केरल में बीड़ी बनाने वाला लड़का अमेरिका में कैसे बना जज? जानिए सुरेंद्रन पटेल की अविश्वसनीय यात्रा

सुरेंद्रन पटेल की ये कहानी उन लोगों के लिए हौसले की मिसाल है, जो गरीबी और अभाव के बाद भी सपना देखना बंद नहीं करते। खुद सुरेंद्रन पटेल ने भी नहीं सोचा था, कि उनका सफर अविश्वसनीय हो जाएगा।

beedi roller becmes judge in texas

Surendran K Pattel Texas Judge: मेहनत और लगन की बदौलत इंसान हर मुकाम को हासिल कर सकता है और केरल के रहने वाले एक लड़के की कहानी, इसी मेहनत और लगन की है, जिसने अमेरिका में जाकर अपने सपने को पूरा किया है। टेक्सास में एक वकील को जिला कोर्ट को न्यायाधीश नियुक्त किया गया है और इस जज का नाम है, सुरेंद्रन के पटेल, जो भारत के केरल राज्य के रहने वाले हैं। सुरेंद्रन के पटेल की जीवन की कहानी एक ख्वाब के पूरा होने की कहानी है, जिसे हर किसी को जरूर जाननी चाहिए।

टेक्सास में जिला जज बने सुरेंद्रन के पटेल

टेक्सास में जिला जज बने सुरेंद्रन के पटेल

सुरेंद्रन के पटेल ने एक जनवरी को टेक्सास के फोर्ट बेंड काउंटी में 240वें न्यायिक जिला कोर्ट के न्यायाधीश के रूप में शपथ ली है। द वीक मैगजीन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने पिछले साल 8 नवंबर को इस पद के लिए हुए चुनाव में रिपब्लिकन दावेदार एडवर्ड क्रेनेक को हराया था। केरल में गरीबी में जन्मे सुरेंद्रन के पटेल ने इस पद तक पहुंचने के लिए एक लंबा सफर तय किया है।

बचपन के कठिन दिन

बचपन के कठिन दिन

सुरेंद्रन के पटेल का जन्म केरल के कासरगोड में हुआ और वो यहीं पर पले-बढ़े, जहां उनके माता-पिता दिहाड़ी मजदूर थे, लिहाजा सुरेंद्रन के पटेल की बचपन की जिंदगी काफी मुश्किलों से भरी थी। उन्हें स्कूल और कॉलेज में पढ़ते वक्त घर को चलाने में सहयोग करने के लिए छोटी-मोटी नौकरियां करनी पड़ीं, ताकि परिवार का गुजारा हो सके। सुरेंद्रन के पटेल एक मजदूर के तौर पर काम करते थे और फिर उन्होंने एक बीड़ी बनाने वाली फैक्ट्री में काम करना शुरू कर दिया, ताकि कुछ पैसे कमाया जा सके। वो अपनी बहन के साथ बीड़ी बनाने का काम करते थे और फिर एक वक्त ऐसा आया, जब पारिवारिक स्थिति काफी खराब हो गई और स्थिति इतनी गंभीर हो गई, कि उन्होंने 10वीं कक्षा में स्कूल छोड़ दिया और बीड़ी बनाने वाली फैक्ट्री में पूरी तरह से काम करना शुरू कर दिया। इस फैक्ट्री में वो बीड़ी में तंबाकू भरने और फिर उसे पैक करने का काम करते थे।

कानून के क्षेत्र में जाने का सपना

कानून के क्षेत्र में जाने का सपना

भले ही सुरेंद्रन बीड़ी बनाने का काम करते थे, लेकिन उनकी आंखों ने सपना देखना जारी रखा था और कुछ महीनों की मुश्किल वक्त गुजारने के बाद वो वापस स्कूल लौट आए। उन्होंने एक बार फिर से अपनी पढ़ाई शुरू कर दी और फिर कॉलेज की पढ़ाई भी शुरू कर दी। दूसरी तरफ अपनी रोजी रोटी और परिवार का गुजारा चलाने के लिए वो बीड़ी बनाने की फैक्ट्री में भी काम करते रहे। राजेन्द्रन बचपन से ही वकील बनने का सपना देखने लगे थे, लेकिन उन्हें आगे का रास्ता नहीं पता था। उन्होंने पॉलिटिकल साइंस से कॉलेज किया, लेकिन बाद में एक बार फिर से घर की वजह से उनके लिए हर दिन कॉलेज जाना संभव नहीं हो रहा था, हालांकि उनके दोस्त लगातार उन्हें नोट्स बनाने में मदद करते रहे। लेकिन, कॉलेज में उनकी काफी कम उपस्थिति ने प्रोफेसर्स को नाराज कर दिया। प्रोफेसर्स उनकी वास्तविक स्थिति नहीं जानते थे, बल्कि उन्हें लगता था, कि राजेन्द्रन पढ़ाई को लेकर लापरवाह हैं, लिहाजा उन्हें परीक्षा देने से रोक दिया गया।

राजेन्द्रन ने कैसे दिया परीक्षा?

राजेन्द्रन ने कैसे दिया परीक्षा?

द वीक से बात करते हुए सुरेंद्रन ने कहा कि, "मैं प्रोफेसर्स को नहीं बताना चाहता था, कि मैं गरीबी की वजह से एक बीड़ी फैक्ट्री में काम करता हूं। अगर मैं उन्हें ये बताता, तो उनके मन में मेरे प्रति दया की भावना आती और मुझे ये पसंद नहीं होता।" राजेन्द्रन ने कहा कि, "मैंने प्रोफेसर्स से अनुरोध किया, कि वो मुझे परीक्षा देने दें और अगर मैं अच्छा स्कोर नहीं करता, अगर मेरे मार्क्स अच्छे नहीं आते हैं, तो वो मुझे आगे कॉलेज आने से रोक सकते हैं। जिसके बाद प्रोफेसर्स ने उन्हें परीक्षा देने की इजाजत दे दी।" जब परीक्षा का परिणाम आया, जो सुरेंद्रन ने कॉलेज में टॉप किया था। उसके बाद उन्होंने एक लॉ यूनिवर्सिटी में दाखिला ले लिया और अपनी पढ़ाई को जारी रखने के लिए उन्होंने अपने दोस्तों से पैसे उधार लिए। सुरेंद्रन जानते थे, कि आगे की पढ़ाई के लिए उन्हें और गंभीर होना पड़ेगा, लेकिन रास्ता कठिन था।

अमेरिका का सफर कैसे हुआ शुरू?

अमेरिका का सफर कैसे हुआ शुरू?

सुरेन्द्रन ने आगे की पढ़ाई जारी रखने के लिए एक हाउसकीपिंग कंपनी में नौकरी की और कंपनी के मालिक उथुप्प ने उनकी मदद करनी शुरू की। उनकी कॉलेज की फीस भी कंपनी के मालिक उथुप्प ने ही भरी। साल 1995 में सुरेंद्रन पटेल ने अपनी कानून की डिग्री प्राप्त की और एक साल बाद केरल के होसदुर्ग में प्रैक्टिस करना शुरू किया। उनके काम ने उन्हें ख्याति दिलाई और लगभग एक दशक के बाद वे नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट में काम करना शुरू कर दिया। सुरेंद्रन की पत्नी एक नर्स थीं, जिन्हें साल 2007 में अमेरिका के प्रसिद्ध अस्पताल में नौकरी करने का मौका मिला, लिहाजा यहां से सुरेंद्रन का अमेरिका का सफर शुरू हुआ। सुरेंद्रन अपनी पत्नी और बच्चों के साथ ह्यूस्टन चले गये। हालांकि, तब सुरेंद्रन के पास नौकरी नहीं थी। चूंकि उनकी पत्नी रात की पाली में काम करती थी, इसलिए उन्होंने बेटी की देखभाल की। उन्होंने एक किराने की दुकान पर एक दिन की नौकरी की। लेकिन यह आसान नहीं था। उन्होंने कहा कि, "भारत के सर्वोच्च न्यायालय में एक सफल वकील बनने से लेकर अमेरिका में एक सेल्समैन बनने तक ... ये सफर भावनात्मक तौर पर भी काफी मुश्किल था"। लेकिन, उन्होंने फिर से अमेरिका में वकालत की दुनिया में प्रवेश करने के लिए नये सिरे से पढ़ाई की और फिर उन्होंने वहां पर परीक्षा पास की।

अमेरिका में भी मुश्किलों से भरा रहा सफर

उन्होंने अंतरराष्ट्रीय कानून का अध्ययन करने के लिए ह्यूस्टन विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। उन्होंने साल 2011 में स्नातक की उपाधि प्राप्त की और परिवार कानून, आपराधिक बचाव, नागरिक और वाणिज्यिक मुकदमेबाजी, अचल संपत्ति और लेन-देन के मामलों से संबंधित मामलों को संभालने के लिए कॉन्ट्रैक्ट पर काम करना शुरू किया। इसी दौरान उनके एक साथी वकील ने उन्हें सुझाया, कि उन्हें जज बनना चाहिए। सुरेंद्रन पटेल को साल 2017 में अमेरिका की नागरिकता मिली और उन्होंने राजनीति में आना शुरू किया। जिला जज बनने का उनका पहला प्रयास साल 2020 में था, लेकिन पहली बार उन्हें सफलता नहीं मिली। वह 2022 में फिर से जिला जज के लिए अपने नाम को आगे बढ़ाया और उन्होंने द वीक को बताया, कि उनका मुकाबला डेमोक्रेटिक पार्टी के एक सिटिंग जज के खिलाफ था। इसलिए पार्टी से समर्थन नहीं मिला। उन्होंने एक अभियान शुरू किया और डेमोक्रेटिक उम्मीदवार बन गए। अमेरिका दो दलीय लोकतांत्रिक प्रणाली का अनुसरण करता है। पटेल मुख्य चुनाव में एक रिपब्लिकन उम्मीदवार के खिलाफ थे। यह कड़ा मुकाबला था, जहां भारतीय मूल के जज पर उनके उच्चारण को लेकर उनपर निशाना साधा गया, लेकिन अंत में वह विजेता के रूप में सामने आए। सुरेंद्रन अपने इस सफर को एक सपने की तरह देखते हैं और कहते हैं, कि केरल में बीड़ी बेचने से लेकर अमेरिका में आकर जज बनना, एक ऐसा सपना है, जिसपर आज भी उन्हें यकीन नहीं होता।

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