादिक़ की ज़ुबानी ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो का एक क़िस्सा बताया है.

मदीना मुनव्वरा के दौरे के दौरान एक बार उनके लिए रसूल के मज़ार को खोला गया. उस वक़्त भुट्टो के साथ मौजूद मुस्तफ़ा सादिक़ ने बताया कि जब वो मज़ार की तरफ़ बढ़ रहे थे तो उनका चेहरा पीला पड़ गया. वे खड़े न रह सके और श्रद्धा से घुटनों के बल चलते हुए मज़ार में प्रवेश किया.

भुट्टो के शासन के बाद जनरल ज़िया के मार्शल लॉ का ज़माना आता है. उस ज़माने में उन्होंने जनता के बीच लोकप्रियता बढ़ाने के लिए कई फ़ैसले लिए, जिनमें निज़ाम-ए-सलात, निज़ाम-ए-ज़कात और शरई अदालतों का गठन आदि शामिल हैं.

प्रोफ़ेसर सलीम मंसूर ख़ालिद का मानना है, 'शरई अदालतें जनरल ज़िया के दौर की यादगार हैं, लेकिन ये कितनी असरदार हैं और उनका फ़ायदा क्या है? ये कोई ऐसी पहेली नहीं है. उनके होने न होने से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. ये सब सियासी फ़ायदे के लिए था.'

जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ के मार्शल लॉ से पहले पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की बेनज़ीर भुट्टो और पाकिस्तान मुस्लिम लीग (एन) के नवाज़ शरीफ़ को दो-दो बार सत्ता का मौक़ा मिला.

बेनज़ीर भुट्टो ने सत्ता में आने से पहले एक ख़ास वेशभूषा अपनाई. उन्होंने पूर्वी शैली में अपना सर ढंकना शुरू कर दिया. उसी समय उनके हाथ में जाप करने वाली माला भी आ गई.

प्रोफ़ेसर सलीम मंसूर ख़ालिद कहते हैं, 'बेनज़ीर भुट्टो में आए इस बदलाव को पूर्वी रिवाजों को अपनाने की कोशिश कहा जा सकता है, लेकिन उनका कोई विरोधी भी ये आरोप नहीं लगा सकता कि वे शासक की हैसियत से दिखावटी मज़हबी गतिविधियों में शामिल रही हों.'

मज़हब के लिहाज़ से नवाज़ शरीफ़ के शासन के दोनों दौर बेनज़ीर भुट्टो की शासन शैली से अलग थे. उनके पहले दौर में शरीयत बिल मंज़ूर हुआ. इस बिल को आगे बढ़ाने वाले इस्लामी जम्हूरी इत्तेहाद के सदस्य और जमीयत उलमा-ए-इस्लाम (एस) के प्रमुख मौलाना समीउल हक़ थे.

सबसे पहले ये बिल सीनेट से मंज़ूर हुआ. बाद में उसे नेशनल असेंबली से भी पास करवाया गया. नेशनल असेंबली से मंज़ूरी के वक़्त एक कमेटी बनाई गई, जिसमें सिर्फ़ दक्षिणपंथी लोग ही नहीं बल्कि वामपंथ के कुछ भरोसेमंद लोग भी शामिल थे. उनमें अवामी नेशनल पार्टी से ताल्लुक़ रखने वाले प्रमुख मार्क्सवादी अजमल खटक भी थे.

यह शरीयत बिल मंज़ूर हो गया, लेकिन आर्थिक मामलों को इसके दायरे से बाहर रखा गया. फिर इस बिल का क्या हुआ? प्रोफ़ेसर ख़ालिद की राय में यह इतिहास का प्रावधान बनकर रह गया.

नवाज़ शरीफ़ सरकार के दूसरे कार्यकाल में संविधान के 15वें संशोधन का मसौदा तैयार हुआ, जो शुरू में ही मतभेदों का शिकार हो गया.

पूर्व विदेश मंत्री ख़ुर्शीद अहमद क़सूरी इस बारे में कहते हैं, 'इस संशोधन में ये कहा गया कि प्रधानमंत्री यदि ये समझें कि मुल्क का कोई क़ानून इस्लाम की राह में रोड़ा बन रहा है, तो उसे नेशनल असेंबली के आम बहुमत के ज़रिए बदला जा सकेगा. इसलिए मैंने इसका विरोध किया.'

नवाज़ शरीफ़ के दौर के इसी प्रस्तावित संवैधानिक संशोधन के बारे में कहा गया कि ये 'मुसलमानों का नेता' बनने की कोशिश है.

ख़ुर्शीद महमूद क़सूरी कहते हैं, 'ये कोशिश इसलिए भी नाकाम रही कि सिर्फ़ मैंने ही इसका विरोध नहीं किया बल्कि जमीयत उलमा-ए-पाकिस्तान (नियाज़ी) के प्रमुख अब्दुस सत्तार ख़ान नियाज़ी ने नेशनल असेंबली में मेरी राय का समर्थन किया.'

क़सूरी के अनुसार, 'इसके अलावा नवाज़ शरीफ़ ने राजा ज़फ़र-उल-हक़ साहब के नेतृत्व में एक सुलह समिति बनाई, जिनकी रिपोर्ट में भी मेरी बात का समर्थन किया. इस तरह शरीयत बिल का मामला शुरू में ही ख़त्म हो गया.'

जनरल मुशर्रफ़ के बाद शुरू हुए राजनीतिक युग में इमरान ख़ान वो पहले सियासी रहनुमा हैं, जिन्हें शिद्दत के साथ धार्मिक नारे लगाने के चलते शोहरत मिली.

मज़हबी नारे को इमरान ख़ान ने अपनी सियासत की शुरुआत में ही अपना लिया था. 1997 के चुनावों से पहले कराची प्रेस कल्ब में 'प्रेस से मिलिए' कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने मेरे एक सवाल के जवाब में कहा था, 'मैं वैचारिक रूप से ऐसा पाकिस्तान चाहता हूं, जिसकी बुनियाद हमारे पूर्वजों ने रखी थी.'

उनसे जब इसे विस्तार से बताने को कहा गया तो उन्होंने कहा कि वो इस्लामी विचारधारा में विश्वास रखते हैं. पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ की इस्लामी विचारधारा का अधिक विवरण तो पार्टी के किसी दस्तावेज़ में नहीं मिलता.

हालांकि 2018 के चुनावी घोषणा पत्र में लिखा गया कि पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ का मक़सद आंदोलन के रूप में न्याय आधारित वैसा समाज बनाना है, जिसकी अवधारणा पैग़ंबर मोहम्मद ने मीसाक़-ए-मदीना में रखी थी, जो नए इस्लामी शासन का आधार है.

लेकिन पाकिस्तान में उस अवधारणा को क़ानूनी तौर पर कैसे अमल में लाया जाएगा, इसका कोई ज़िक्र उस घोषणा पत्र में नहीं मिलता.

वैसे इमरान ख़ान और पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ के कुछ दूसरे नेताओं के भाषणों में 'मदीना की रियासत' की गूंज लगातार सुनाई देती है. लेकिन मदीना की रियासत बनेगी कैसे, इसका जवाब इस पार्टी के चुनावी घोषणा पत्र में नहीं मिलता.

इस तरह अपने शासनकाल में इमरान ख़ान ने इस लक्ष्य के लिए क्या किया, इसका ब्यौरा कहीं नहीं मिलता. वैसे अपने कार्यकाल में उन्होंने 'रहमतुल-लिल-आलमीन अथॉरिटी' नाम की एक संस्था बनाई थी. लेकिन इस संस्था की स्थापना का उद्देश्य क्या था?

इस बारे में मेरे एक सवाल के जवाब में अथॉरिटी के चीफ़ डॉ अनीस अहमद ने कहा, 'ऑर्डिनेंस के गज़ट नोटिफ़िकेशन के मुताबिक़, इस अथॉरिटी की स्थापना मदीना की रियासत के विचार को हक़ीक़त बनाने के लिए किया गया. इसकी बुनियाद में इंसाफ, क़ानून का शासन और लोगों का कल्याण है, जो किसी कल्याणकारी राज्य की पहचान होती है.'

इमरान ख़ान के धार्मिक रुझान और मज़हबी नारे राजनीति में चर्चा का विषय रहे हैं, लेकिन पाकिस्तान की स्थापना के बाद के शुरुआती दिनों में 'ऑब्जेक्टिव रिज़ोल्यूशन' की मंज़ूरी या 1973 के संविधान में इस्लामी क़ानूनों को सुरक्षा देने, जैसे ठोस फ़ैसले दोबारा दिखाई नहीं देते.

शायद यही वजह रही है कि पीटीआई के मज़हबी नारों को उसके दौर की सियासी पार्टियों ने गंभीरता से नहीं लिया, बल्कि उसकी आलोचना ही की.

जमीयत उलमा-ए-इस्लाम के प्रमुख मौलाना फ़ज़लुर्रहमान ने मेरे एक सवाल के जवाब में कहा कि इमरान ख़ान अलग मिज़ाज की शख़्सियत हैं और महज़ सियासी फ़ायदे के लिए वो मज़हब के किसी आदेश का इस्तेमाल करने की इरादा रखते हैं.

मौलाना फ़ज़लुर्रहमान के उलट मौलाना तारिक़ जमील, इमरान ख़ान के धार्मिक चेहरे को गंभीरता से देखते हैं.

एक इंटरव्यू में मैंने उनसे सवाल किया था कि वो इमरान ख़ान का इतने जोश से समर्थन क्यों करते हैं, तो उन्होंने कहा था, 'बतौर प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने मुझे बुलाया और कहा कि मौलाना मैं चाहता हूं कि मेरे नौजवान अपने नबी के साथ जुड़ें और उनकी गंभीरता को अपनाएं. उनसे पहले किसी भी हुक़्मरान ने मुझसे ऐसी बातें नहीं कही.'

पाकिस्तान के इतिहास में मौलाना तारिक़ जमील की गवाही क्या बदलाव लेकर आएगा, अब इसका फ़ैसला तो भविष्य में ही हो पाएगा.

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English summary
How old is the custom of giving 'Islamic touch' to Pakistani politics?
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