क्या भारत की चीन पॉलिसी-2021 फेल हो गई है? मोदी सरकार का नया कदम कैसा होना चाहिए?
चीन को लेकर 2021 में भारत सरकार के द्वारा किए गये प्रयासों पर नजर डालें, तो सबसे बड़ा प्रयास 'क्वाड' की दो बैठक करना था, लेकिन हैरानी इस बात को लेकर है कि क्वाड से चीन के खिलाफ कुछ नहीं कहा गया।
नई दिल्ली, जनवरी 03: साल 2021 बीत चुका है और बीते साल भारत समेत दुनियाभर के तमाम राजनीतिक विश्लेषक हों या रक्षा मामलों के जानकार, सब एक बात पर सहमत हैं, कि भारत का असल दुश्मन चीन है, पाकिस्तान नहीं, तो फिर सवाल ये उठता है, कि पिछले साल चीन से निपटने में भारत सरकार की उपलब्धियों का कुल योग कितना है? आखिर भारत सरकार ने चीन के खिलाफ क्या नीति बनाई है और क्या भारत सरकार की नीति चीन को लेकर अभी तक नाकामयाब रही है या फिर चीन को रोकने में देश कामयाब रहा है? आईये जानने की कोशिश करते हैं, कि मोदी सरकार की चीन नीति अब तक कैसी रही है और नये साल में मोदी सरकार की नीति का रास्ता कैसा होना चाहिए?

2021 में चीन को लेकर कितने सफल रहे हम?
2020 में गलवान घाटी में चीनी सैनिकों के साथ इंडियन आर्मी की हिंसक झड़प हुई थी, जिसमें हमारे 20 जवान शहीद हो गये और 40 चीनी सैनिकों के मारे जाने का दावा रूसी न्यूज एजेंसी ने किया था, हालाकि, चीन सिर्फ पांच का आंकड़ा ही बताता है, लेकिन असल सवाल ये है, कि साल 2014 से मोदी सरकार चीन को लेकर जिस मकसद से आगे बढ़ी, वो क्या पटरी से उतर चुकी है, क्योंकि 'मनी कंट्रोल' की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि, पैंगोंग त्सो और गोगरा पोस्ट को चीनी सैनिकों ने भले ही खाली कर दिया, लेकिन बदले में भारतीय सेना को कैलाश पर्वतमाला खाली करना पड़ा, जो इंडियन आर्मी के कब्जे में था और ये भारत के लिए बड़ा झटका है। जबकि, हॉट स्प्रिंग्स, डेमचोक और देपसांग में हुए संघर्ष के बाद 'शांति प्रक्रिया' रूकी हुई है चीनी सैनिक इन क्षेत्रों में अभी भी मौजूद हैं, जबकि 'मनी कंट्रोल' की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि, सरकार के पास वास्तव में इसको लेकर 'चेतावनी' पहले से मौजूद थी।

सीमा विवाद हल करने का रोडमैप क्या?
गलवान झड़प से पहले जिस देवपांग को भारत का विरासत माना जा रहा था, वो विवादित हो चुका है और अब सवाल ये उठ रहे हैं, कि क्या भारत सरकार के पास सीमा विवाद के अंतिम समाधान के लिए क्या रोडमैप है? भारत सरकार चीन के साथ सीमा विवाद का समाधान किस तरह से करना चाह रही है, क्योंकि सिर्फ गलवान ही नहीं, बल्कि अब अरूणाचल प्रदेश के कई इलाकों के नाम बदलकर चीन ने इसे भी विवादित बनाने की कोशिश कर दी है, तो फिर सवाल ये हैं, कि जमीनी स्थिति को बार बार बदलने की कोशिश में लगे चीन को रोकने के लिए भारत को क्या करना चाहिए? हालांकि, भारत सरकार बार बार दावे करती है, कि राष्ट्रीय सुरक्षा उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता है, लेकिन क्या चीन को लेकर स्थिति पूरी तरह देशवासियों के मन में साफ है?

अमेरिका से भागीदारी, भारत की तैयारी?
चीन को लेकर 2021 में भारत सरकार के द्वारा किए गये प्रयासों पर नजर डालें, तो सबसे बड़ा प्रयास 'क्वाड' की दो बैठक करना था, लेकिन हैरानी इस बात को लेकर है, कि जिस क्वाड को चीन के खिलाफ पूरी दुनिया मान रही है, उस क्वाड के प्लेटफॉर्म से चीन के खिलाफ इशारों के अलावा एक शब्द नहीं बोला गया, जबकि ऑस्ट्रेलिया और जापान ने सीधे तौर पर चीन को निशाने पर लिया है, लेकिन भारत सरकार चीन पर चुप ही रही है। जबकि, भारत सरकार की कोशिश यही दिखाने की रही, कि क्वाड चीन के खिलाफ बनाया गया कोई सैन्य गठबंधन नहीं, बल्कि क्वाड का उद्येश्य सामूहिक विकास है, यही दिखाने की रही है। तो फिर सवाल ये उठे हैं, कि आखिर भारत सरकार ने चीन को लेकर एक भी सख्त संदेश क्यों नहीं दिया है, जबकि चीन की तरफ से लगातार उकसाने वाली कार्रवाई की गई है।

...तो फिर क्वाड का उद्येश्य क्या है?
सवाल ये हैं, कि अगर क्वाड के देश खुद नहीं मानते हैं, कि ये चीन के खिलाफ बनाया गया सैन्य गठबंधन है, तो फिर इसका उद्येश्य क्या है और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में क्वाड का पहल चीन के खिलाफ क्या होने वाला है? या फिर दूसरा सवाल ये है, कि ऐसे में क्वाड उन देशों को कैसे रोक सकता है, जो चीन की हाथ की कठपुतली बन चुके हैं, या फिर बनने की तरफ बढ़ रहे हैं? अगर क्वाड का उद्येश्य चीन के खिलाफ नहीं है, तो फिर क्वाड हिंद-प्रशांत क्षेत्र में व्यापार छोड़कर चीन को कैसे रोकने में सक्षम होगा?

ऑकस का निर्माण भारत के लिए संदेश?
एक तरह जहां अभी भी कहा जा रहा है कि, क्वाड का उद्येश्य चीन नहीं है, तो दूसरी तरह अमेरिका ने ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन के साथ मिलकर प्रत्यक्ष तौर पर AUKUS का निर्माण किया है, जिसे आधिकारिक तौर पर सैन्य गठबंधन कहा गया है और जिसके निशाने पर सीधे तौर पर चीन है और ऑकस के निर्माण के साथ ही अमेरिका ने परमाणु ऊर्जा से संचालित पनडुब्बी बनाने के लिए जरूरी टेक्नोलॉजी और संसाधन ऑस्ट्रेलिया को देने की घोषणा कर दी, तो क्या इसे चीन के साथ साथ भारत के लिए भी एक संदेश माना जाए? दूसरा सवाल ये है, कि ऐसे में पूर्वी लद्दाख में चीनी घुसपैठियों को बाहर निकालने के लिए क्या रणनीति होने वाली है और जब अमेरिका भी इन बातों को जानता है, तो फिर सामूहिक आवाज क्यों नहीं उठाई जा रही है? तो क्या ये माना जाए, कि अमेरिका भी अपने भी पत्ते भारत के हित में नहीं चलने वाला है? तो फिर आगे भारत की पॉलिसी क्या होगी, ये सबसे अहम सवाल है।

2022 में क्या होगी चीन को लेकर नीति?
तो आने वाले साल में हम चीन की नीति के मामले में भारत सरकार से क्या उम्मीद कर सकते हैं? भारत सरकार ने चीन में भारत का अगला दूत 'चीन विशेषज्ञ' प्रदीप कुमार रावत को नियुक्त किया है, जिनका रिकॉर्ड चीन और पूर्वी एशिया में जबरदस्त काम करने का रहा है और भारत के सबसे पुराने 'इंस्टीट्यूट ऑफ चायनीज स्टडीज' से जुड़े रहे हैं, लेकिन जानकारों का कहना है कि, प्रदीप कुमार रावत की नियुक्त से भी इस बात की संभावना कम ही है, कि वो चीन में कोई 'क्रिएटिव' कदम उठाएंगे। क्योंकि, विश्लेषकों का मानना है कि, राजदूत बदलने से चीनी व्यवहार में बदलाव आने की उम्मीद करना नासमझ से कम नहीं है और कई विश्लेषक ये भी मानते हैं, कि राजदूत उसी तरह के कदम उठाता है, जो उसे सरकार की तरफ से कहा जाता है, तो फिर राजदूत बदलना सिर्फ रूटीन फैसला है या रणनीतिक फैसला, ये आने वाले वक्त में ही पता चल पाएगा।

एलएसी पर भारत के सीमित एक्शन?
शिव नादर यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और चीन विशेषज्ञ जबीन टी जैकब ने मनी कंट्रोल में लिखे लेख में कहा है कि, एलएसी पर भारतीय सैनिकों के पास अभी भी संसाधन कम हैं और भारत अभी भी 'इंतजार' करने का खेल खेलने में लगा हुआ है और अपनी तरफ से पहल नहीं करता है। प्रोफेसर जैकब का मानना है कि, भारत सरकार ने एलएसी पर सीमित कदम उठाए हैं, लेकिन उन सीमित कदमों के जरिए भी चीन को साफ और स्पष्ट शब्दों में संकेत नहीं दिए गये हैं। चीन को कठोर शब्दों में ये नहीं बताया गया है कि, गलवान घाटी की यथास्थिति को मजबूत करने की इजाजत नहीं दी जाएगी। प्रोफेसर जैकब तो यहां तक मानते हैं कि, भारत सरकार में चीन से स्पष्टता और दृढंता से निपटने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव है। एक तरफ, भारत अमेरिका के साथ संबंध बढ़ा रहा है, जिसे चीन अपना कट्टर दुश्मन मानता है, जबकि दूसरी ओर नई दिल्ली भी ब्रिक्स और रूस-भारत-चीन त्रिपक्षीय जैसी वार्ता में संलग्न है, जो पूरी तरह से एक गलत संदेश है।

राष्ट्रीय सुरक्षा से ज्यादा घरेलू राजनीति पर ध्यान?
प्रोफेसर जैकब का कहना है कि, इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा पर अधिक ध्यान देने के बजाए घरेलू राजनीति - उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश में आगामी राज्य चुनावों पर ज्यादा ध्यान दे रही है और उसमें जीत-हार के समीकरण से विचलित हो रही है और जनरल बिपिन रावत की दुखद मौत के बाद सीडीएस के रूप में उनके उत्तराधिकारी के नाम में देरी करना इसका एक बड़ा उदाहरण है। एक सरकार जो भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा चुनौतियों को समझती है, उस समय सैन्य नेतृत्व में खालीपन को भरने में दो हफ्ते से भी ज्यादा की देरी करना समझ से परे है और ये एक ऐसा मामला है, जो दुश्मन देशों के साथ साथ दोस्त देशों को भी गलत संदेश भेजता है।












Click it and Unblock the Notifications