Independence Day: भारत की आजादी के आंदोलन ने कितने देशों पर डाला असर, जानें दुनिया में कहां कहां फैला मूवमेंट?

Independence Day: भारत स्वतंत्रता दिवस की 78वीं वर्षगांठ मना रहा है और पूरा देश जश्न में डूबा हुआ है। आजादी के बाद से आज की तारीख तक, एक गरीब देश के तौर पर कदम बढ़ाने वाला भारत, आज दुनिया की पांचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है और अगले कुछ सालों में भारत, जापान और जर्मनी को छोड़ते हुए दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा।

लेकिन, क्या आप जानते हैं, कि जब 1947 में भारत ने अंग्रेजों के हाथ से छीनकर आजादी हासिल की, तो हमारी आजादी के वैश्विक राजनीति पर क्या असर हुआ? क्या आप जानते हैं, कि हमारी आजादी ने दुनिया के किन देशों को आजादी हासिल करने के लिए प्रेरित किया।

इतिहाल के पन्नों को खंगालें, तो पता चलता है कि भारत से निकली आजादी की हवा सिर्फ भारत तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि अफ्रीका और कैरेबियन देशों तक में इसकगा असर देखने को मिला।

भारतीय आजादी के आंदोलन का असर

ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता के लिए भारतीय संघर्ष बहुत पहले शुरू हो गया था, लेकिन 1920 से 1940 के दशक तक महात्मा गांधी के नेतृत्व में अहिंसक आंदोलन की रणनीति काफी कारगर रही। गांधी का नजरिया भारत और दक्षिण अफ्रीका में पहले के संघर्षों पर आधारित था।

1947 में भारत की स्वतंत्रता ने पूरी दुनिया में राष्ट्रवादी आंदोलनों को प्रेरित किया और पूरी दुनिया में उपनिवेशवाद और स्वतंत्रता के लिए एक मॉडल प्रदान किया। 1950 तक, ऐसा लग रहा था, कि पुरानी औपनिवेशिक व्यवस्था अपनी ताकत और ऐतिहासिक प्रासंगिकता खो चुकी है।

भारत की स्वतंत्रता ने उस समय तक गुलाम रहे देशों के लिए स्वतंत्रता की मांग करने के लिए उत्प्रेरक की तरह काम किया। अंग्रेजों को भी उपनिवेश खोने पड़े और इसका नतीजा ये हुआ, कि दुनिया में एक वक्त का सबसे शक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ें टूट गईं।

अफ्रीका में यह परिवर्तन सबसे ज्यादा तेजी से देखा गया और फ्रांस को एक ही वर्ष में, साल 1960 में अपने लगभग सभी अफ्रीकी उपनिवेशों को स्वतंत्रता देनी पड़ी।

और फिर ब्रिटेन को धीरे-धीरे 1957 से 1965 तक (लीबिया-1951, घाना-1957, मोरक्को-1956, नाइजीरिया-1960) स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ने वाले इन देशों को आजादी देनी पड़ी।

भारत की आजादी के आंदोलन और स्वतंत्रता का असर दक्षिण पूर्व एशियाई देशों पर भी पड़ा और इसी का नतीजा रहा, कि अंग्रेजों को म्यांमार को साल 1948 में और इंडोनेशिया को साल 1949 में आजादी देनी पड़ी।

इसके अलावा भी भारत के स्वतंत्रता संग्राम ने दुनिया को अहिंसक आंदोलन चलाने वाले आदर्श नेता दिए, जिसने दुनिया के अन्य देशों के नेताओं को प्रेरित किया, जिनमें मार्टिन लूथर किंग और नेल्सन मंडेला सबसे प्रमुख थे।

Independence Day

अमेरिका में नागरिक अधिकार आंदोलन

अमेरिका में नागरिक अधिकार आंदोलन, महात्मा गांधी के नेतृत्व में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से व्यापक रूप से प्रभावित था। डॉ. मार्टिन लूथर किंग जूनियर पर महात्मा गांधी का काफी प्रभाव देखा गया था, जिन्होंने 1968 में अपनी मृत्यु तक अफ्रीकी-अमेरिकियों के लिए नागरिक अधिकार आंदोलन का नेतृत्व किया था।

स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय की वेबसाइट के मुताबिक, करिश्माई और बातूनी बैपटिस्ट पादरी ने पहली बार अपने सेमिनरी ट्रेनिंग के दौरान गांधी की शिक्षाओं को हासिल किया था। किंग ने तर्क दिया, कि गांधी का अहिंसा का दर्शन "स्वतंत्रता के लिए अपने संघर्ष में उत्पीड़ित लोगों के लिए खुला एकमात्र नैतिक और व्यावहारिक रूप से सही तरीका था।"

Biography.com के अनुसार, किंग ने सबसे पहले अहिंसा के सिद्धांत को मोंटगोमरी बस बहिष्कार के दौरान इस्तेमाल किया था, जो रोजा पार्क्स द्वारा एक श्वेत यात्री को अपनी सीट देने से इनकार करने के कारण शुरू हुआ था। अलबामा में बस सिस्टम को अलग करने के लिए अफ़्रीकी-अमेरिकियों ने सामूहिक विरोध प्रदर्शन किया था, जो 13 महीने तक चला था। इसका अंत 1956 में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा बस प्रणाली पर अलगाव को असंवैधानिक करार देने के साथ हुआ।

फैसले के बाद लूथर ने न्यूयॉर्क शहर में एक भीड़ से कहा था, "जीसस क्राइस्ट ने हमें यह रास्ता दिखाई और भारत के महात्मा गांधी ने हमें दिखाया, कि इस रास्ते पर हमें कैसे चलना है।" किंग ने अपनी किताब, स्ट्राइड टुवार्ड फ्रीडम में गांधी की अहिंसा की कई शिक्षाओं के बारे में विस्तार से लिखा है। किंग ने लिखा है, कि "अहिंसक प्रतिरोधी, न केवल अपने प्रतिद्वंद्वी को गोली मारने से इनकार करता है, बल्कि वह उससे नफरत करने से भी इनकार करता है।"

दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद विरोधी आंदोलन

दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद विरोधी आंदोलन को भी भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से शक्ति और प्रेरणा मिली। संघर्ष के अग्रणी नेता, नेल्सन मंडेला ने महात्मा गांधी को अपना रोल मॉडल बताया और कहा, कि गांधी की वजह से ही उन्हें आंदोलन चलाने की प्रेरणा मिलती है।

Independence Day

मंडेला ने अपनी जीवनी में लिखा है, कि "अहिंसक आंदोलन तब तक प्रभावी है, जब तक आपका विपक्ष उन्हीं नियमों का पालन करता है जो आप करते हैं।"

उन्होंने लिखा है, कि "मेरे लिए, अहिंसा कोई नैतिक सिद्धांत नहीं बल्कि एक रणनीति थी।" प्रोग्रेसिव मैगजीन ने भारत में दक्षिण अफ्रीका के पूर्व राजदूत हैरिस माजेके के हवाले से कहा, "नेल्सन मंडेला दक्षिण अफ्रीका के पिता हैं, जबकि महात्मा गांधी हमारे दादा हैं।"

म्यांमार के नेताओं पर प्रभाव

2021 में देश में सैन्य सत्ता स्थापित होने पहले, म्यांमार की आंग सान सू की को दशकों तक म्यांमार पर शासन करने वाले क्रूर जनरलों के खिलाफ, शांतिपूर्ण विरोध के एक अंतरराष्ट्रीय प्रतीक के रूप में देखा जाता था।

अल जज़ीरा ने 2012 में सू की को म्यांमार के राजनीतिक संघर्ष के बारे में यह कहते हुए उद्धृत किया था, कि "हम अपने पूर्वजों की जीत से प्रेरणा ले सकते हैं, लेकिन हम उन विचारों और रणनीति की तलाश में खुद को अपने इतिहास तक ही सीमित नहीं रख सकते हैं, जो हमारे अपने संघर्ष में सहायता कर सकें। हमें अपने औपनिवेशिक अनुभव से परे जाना होगा।"

द हिंदू ने 2012 की भारत यात्रा पर आई सू की को यह कहते हुए उद्धृत किया था, कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम और गांधी और जवाहरलाल सहित भारतीय नेताओं ने उन्हें एक लोकतांत्रिक म्यांमार की खोज के लिए प्रेरित किया था।

श्रीलंका पर भी भारत के आंदोलन का असर

श्रीलंका का स्वतंत्रता आंदोलन, जिसे 1948 में अंग्रेजों से आजादी मिली थी, वो भी गांधी के विचारों से प्रेरित था। डेक्कन क्रॉनिकल के अनुसार, श्रीलंकाई स्वतंत्रता सेनानी चार्ल्स एडगर कोरिया के आमंत्रण पर महात्मा गांधी ने 1927 में श्रीलंका (तब सीलोन) का भी दौरा किया था, यह देश की उनकी एकमात्र यात्रा थी।

गांधीजी ने श्रीलंका में कई भाषण दिए और श्रीलंका में एक स्थायी प्रभाव और विरासत छोड़ी। सीलोन टुडे के एक लेख में उल्लेख किया गया है, कि कैसे गांधी की अहिंसा की नीति ने श्रीलंका की स्वतंत्रता की खोज को 'अत्यधिक प्रभावित' किया और भारत के स्वतंत्रता संग्राम ने, बौद्ध पुनरुत्थानवादी अनागारिका धर्मपाल सहित कई उल्लेखनीय नेताओं को आंदोलित किया।

लेख में कहा गया है, कि "भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेताओं के कार्यों से प्रेरित होकर, उन्होंने संयम के साथ श्रीलंका में आंदोलन को आगे बढ़ाया, जिसमें अहिंसा को शामिल किया गया था।"

दक्षिण कोरिया पर भी भारत की आजादी का असर

कुछ लोगों का तर्क है, कि भारत का स्वतंत्रता आंदोलन, जापान से स्वतंत्रता पाने के लिए संघर्ष कर रहे कोरिया के 'मार्च फर्स्ट मूवमेंट' से प्रेरित था, लेकिन वास्तव में ये इसके ठीक विपरीत था।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर संतोष कुमार रंजन ने इंडियन एक्सप्रेस को एक रिपोर्ट में बताया था, कि उन्होंने 1920 और 1930 के बीच कोरियाई अखबारों में 50 से ज्यादा संपादकीय खोजे हैं, जिनमें ब्रिटिशों के खिलाफ भारतीय उपमहाद्वीप की लड़ाई पर प्रकाश डाला गया है।

रंजन ने कहा, कि "भारत के 1920-22 के असहयोग आंदोलन और 1931-34 के सविनय अवज्ञा आंदोलन पर कोरिया में लगभग हर दिन रिपोर्ट छापी जाती थी।"

रंजन ने कहा कि 1922 तक गांधी का कद इतना बढ़ गया था, कि कोरियाई अखबार उन्हें महात्मा कहने लगे थे। रंजन ने यह भी कहा, कि कोरियाई इतिहास की किताबों से यह भी पता चलता है, कि हाई-प्रोफाइल कोरियाई राष्ट्रवादी नेता चो मान-सिक, महात्मा गांधी के 'स्वदेशी' अभियान से प्रभावित थे। चो ने जुलाई 1920 में देशी उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए सोसायटी की स्थापना की थी।

घाना, जाम्बिया, तंजानिया और नाइजीरिया पर प्रभाव

डैनियल येर्गिन और जोसेफ स्टैनिस्लाव की पुस्तक द कमांडिंग हाइट्स के अनुसार, हालांकि भारतीय स्वतंत्रता ने दुनिया भर में उपनिवेशवाद से मुक्ति और स्वतंत्रता के लिए एक खाका प्रदान किया था, लेकिन यह बदलाव अफ्रीका में सबसे ज्यादा तीव्र गति से महसूस किया गया।

घाना को आजादी दिलाने वाले एक सुनार के बेटे क्वामे नक्रूम, जो घाना के पहले अफ्रीकी मूल के प्रधान मंत्री बने, वो गांधी के जीवन और उनकी शिक्षाओं से प्रभावित थे।

द वायर के अनुसार, घाना के स्वतंत्रता आंदोलन के दोनों बड़े चेहरे नक्रूमा और जेबी दानक्वा ने गांधी से प्रेरित होने की बात स्वीकार की है। इसके अलावा, जाम्बिया, तंजानिया और नाइजीरिया पर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की गहरी छाप पड़ी है।

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+