दुनिया को बांधने चले थे अहंकारी शी जिनपिंग, अब अपने साथ साथ कई देशों को ले डूबेगा चीन!
विशेषज्ञ इस बात पर तो सहमत हैं, कि बीआरआई की वजह से कनेक्टिविटी में सुधार आया है, जिससे चीन के व्यापार को विस्तार मिला है और चीन में विज्ञान और प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों का भी विकास हुआ है।
लंदन, अगस्त 27: दुनिया का शहंशाह बनने की कोशिश कई तानाशाहों ने की है, लेकिन उनका अंजाम क्या हुआ, ये इतिहासों में दर्ज है और आज की दुनिया के एक ऐसे ही तानाशाह हैं शी जिनपिंग, जो दुनिया को बांधने का प्लान बनाकर लाए, लेकिन अब ना सिर्फ उनका प्लान धाराशाई हो रहा है, बल्कि उनके प्लान में जितने भी देश शामिल हुए थे, उन सभी की बैंड बज गई है। चीन की महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) अपनी स्थापना के लगभग दस साल बाद दम तोड़ता हुआ नजर आ रहा है। लंदन स्थित एनजीओ द डेमोक्रेसी फोरम ने इस वैश्विक परियोजना के लाभ और लागत पर चर्चा करने के लिए विशेषज्ञों के एक पैनल को 25 अगस्त के वर्चुअल सेमिनार में आमंत्रित किया था, जिसमें इसी निष्कर्ष पर पहुंचा गया, बीआरआई प्रोजेक्ट ने अपनी चमक खो दी है।

फेल हो चुका है बीआरआई प्रोजेक्ट
हालांकि, विशेषज्ञ इस बात पर तो सहमत हैं, कि बीआरआई की वजह से कनेक्टिविटी में सुधार आया है, जिससे चीन के व्यापार को विस्तार मिला है और चीन में विज्ञान और प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों का भी विकास हुआ है, साथ ही इन क्षेत्रों में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के रास्तों को खोल दिया है, लेकिन विशेषज्ञ इस बात पर एक राय थे, कि इसकी वजह से एक खतरनाक 'ऋण जाल' का निर्माण किया गया और इस प्रोजेक्ट के लिए पर्यावरण का खतरनाक तरीके से विनाश किया गया। इस कार्यक्रम के मॉडरेटर हम्फ्री हॉक्सली, जो एक लेखक और बीबीसी एशिया के पूर्व संपादक रह चुके हैं, उन्हों कहा कि, बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव ने चीन के दृष्टिकोण को उन देशों में फैलाया और कब्जा किया, जहां लोकतंत्र नहीं थे। इस प्रोजेक्ट के तहत बुनियादी ढांचों का निर्माण करना था और एक जाल फैलाना था, जिसके लिए कई सारे देशों की जरूरत थी। हालांकि, यह सपना चीन के साथ एक स्वर्ण युग को गले लगाने के लिए लग रहा था, लेकिन असल में ये अधिक जटिल, कटु और खतरनाक राजनीतिक निकला और यह प्रोजेक्ट डूब गया।

परियोजना पर ऋण का अभूतपूर्व संकट
इस फोरम के अध्यक्ष लॉर्ड ब्रूस ने कहा कि, हालांकि इसमें कोई संदेह नहीं है कि, अपने जीवनकाल के दौरान, बीआरआई किसी एक देश द्वारा शुरू किया गया, अब तक का सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय बुनियादी ढांचा कार्यक्रम बन गया, लेकिन अब यह तय हो गया है, और अब इस बात के सारे सबूत आ गये हैं, कि खद चीन भी असल में विदेशों को इतना सारा कर्ज देकर फंस गया है। हाल के वर्षों में जारी किए गए ऋण अभूतपूर्व दर से खराब हो रहे हैं, इसके परिणामस्वरूप परियोजनाओं के लिए ऋण संकट खड़ा हो गया है और बीआरआई प्रोजेक्ट से जुड़ने वाले ज्यादातर देश दिवालिया होने के कगार पर पहुंच गये हैं, जैसे श्रीलंका, पाकिस्तान और कई अफ्रीकी देश। ये देश अब कर्ज लौटा नहीं सकते हैं, लिहाजा अब खुद चीन बुरी तरह से फंस गया है और बीआरआई अधूरा रह गया है, जिसे फेल कहा जा सकता है।

ज्यादातर बीआरआई कार्यक्रम ठप
उन्होंने प्रचुर मात्रा में सबूतों की ओर इशारा करते हुए दिखाया कि, वर्तमान में बीआरआई द्वारा समर्थित कई कार्यक्रम प्रमुख कार्यान्वयन समस्याओं का सामना कर रहे हैं, और जर्मन चांसलर ओलाफ स्कोल्ज़ के हालिया दावे का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि, 'वैश्विक दक्षिण में अगला बड़ा ऋण संकट चीन द्वारा दुनिया भर में दिए गए ऋणों से उत्पन्न होगा। ' लॉर्ड ब्रूस ने कहा कि, चीन का सामना करने वाला यह अभूतपूर्व और व्यापक ऋण दबाव तेजी से इस प्रोजेक्ट में शामिल देशों की सबसे बड़ी आर्थिक चुनौती में बदल रहा है, और यह देखा जाना बाकी है कि क्या बीजिंग वित्तीय संसाधनों और राजनयिक पूंजी पर बने संबंधों से अलग हटकर विकासशील देशों के साथ जुड़ सकता है या नहीं?।

चीन ने वैश्विक उपस्थिति का किया विस्तार
वहीं, ग्लोबल सिक्योरिटी इनिशिएटिव (जीएसआई) और ग्लोबल डेवलपमेंट इनिशिएटिव (जीडीआई) से संबंधित अपने हालिया शोध के आधार पर, जेन्स ग्रुप के एक वरिष्ठ चीन विश्लेषक क्लेयर चू का मानना है कि, बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव ने अपने इच्छित उद्देश्य को काफी हद तक पूरा कर लिया है, हालांकि इस प्रोजेक्ट के कार्यान्वयन में देरी, वित्तीय कुप्रबंधन और भ्रष्टाचार सहित अपनी निर्विवाद प्रणालीगत खामियों के बावजूद इसका कार्यात्मक और अलंकारिक दोनों तरह से विकसित होना जारी है। चू ने बताया कि, कैसे बुनियादी ढांचे का वित्त पोषण और निर्माण किया गया है, कैसे चीन ने बीआरआई के माध्यम से अपनी वैश्विक उपस्थिति का विस्तार किया है, कैसे चीनी कर्मियों और संपत्तियों को विदेशों में तैनात किया गया है, द्विपक्षीय संबंधों को पोषित और मजबूत किया गया है, जिससे चीनी कंपनियों की अंतर्राष्ट्रीय बाजार उपस्थिति मजबूत हो गई है।

चीन ने किन देशों को बांटे अथाह कर्ज
पाकिस्तान में चीन अपने महत्वाकांक्षी बीआरआई प्रोजेक्ट के लिए 53 अरब डॉलर खर्च कर रहा है, लेकिन ये प्रोजेक्ट पूरी तरह से ठप पड़ गया है और पिछले दो सालों से बंद हो चुका है। वहीं, पाकिस्तान के बाद चीन ने इंडोनेशिया में 44 अरब डॉलर, सिंगापुर में 41 अरब डॉलर, रूस में 39 अरब डॉलर, सऊदी अरब में 33 अरब डॉलर और मलेशिया में 30 अरब डॉलर का निवेश किया है। बीजिंग ने कंबोडिया में भी बड़े पैमाने पर निवेश किया है, जिसके कारण आसियान देश दक्षिण चीन सागर में चीन द्वारा किए गए एकतरफा बदलाव और ताइवान के खिलाफ युद्ध धमकी के प्रति मूकदर्शक बने हुए हैं।

आखिर में खुद भी डूब जाएगा चीन?
चीनी बीआरआई के खिलाफ रोना केवल भारतीय उपमहाद्वीप तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसकी गूंज केन्या में भी सुनी जा ही है, जिसे चीन ने 4.7 अरब अमेरिकी डॉलर दिया हुआ है, एक रेलवे की परियोजना के लिए, लेकिन अपने लॉन्च के पांच साल बाद यह परियोजना युगांडा में अपने गंतव्य से 200 मील दूर एक खाली मैदान में अचानक खत्म हो गई और चीन ने बाकी लोन देने से इनकार कर दिया है, लिहाजा हुआ ये, कि रेलवे परियोजना आधा-अधूरा ही तैयार हो पाया, लेकिन केन्या के ऊपर चीन का 4.7 अरब डॉलर का कर्ज चढ़ गया, जिसे वो कभी नहीं चुका सकता है और रेलवे योजना को पूरा करने के लिए उसे अब और लोन चाहिए, नहीं तो अभी तक जितना काम हुआ है, वो भी बर्बाद हो जाएगा। यानि, चीन अपने बीआरआई के फंदे में कई देशों को फंस चुका है, लेकिन इसका अंतिम असर खुद चीन पर भी होगा, क्योंकि अगर ये देश दिवालिया होते हैं, तो चीन को एक ढेला भी नहीं मिलेगा और अरबों डॉलर के साथ उसका बीआरआई प्रोजेक्ट भी डूब जाएगा।












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