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नेपाल के मुसलमान किस हाल में हैं? हिन्दू राष्ट्र ख़त्म होना कैसा रहा

By रजनीश कुमार

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6 दिसंबर, 1992 को जब भारत में बाबरी मस्जिद गिराई गई, तब मोहना अंसारी पाँचवीं क्लास में पढ़ती थीं. मोहना, नेपाल में बाँके ज़िले के नेपालगंज की हैं.

मोहना याद करती हुए बताती हैं कि उस दिन वे पूरे परिवार के साथ किसी शादी में शामिल होने उत्तर प्रदेश के नानपारा गई हुई थीं. तभी पता चला कि उत्तर प्रदेश के बहराइच और नानपारा के बीच दंगा हो गया है.

मोहना कहती हैं, ''मेरे वालिद की पुलिस प्रशासन में अच्छी पहचान थी. वो सरकारी मुलाजिम थे. इत्तेफ़ाक से नेपालगंज के उस वक़्त के पुलिस ऑफिसर और मेरे वालिद की अच्छी दोस्ती थी. उनके ज़रिए मेरे वालिद ने यूपी पुलिस से संपर्क कर हमें नानपारा से सुरक्षित निकाला. मेरे बचपन की यह याद कभी मिटती नहीं है. उसके बाद इलाक़े में जितने दंगे हुए, उसका प्रभाव नेपाल के मुसलमानों पर पड़ा. ख़ास करके उन मुसलमानों पर, जो यूपी-बिहार से लगे नेपाल के सीमाई इलाक़ों में रहते हैं.''

मोहना कहती हैं, ''जब भी भारत में कोई आतंकवादी हमला होता था, उसका प्रभाव हमारे जनजीवन पर भी स्वाभाविक रूप से पड़ा. लोग चीज़ों को व्यक्तिगत तौर पर देखने लगते हैं. मुसलमान होने के कारण शक करने लगते हैं.''

पिछले साल भारत में जब कोविड-19 महामारी ने दस्तक दी, तो तब्लीग़ी जमात से जुड़े लोगों पर भी उंगली उठी. इसकी चपेट में मोहना अंसारी भी आ गईं.

मोहना कहती हैं, ''मैं मार्च महीने में अपने रिश्तेदार की शादी में उत्तर प्रदेश के कानपुर गई थी. संयोग से, भारत में तभी तब्लीग़ी जमात का प्रोग्राम हुआ था. मेरे परिवार वाले तो आज तक किसी भी ऐसे धार्मिक कार्यक्रम में शामिल नहीं हुए. शादी से लौटते वक़्त भारत में लॉकडाउन की घोषणा हो गई. मेरे पास तो ट्रैवेल परमिट थी. अपनी गाड़ी भी थी. मैं तब नेपाल मानवाधिकार आयोग की चेयरपर्सन भी थी. यूपी पुलिस ने मुझे नेपाल जाने दिया.''

मोहना बताती हैं, ''नेपालगंज से काठमांडू आई. लोगों ने सोशल मीडिया पर लिखना शुरू कर दिया कि मैं जमात में शामिल होने भारत गई थी. मैं दफ़्तर पहुँची, तो लोगों ने कहना शुरू कर दिया कि मैडम जमात में गई थीं और वो बिना पीसीआर टेस्ट के क्यों आई हैं. मुझे इसे लेकर बहुत जूझना पड़ा.''

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नेपाल में मुसलमान किस हाल में?

नेपाल की राजधानी काठमांडू के सुंधारा इलाक़े में 24 अक्तूबर की सुबह कुछ लोगों ने जेसीबी मशीन से एक मस्जिद की दीवार गिरा दी. इस मस्जिद की ज़मीन के मालिकाना हक़ को लेकर विवाद था.

इस वाक़ये को लोगों ने किसी आपराधिक मामले की तरह लिया. पुलिस में शिकायत की गई और मस्जिद तोड़ने वाले को पकड़ लिया गया. सरकार ने फिर से मस्जिद बनाने की अनुमति दे दी. यह मामला किसी भी तरह से हिंदू बनाम मुसलमान नहीं हुआ और न ही किसी ने ऐसा करने के लिए हवा दी. जब यह मस्जिद की दीवार गिराई गई, तब भी वहाँ कोई सांप्रदायिक भीड़ नहीं थी.

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इस इलाक़े के मुसलमान और हिंदू दोनों मानते हैं कि ज़मीन के मालिकाना हक़ को लेकर विवाद है, लेकिन पिछले कई दशकों से यह मुसलमानों के ही पास है. यहाँ मुसलमान गोश्त बेचते थे और बाद में लोगों ने नमाज़ पढ़ना शुरू किया, तो मस्जिद बन गई.

नेपाल में 2018 में मुसलामानों के हितों को ध्यान में रखते हुए केपी शर्मा ओली की सरकार ने मुस्लिम कमिशन का गठन किया था. इस कमिशन के पहले चेयरमैन शमीम मियाँ अंसारी बने. अंसारी कहते हैं कि यह कोई हिंदू बनाम मुस्लिम का मामला नहीं था.

अंसारी कहते हैं, ''ज़मीन को लेकर विवाद था और यहाँ मस्जिद होने के बावजूद धर्म का एंगल नहीं आया. पुलिस ने तत्काल कार्रवाई की और अब नई मस्जिद बन रही है. नेपाल में मुसलमानों के साथ वैसा कोई भेदभाव नहीं है. काठमांडू में दो लाख से ज़्यादा मुसलमान किराए के घरों में रहते हैं, लेकिन कभी उस रूप में कोई भेदभाव की शिकायत नहीं मिली.''

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मोहम्मद अयूब तराई के लुंबिनी से हैं. उन्होंने दिल्ली के साउथ एशियन यूनिवर्सिटी से मास्टर की पढ़ाई की है. 2013 में दिल्ली छोड़ने के बाद से वो काठमांडू में रिसर्चर के तौर पर काम कर रहे हैं. अयूब को नेपाली भाषा नहीं आती है. वे हिंदी, उर्दू और अवधी में बात करते हैं. अयूब कहते हैं कि लुंबिनी में अवधी ही बोली जाती है.

अयूब कहते हैं, ''काठमांडू में मुस्लिम पहचान से ज़्यादा बड़ी पहचान मधेसी होना है. भेदभाव का सामना करने के लिए मधेसी होना काफ़ी है. जैसे आप काठमांडू में किसी पहाड़ी मकान मालिक के घर किराए पर लेने जाएँ, तो चेहरा देखकर ही समझ जाएगा कि आप तराई से हैं यानी मधेसी हैं. आप नेपाली नहीं बोलेंगे, तो शक हो जाएगा कि यूपी, बिहार के हैं. पहला भेदभाव यहीं से शुरू होगा. उसके बाद वे नाम पूछेंगे. नाम से पता चल जाएगा कि आप मुसलमान हैं, तो दूसरी तरह का भेदभाव शुरू होगा.''

अयूब बताते हैं कि कई बार उनसे नेपाल के लोग ही पूछ बैठते हैं कि क्या वे भारत के हैं. मोहम्मद अयूब कहते हैं कि नेपाल में कोई बीजेपी जैसी पार्टी नहीं है, नहीं तो सुंधारा में मस्जिद की दीवार गिराने के मामले को सांप्रदायिक रंग दिया जा सकता था.

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अयूब कहते हैं, ''नेपाल की चुनावी राजनीति में धार्मिक ध्रुवीकरण की बुराई नहीं आई है. इसकी एक वजह ये भी है कि मुसलमानों की तादाद मामूली है. मुसलमानों से अगर भेदभाव है, तो मधेस के हिंदुओं से भी है. कमल थापा की राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी नेपाल को हिंदू राष्ट्र बनाने की मांग कर रही है, लेकिन उन्होंने कभी मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत की बात नहीं की. यहाँ तक कि तराई के मुसलमान ही उनकी पार्टी में हिंदू राष्ट्र बनाने की माँग में शामिल दिखते हैं.''

नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के नेता रामचंद्र झा कहते हैं कि नेपाल की राजनीति भारत की तरह धर्म के आधार पर बाँटने वाली नहीं है. वे कहते हैं, ''भारत में चुनावों में जीत के लिए विभाजनकारी राजनीति की जाती है. नेपाल अभी इससे बचा हुआ है. नेपाल में भेदभाव का मसला अभी तराई बनाम पहाड़ है. इसलिए मुसलमान बनाम हिंदू जैसी स्थिति नहीं है. यहाँ कोई बीजेपी जैसी पार्टी भी नहीं है, इसलिए भी धर्म के आधार पर नफ़रत से नेपाल मुक्त है.''

रामचंद्र झा कहते हैं हिंदी मीडिया नेपाल में इस तरह के विभाजन की कोशिश कर रहा है और इसका असर भी कुछ हलकों में दिख रहा है. वे कहते हैं कि इस मामले में नेपाल की राजनीति को सतर्क रहने की ज़रूरत है. रामचंद्र झा कहते हैं कि भारत में मोदी सरकार के आने के बाद नेपाल में भी धार्मिक आक्रामकता की ज़मीन को मज़बूत करने की कोशिश की जा रही है.

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मोहम्मद अयूब कहते हैं कि 2014 में नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद भारत के मुसलमानों पर जैसा असर पड़ा है, उसकी छींटें नेपाल के मुसलामानों पर भी आई हैं.

अयूब कहते हैं, ''जैसे 2014 के बाद भारत का मीडिया बदला है. तराई क्या पहाड़ के लोग भी हिंदी न्यूज़ चैनल देखते हैं. हिंदी न्यूज़ चैनलों में मुसलमानों की जो छवि गढ़ी जाती है, उसका सीधा असर नेपाल के समाज पर पड़ रहा है. फ़र्ज़ी ख़बरों का प्रसार सोशल मीडिया के ज़रिए तेज़ी से बढ़ रहा है. इसके ज़रिए प्रॉपेगैंडा फैलाया जा रहा है.''

अयूब एक उदाहरण देते हैं, ''पाकिस्तान में अभी एक मंदिर तोड़े जाने की घटना हुई थी. इसका असर लुंबिनी में भी पड़ा. लुंबिनी के लोगों को मैंने बातचीत में कहते हुए सुना कि नेपाल में भी मुसलमान ज़्यादा हो गए, तो पाकिस्तान की तरह हमारे मंदिर भी तोड़ दिए जाएँगे. ऐसा पहले नहीं होता था. डर इस बात का है कि नेपाल में सत्ता के लिए लोगों को लामबंद करने में धर्म की आड़ ली गई, तो नेपाल के मुसलमानों की भी हालत भारत की तरह हो सकती है. मेरा मानना है कि भारत की तुलना में नेपाल का समाज अभी बहुत ही सहिष्णु है.''

दिनेश पंत उत्तराखंड की सीमा से लगे नेपाल के कंचनपुर ज़िले के रहने वाले हैं. उन्होंने पिछले साल ही दिल्ली की साउथ एशिया यूनिवर्सिटी से मास्टर की पढ़ाई पूरी की है.

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दिनेश याद करते हुए बताते हैं कि पिछले साल लॉकडाउन के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वास्थ्यकर्मियों के समर्थन के लिए बालकनी से थाली बजाने और दीप जलाने की अपील की, तो उनके इलाक़े में भी लोगों ने इसे माना. दिनेश कहते हैं कि लोगों ने थाली भी बजाई और दीप भी जलाए.

दिनेश कहते हैं, ''भारत में पीएम मोदी के सत्ता में आने के बाद यहाँ उग्र हिंदुओं का एक जमात है, जिसका उत्साह बढ़ा और उसका सीधा असर मुसलमानों पर पड़ा. कोरोना संक्रमण फैलाने के लिए यहाँ भी मुसलमानों को ज़िम्मेदार ठहराने वाली रिपोर्ट प्रसारित की गई. भारतीय मीडिया तो ऐसा कर ही रहा था और उसका सीधा असर यहाँ भी पड़ा. मुसलमानों पर नोट में थूक लगाकर लोगों के देने की फ़र्ज़ी ख़बरें चलाई गईं. भारत एक बड़ा मुल्क है और यहाँ के लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता से नेपाल में राजशाही के ख़िलाफ़ आंदोलन को प्रेरणा मिलती रही, लेकिन भारत में लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता को कमज़ोर किया जाएगा, तो इसका असर नेपाल पर पड़ना लाजिमी है.''

दिनेश कहते हैं कि उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में गोहत्या बैन करने का असर सीधा नेपाल पर पड़ा है. पंत कहते हैं कि यहाँ के हिंदू गाय बूढ़ी होने पर बेच देते थे. लेकिन अब नहीं बेच पाते हैं और मुसलमान भी बीफ़ खाने को लेकर आशंकित रहते हैं. पंत कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि बीफ़ केवल मुसलमान ही खाते हैं बल्कि यहाँ के तो ब्राह्मण भी खाते हैं.

दिनेश पंत कहते हैं, ''नेपाल में मुसलमान भारत की तुलना में बहुत कम हैं. इसलिए यहाँ के मुसलमान कुछ कहने या करने से पहले बहुसंख्यक आबदी से कन्फ़र्म हो लेते हैं. जैसे नेपाल के मुसलमानों ने हिंदू राष्ट्र ख़त्म किए जाने का जश्न नहीं मनाया या अब फिर से हिंदू राष्ट्र बनाने की माँग चल रही है तो इसका विरोध भी नहीं कर रहे हैं.''

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नेपाल में हिंदू-मुसलमानों की आपसी रंजिश

काठमांडू के इस्लामी स्कॉलर क़ाज़ी मुफ़्ती अबुबकर सिद्दीक़ी क़ासमी कहते हैं कि नेपाल में मुसलमान भले कम हैं, लेकिन बहुत सुकून से हैं. वे कहते हैं, ''नेपाल के हिंदू बहुत ही अच्छे हैं. हममें धर्म को लेकर कोई टकराव नहीं है. मैं कह सकता हूं कि हम भारत के मुसलमानों से ज़्यादा सुकून से नेपाल में हैं.''

इन सबके बावजूद, नेपाल में हिंदुओं और मुसलमानों के दंगे हुए. लेकिन ज़्यादातर के संबंध भारत की घटनाओं से जुड़े रहे हैं. डेविड सेडोन ने अपनी किताब 'द मुस्लिम कम्युनिटीज ऑफ़ नेपाल' में लिखा है कि जब भी भारत में हिंगुओं और मुसलमानों के बीच कोई दंगे की स्थिति बनी है, तो उसका असर नेपाल में भी दिखा है.

डेविड सेडोन ने अपनी किताब में लिखा है, ''1994-95 में नेपाल के बांके ज़िले में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच दंगा हुआ. यह उत्तर प्रदेश में बाबरी मस्जिद टूटने के बाद के तनाव से हुआ था. नेपालगंज में मुस्लिम मुसाफ़िरखाने की जगह एक हिंदू मंदिर बनाने को लेकर तीन दिन तक दंगे हुए थे. लेकिन यह स्थानीय स्तर तक ही रहा. तराई इलाक़े में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच तनाव 1990 के दशक में सबसे ज़्यादा रहा. बाबरी मस्जिद तोड़े जाने के कारण भारत से लगी सीमाओं पर भारी तनाव रहा.''

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''नेपालगंज में अक्सर हिंदू और मुसलमान भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट मैच या किसी महिला को लेकर आपस में भिड़ जाते थे. 1997 में नेपागंज में शिव सेना ने एक दफ़्तर खोला. शिव सेना ने नगर निकाय चुनाव में नेपालगंज में मेयर और अन्य उम्मीदवारों को अपना समर्थन दिया. कथित तौर पर शिव सेना के समर्थकों ने एक मुस्लिम को मतदान केंद्र पर जाने से रोक दिया. इसकी प्रतिक्रिया में शिव सेना के एक समर्थक को गोली लग गई और वो ज़ख़्मी हो गया. पूरा शहर दंगे की चपेट में आ गया. घरों और दुकानों को आग के हवाले कर दिया गया. इसमें एक मुस्लिम व्यक्ति की मौत हुई थी और 27 लोग ज़ख़्मी हुए थे.''

इराक़ में 12 नेपालियों की हत्या से निशाने पर आए नेपाली मुसलमान

एक सितंबर 2004 को इराक़ में 12 नेपालियों को इस्लामिक चरमपंथी संगठन अंसार अल-सुन्ना ने मार दिया था. इन्हें चरमपंथियों ने इराक़ पर 2003 में अमेरिकी हमले का समर्थन करने का इल्ज़ाम लगाकर गोली मार दी थी.

ये सारे नेपाली इराक़ में कुकिंग और साफ़-सफ़ाई का काम करते थे. नेपाल में इसे नेपाली हिंदुओं पर इराक़ी मुसलमानों के हमले की तरह लिया गया. इसकी प्रतिक्रिया में काठमांडू में आम मुसलमान निशाने पर आए. मदरसों और मस्जिदों पर हमले किए गए. कई दिनों तक मुसलमानों को लेकर नफ़रत जैसी स्थिति रही.

इस वाक़ये को लेकर थॉमस बेल ने अपनी किताब काठमांडू में लिखा है कि हज़ारों नेपालियों की भीड़ काठमांडू स्थित कश्मीरी मस्जिद में घुस गई. थॉमस बेल ने लिखा है, ''मेरे लिए कश्मीरी मस्जिद पहुँचना आसान नहीं था. पुलिस आँसू गैस के गोले दाग रही थी. लेकिन पुलिस के आने से पहले ही सैकड़ों की संख्या में दंगाई मस्जिद पहुँच गए थे.''

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''मस्जिद के कैंपस में अरबी भाषा में लिखे पन्ने बिखरे थे. जहाँ लोग नमाज़ पढ़ते थे, वहाँ कालिख पोत दी गई थी. हर तरफ़ टूटे गमले और शीशे बिखरे हुए थे. मस्जिद के गुंबद को भी नुक़सान पहुँचाया गया था. पुलिस लाठी लिए घूम रही थी. इमाम को बुरी तरह से पीटा गया और उनकी जान बचाने के लिए उन्हें एक कमरे में बंद कर दिया गया था. दोपहर बाद सरकार ने कर्फ़्यू लगा दिया, जो अगले चार दिनों तक लगा रहा.''

रिपब्लिका अख़बार ने तब लिखा था कि इराक़ में 12 नेपालियों की हत्या के बाद काठमांडू में न केवल जामा मस्जिद पर हमला हुआ, बल्कि मुसलमानों की संपत्ति को भी नुक़सान पहुँचाया गया. अख़बार ने लिखा था कि इसके बाद नेपाल में मुसलमानों को न केवल अल्पसंख्यक के तौर पर बल्कि ख़तरे के तौर पर भी देखा जाने लगा.

नेपाल में इसे काला बुधवार की संज्ञा दी जाती है. डेविड सेडोन ने अपनी किताब में लिखा है कि इसके बाद मुसलमानों ने भी एकजुट होने की कोशिश की और कुछ संगठन भी बने. 2005 में नेशनल मुस्लिम फ़ोरम का गठन किया गया. दोनों तरफ़ से ऐसे कई संगठन बने. डेविड सेडोन के अनुसार, तब मुसलमान अपनी पहचान मधेसी से अलग देखने लगे.

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नेपाल में कितने मुसलमान

नेपाल में 2011 की जनगणना के अनुसार, यहाँ मुस्लिम आबादी 11 लाख 62 हज़ार 370 है. यह संख्या नेपाल की कुल आबादी की चार से पाँच फ़ीसदी के बीच है. अभी नेपाल की कुल आबादी दो करोड़ 86 लाख है. नेपाल के 97 फ़ीसदी मुसलमान तराई में रहते हैं और तीन फ़ीसदी काठमांडू के अलावा पश्चिमी पहाड़ी इलाक़ों में. नेपाल में तराई की कुल आबादी का 10 फ़ीसदी हिस्सा मुसलमानों का है.

हालाँकि, कुछ मुस्लिम स्कॉलरों का मानना है कि नेपाल में मुसलमानों की असली आबादी 10 फ़ीसदी के आसपास है और तराई में इनकी तादाद 20 फ़ीसदी है. नेपाल मानवाधिकार आयोग की चेयरमैन रहीं मोहना अंसारी कहती हैं कि जनगणना में असली डेटा नहीं आ पाता.

वे कहती हैं, ''कई परिवार तो असली संख्या बताने से परहेज़ करते हैं. उन्हें लगता है कि कहीं सच्चाई जानने पर सरकार कुछ कार्रवाई तो नहीं करेगी. इसके अलावा, जनगणना में कई तरह की गड़बड़ियाँ भी होती हैं. मेरा मानना है कि नेपाल में मुसलमानों की असली आबादी 10 से 12 फ़ीसदी है.''

2011 की जनगणना के अनुसार, नेपाल के रौतहट (19.70%), कपिलवस्तु (18.15%) और बांके (18.98%) ज़िले में मुसलमानों की सबसे ज़्यादा आबादी है. 1990 के दशक की शुरुआत में नेपाल का संविधान फिर से लिखा गया. हालाँकि, इस संविधान में भी नेपाल के हिंदू राष्ट्र का दर्जा कायम रहा.

हिंदू राष्ट्र होने के बावजूद 1990 के संविधान के अनुच्छेद 11 और 12 में स्पष्ट रूप से रेखांकित किया गया कि राज्य नेपाल के सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार करेगा और धर्म के आधार पर किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं होगा.

अनुच्छेद 19 में कहा गया कि सभी धर्मावलंबियों को अपने धर्म के पालन का अधिकार होगा और इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं करेगा. लेकिन धर्मांतरण की अनुमति इस संविधान में भी नहीं मिली.

1990 के दशक से ही नेपाल में बहुदलीय लोकतंत्र को बढ़ावा मिला. बहुदलीय लोकतंत्र में मुसलमानों ने भी राजनीति पार्टियों में शामिल होना शुरू किया.

डेविड सेडोन ने अपनी किताब 'मुस्लिम कम्युनिटीज ऑफ़ नेपाल' में लिखा है, ''नेपाली कांग्रेस ऑर यूनाइटेड कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (UCPN) ने अपना जनसमर्थन बढ़ाने के लिए मुसलमानों को टिकट दिया. आधिकारिक डेटा के अनुसार, 1991 के चुनाव में 91 मुसलमान उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा और इनमें से कुल पाँच लोग सांसद चुने गए.''

बहुदलीय लोकतंत्र आने के बाद सभी पार्टियों ने मुसलमानों को तवज्जो देना शुरू किया. प्रोविंस 2 के मुख्यमंत्री मोहम्मद लालबाबू राउत हैं, जो मुसलमान हैं.

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नेपाल का हिंदू राष्ट्र से सेक्युलर राष्ट्र बनना

माओवादी आंदोलन की सफलता के बाद नेपाल ने राजनीतिक रूप से अंगड़ाई लेना शुरू किया. 240 सालों की राजशाही का अंत हो गया और नेपाल हिंदू राज्य का चोला उतारकर फेंकने को तैयार हो गया.

भारत से भारतीय जनता पार्टी का दबाव था कि नेपाल हिंदू राष्ट्र बना रहे, लेकिन नेपाल की अंगड़ाई थमी नहीं. 2006 से पहले तक नेपाल हिंदू राष्ट्र बना रहा, जहाँ धर्मांतरण अपराध था.

लेकिन नवंबर 2006 में माओवादी और सात पार्टियों के गठबंधन के बीच ऐतिहासिक व्यापक शांति समझौता हुआ. इसी दौरान अंतरिम सरकार बनी और नेपाल को सेक्युलर राज्य घोषित कर दिया गया. 2007 के अंतरिम संविधान में भी सेक्युलर स्टेट की बात कही गई.

नेपाल मुस्लिम आयोग के चेयरमैन शमीम मियाँ अंसारी से पूछा कि मुसलमानों को हिंदू स्टेट से सेक्युलर स्टेट बनने का क्या फ़ायदा मिला?

शमीम मियाँ कहते हैं, ''हमारी पहचान और हक़ को रेखांकित किया गया. हम मधेसियों में ही गिन लिए जाते थे, लेकिन मुसलमान पहचान को पहली बार संविधान में जगह दी गई. हम आश्वस्त हुए कि नेपाल सभी मजहबों के लिए संवैधानिक रूप से एक जैसा है. जिस मुस्लिम आयोग का मैं चेयरमैन हूँ, वो आयोग भी सेक्युलर स्टेट बनने के बाद बना. अब मैं इस आयोग के ज़रिए मुसमलानों के हक़ों की बात उठाता हूँ. यह पहले संभव नहीं था.''

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नेपाली मुसलमानों में शिक्षा

नेपाली मुसलमानों में शिक्षा की हालत बहुत ही ख़राब है. हाल के दशकों में नेपाल ने शिक्षा में काफ़ी प्रगति की है, लेकिन मुसलमान इस रेस में पीछे छूट गए हैं. 2001 की जनगणना के अनुसार, 1991 में नेपाल में साक्षरता दर 39.6 फ़ीसदी थी, जो 2011 में 14.1 फ़ीसदी बढ़कर 53.7 फ़ीसदी हो गई थी.

वहीं 1991 में मुसलमानों में साक्षरता दर 22.4 फ़ीसदी थी, जो 2001 में बढ़कर 34.7 फ़ीसदी ही रही. नेपाल में सबसे ज़्यादा पढ़ी-लिखी आबादी पहाड़ी ब्राह्मणों की है. नेपाल की कुल आबादी में इनका हिस्सा 12.91 फ़ीसदी है और साक्षरता दर 74.90 फ़ीसदी.

नेपाल में मुसलमान अपनी आजीविका के लिए मुख्य रूप से खेती पर आश्रित हैं. ये या तो खेती करते हैं या खेतीहर मज़दूर हैं.

UNDP 2009 के अनुसार नेपाल में प्रति व्यक्ति मासिक आय 15000 नेपाली रुपए है, लेकिन मुसलमानों की आय 10,200 नेपाली रुपए ही है. नेपाल में सबसे ज़्यादा मासिक आय 26,100 नेवार जाति की है. उसके बाद ब्राह्मण और छेत्री हैं. मुसलमान नीचे से दूसरे नंबर हैं और आख़िरी नंबर पर 8, 830 रुपए के साथ पहाड़ी दलित हैं.

नेपाल के मुसलमान बड़ी संख्या में खाड़ी के देशों में भी काम करते हैं.

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English summary
How are the Muslims of Nepal? How was the end of hindu nation
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