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ग्राउंड रिपोर्ट: ऑस्ट्रेलिया जाकर फंस गया अडानी का भविष्य?

ऑस्ट्रेलिया में अडानी के प्रस्तावित कोयला खान प्रोजेक्ट का कई महीनों से विरोध हो रहा है.

विरोध करने वालों के मुताबिक़ ये प्रस्तावित परियोजना पर्यावरण के लिए ख़तरनाक है और इससे वातावरण में ग्रीनहाउस गैस की मात्रा में तेज़ी से बढ़ोत्तरी होगी. हालांकि इसका समर्थन करने वालों का कहना है कि इससे लोगों को नौकरियां मिलेंगी.

लेकिन ज़मीन पर क्या हालात हैं ये जानने के लिए बीबीसी हिंदी की टीम ऑस्ट्रेलिया के कारमाइकल कोयला खान पहुँची.

ऑस्ट्रेलिया में अडानी के ख़िलाफ़ नारे क्यों?

ऑस्ट्रेलिया में अडानी का बहुत कुछ दांव पर

कोयले की खान
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कोयले की खान

ज़मीन का कोयला ज़मीन में ही रहना चाहिए?

कारमाइकल कोयला खान उत्तरी ऑस्ट्रेलिया के क्वींसलैंड राज्य में है जहाँ अडानी की कंपनी खनन करने वाली है.

समुद्र तट पर बसे बोवन से यहां पहुंचने के लिए क़रीब 400 किलोमीटर का लंबा सफ़र तय करना पड़ता है - पहले पक्की सड़क पर, फिर कच्ची सड़क पर.

रास्ते के दोनों तरफ़ न कोई घर हैं, न ही कोई होटल. बस छोटे-छोटे पहाड़, एकड़-एकड़ दूर तक फैले खेत और सड़कों पर टहलते, गाड़ियों को घूरते कंगारू. आप बस रफ़्तार से आगे चलते चले जाते हैं.

कई बार मन में सवाल आया कि इतने वीराने में खुदने वाली एक खान पर इतनी बहस या विवाद आखिर क्यों है.

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कोयले के इस्तेमाल से पहले उसकी गंदगी को पानी से धोया जाता है.
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कोयले के इस्तेमाल से पहले उसकी गंदगी को पानी से धोया जाता है.

रास्ते में हमें अडानी के विरोधियों का एक 'गुप्त' कैंप मिला - 'गुप्त' यानी उग्र अडानी समर्थकों से दूर ताकि 'उग्र अडानी समर्थक वहाँ न पहुँच जाएँ'.

जंगल के वीराने में मौजूद इस कैंप में वाई-फ़ाई की ठीक-ठाक व्यवस्था थी, खाना पकाते, बांटते और खाना खाते लोग थे, रहने के लिए तंबू थे और लैपटॉप पर प्रदर्शनों की योजना बनाते प्रदर्शनकारी थे.

'स्टॉप-अडानी' का संदेश लिखे हुए टी-शर्ट पहने कुछ लोग गिटार पर गाना गा रहे थे. कुछ लोग 'स्टॉप-अडानी' का पोस्टर बना रहे थे. कई जगहों पर दीवार के साथ अडानी के खिलाफ़ बैनर और पोस्टर रखे हुए थे.

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'गुप्त' अडानी विरोधी कैंप
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'गुप्त' अडानी विरोधी कैंप

लेकिन ये जगह कोई पिकनिक स्पॉट नहीं था. यहां मौजूद क़रीब 40 प्रदर्शनकारियों में से एक स्कॉट डेंस ने बताया, "ये कैंप अडानी को रोकने के लिए है. यहां लोग खाना बनाते हैं, सफ़ाई करते हैं और अडानी के ख़िलाफ़ होने वाले विरोध प्रदर्शनों की योजना बनाते हैं."

उनका कहना है, "वैज्ञानिक कहते हैं कि कोयला ज़मीन में ही रहना चाहिए, बाहर नहीं. इसीलिए हम यहां पर हैं."

ये पूछने पर इस विरोध के लिए पैसे कहाँ से आ रहे हैं, वे कहते हैं, "यहां पैसा चंदे से इकट्ठा होता है. यहां सब वालंटियर हैं. ऐसा नहीं कि कोई अमीर आदमी हमारी मदद कर रहा है."

लेकिन अगर अडानी कोई पश्चिमी कंपनी होती तो क्या तब भी प्रदर्शनकारी यहीं होते? भारत और ऑस्ट्रेलिया में कई लोग ये सवाल उठाते हैं. इसके जवाब में स्कॉट कहते हैं, "अगर ये कोई ऑस्ट्रेलियाई कंपनी होती तब भी हम यहीं पर होते और इसका विरोध करते."

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केन पीटर्स डॉड
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केन पीटर्स डॉड

आदिवासी समुदाय भी हैं खान के ख़िलाफ़

केंद्रीय संसाधन और उत्तरी ऑस्ट्रेलिया के लिए मंत्री मैथ्यू कैनवन ने हमें बताया, "किसी दूसरे देश की तरह ऑस्ट्रेलिया में भी एक छोटा तबका ऐसा है जो नहीं चाहता कि विदेशी यहां आएं."

"मुझे लगता है कि ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि पर्यावरण आंदोलनकारी ऑस्ट्रेलियाई सोसाइटी में विदेशियों, विदेशी निवेश के ख़िलाफ़ नस्लभेद की भावना को हवा दे रहे हैं. ये शर्मनाक है. लेकिन वो ऐसा कर रहे हैं."

कैंप के पास ही केन पीटर्स डॉड का घर था. वो बीरी-वीडी नाम के आदिवासी समुदाय से हैं. समुदाय के कई लोग अडानी की इस परियोजना का विरोध कर रहे हैं.

केन पीटर्स का घर पेड़, झाड़ियों और पर्यावरण बचाने का अनुरोध करने वाले पोस्टरों से पटा हुआ था.

घर के पीछे का एक कमरा चित्रों से भरा था. नज़दीक ही रंगों से पुती मेज़ पर लंबे समय से लगातार इस्तेमाल की गई कूची और रंग का बक्सा उलटा-पुलटा रखा हुआ था.

डॉड कहते हैं, "हमने देखा है कि पिछले सालों में कैसे हमारी परंपरागत जन्मभूमि का विनाश हुआ है. सरकार हमारी सहमति से और उसके बगैर ज़मीन ले लेगी इसलिए हमें उनके साथ समझौता करना पड़ता है. कंपनियां हमें जो मुआवज़ा देती हैं, वो बहुत कम होता है. खुदाई हुई तो इस खदान के ज़मीन के नीचे मौजूद पानी पर बहुत बुरा असर पड़ेगा."

"इस पानी को इकट्ठा होने में सदियां लग जाती हैं. लेकिन कोयला के कारण ये जल्द ही ख़त्म हो सकता है."

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पीछे से आती कार
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पीछे से आती कार

कारमाइकल कोयला खदान के इलाके को गैलिली बेसिन कहते हैं. जब हम प्रस्तावित खान के नज़दीक पहुंचने लगे तो एक कार ने हमारा पीछा किया. धूल के गुबार में चमकती हेडलाइट्स हमारी धड़कने बढ़ा रही थीं.

गाड़ी नज़दीक आई तो एक व्यक्ति उतरकर मोबाइल से हमारी तस्वीरें लेने लगा. नाम, पता पूछने पर बिना जवाब दिए वो व्यक्ति सूने इलाके में बनी एक इमारत के गेट में घुस गया.

प्रस्तावित इलाके में गाय और कंगारू धूप से बचने के लिए पेड़ के नीचे खड़े थे. मैंने खुद से पूछा, इसी सुनसान जगह के लिए ऑस्ट्रेलिया में इतना घमासान मचा हुआ?

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कारमाइकल माइन इलाके में कंगारू
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कारमाइकल माइन इलाके में कंगारू

खदान के साथ रेल लाइन भीआएगी

अडानी के लिए चुनौती न सिर्फ़ इस सुनसान इलाके में खान खोदने की है बल्कि निकाले गए कोयले को ढोकर 400 किलोमीटर दूर एबट प्वाइंट बंदरगाह तक पहुंचाने की भी है ताकि उसे निर्यात के लिए भारत या दूसरे बाज़ारों तक भेजा जा सके.

इसके लिए कंपनी को एक रेल लाइन बनानी होगी जिसके लिए आसपास के किसानों से ज़मीन ली गई है.

किसानों ने हमसे बात करने से मना कर दिया क्योंकि उन्होंने 'कॉन्फ़िडेंशियलटी एग्रीमेंट' पर हस्ताक्षर किए थे लेकिन उनमें से एक ने कहा कि सरकार को कुछ करना होता है तो आप उसे रोक नहीं सकते.

प्रोजेक्ट का विरोध करने वाले कहते हैं कि अगर रेल लाइन बनीं तो आसपास के निष्क्रिय पड़े प्रोजेक्ट भी फिर से ज़िंदा हो जाएंगे और रेल लाइन से धरती के नीचे दबे हज़ारों, करोड़ों टन कोयले को निकालकर निर्यात करने का रास्ता सुलभ हो जाएगा.

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अडानी ऑस्ट्रेलिया वेबसाइट के मुताबिक़ अगर अडानी की परियोजना पूरी तरह अमल में आई तो खदान से निकला गया कोयला 220 डिब्बों वाली रेल के ज़रिए क़रीब 400 किलोमीटर दूर ऐबट प्वाइंट बंदरगाह भेजा जाएगा.

एक बार में ये ट्रेन करीब 24 हज़ार टन कोयला बंदरगाह तक पहुंचाएगी.

परियोजना के समर्थकों के अनुसार इस प्रोजेक्ट से क्वींसलैंड में खुशहाली आएगी और लोगों को नौकरियां मिलेंगी.

अडानी ने बीबीसी को भेजे एक बयान में कहा कि उसने ऑस्ट्रेलिया में कंपनी पर लगाए गए पर्यावरण से जुड़े कठोरतम नियमों का पालन किया है और उसे 112 सरकारी स्वीकृतियां मिल चुकी हैं.

लेकिन लगातार हो रही आलोचना के कारण मामला रेल लाइन की फंडिंग पर आकर फंस गया है. बैंकों, वित्तीय संस्थानों के बाद स्थानीय क्वींसलैंड राज्य सरकार ने रेल लाइन की प्रस्तावित सरकारी कर्ज़ देने से अपने हाथ खींच लिए हैं. लेकिन ऑस्ट्रेलिया की केंद्रीय सरकार अडानी के साथ है.

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केंद्रीय ऑस्ट्रेलिया संसधान मंत्री मैट कैनवन
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केंद्रीय ऑस्ट्रेलिया संसधान मंत्री मैट कैनवन

इस कारण सवाल पूछे जा रहे हैं कि सालों से विवाद में फंसे इस प्रोजेक्ट का भविष्य अब क्या होगा, या फिर क्या कंपनी खुद इसमें पैसा लगाएगी.

बीबीसी को भेजे जवाब में कंपनी ने कहा, "अडानी प्रोजेक्ट को लेकर प्रतिबद्ध है और हमें विश्वास है कि हमें फंडिंग मिल जाएगी."

हालांकि इस विश्वास का आधार क्या है, इसका जवाब कंपनी ने नहीं दिया.

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अडानी विरोधी सामान
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भविष्य अक्षय ऊर्जा है तो कोयला क्यों?

पिछले कुछ सालों में वैश्विक परिस्थितियां बदली हैं. लोग जलवायु परिवर्तन, पेरिस क्लाइमेट चेंज समझौते को लेकर ज़्यादा जागरूक हुए हैं. रिपोर्टों के मुताबिक़, भारतीय कोयला मंत्री पीयूष गोयल कह चुके हैं कि भारत के पास पर्याप्त कोयला है और उसे कोयला आयात करने की ज़रूरत नहीं.

दुनिया की बड़ी कंपनियों में शुमार ब्लैकरॉक इन्वेस्टमेंट ग्रुप ने कहा, कोयले का भविष्य नहीं है, भविष्य अक्षय ऊर्जा का है. अमरीका और यूरोप में कोयला संयंत्र बंद हो रहे हैं. साथ ही सौर ऊर्जा और वायु ऊर्जा के दाम घटे हैं.

विश्व स्वास्थ्य संगठन की 2016 रिपोर्ट के मुताबिक़ वायु प्रदूषण से हर साल 30 लाख लोगों की मौत होती है.

एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में अक्षय ऊर्जा में 242 अरब डॉलर का निवेश हुआ जिससे साल 2016 में वैश्विक ऊर्जा क्षमता 138.5 गिगावाट हो गई है, जो पिछले साल से नौ प्रतिशत ज़्यादा है.

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टाउंसविल में अडानी का क्षेत्रीय हेडक्वार्टर
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टाउंसविल में अडानी का क्षेत्रीय हेडक्वार्टर

पर्यावरणविद् लांस पेन ने हमें प्लास्टिक के डिब्बों में बंद कोयले के टुकड़े दिखाए. लांस के मुताबिक ये टुकड़े उन्हें समुद्र तटों पर मिले.

"समुद्र तट पर इन गंदी चीज़ों का मिलना ख़तरनाक है... हम कोयला निकालते हैं. और फिर कोयले को वातावरण में बिखेर देते हैं. ये अच्छा नहीं है."

"क्वींसलैंड के तट पर ग्रेट बैरियर रीफ़ एक बाथटब जैसा है. आप महासागर की इस जगह में जो कुछ डालेंगे, वो वहीं रहेगा. अगर कोयले के बंदरगाह से कोयला गिरेगा तो वो वहीं रह जाएगा."

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अडानी विरोधी
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अडानी विरोधी

लांस पेन कहते हैं, "ये बात साफ़ है कि कोयला कोरल या मूंगे को खत्म कर देता है. ग्रेट बैरियर रीफ़ में बेहद अनूठे तरह की जीव-जंतु हैं जो कोरल ब्लीचिंग के कारण पहले ही ख़तरे में हैं."

क्वींसलैंड राज्य के तट पर ग्रेट बैरियर रीफ़ दुनिया की उन अद्भुत जगहों में से है जहां हज़ारों किस्म के अनोखे जीव-जंतु रहते हैं.

अडानी प्रोजेक्ट का विरोध करने वाले पूछ रहे हैं कि जब भारत और चीन अक्षय ऊर्जा में निवेश कर रहे हैं तो फिर कारमाइकल ख़ान से निकला कोयला कहां जाएगा? और ऐसे में मूलभूत सुविधाओं के निर्माण के नाम पर अरबों डॉलर खर्च करके वीराने में रेल लाइन बनाने जैसे काम करने का क्या तर्क है, और ऐसे में कौन इस परियोजना को ऋण देने के लिए राज़ी होगा?

अडानी दफ़्तर के बाहर प्रदर्शन
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अडानी दफ़्तर के बाहर प्रदर्शन

अधर में लटका अडानी का भविष्य

ख़ान से निकले कोयले में से ज़्यादातर को भारत निर्यात करने का प्रस्ताव था लेकिन अब ना तो अडानी और ना ही अडानी समर्थक साफ़-साफ़ बता रहे हैं कि कंपनी के लिए आगे का रास्ता क्या होगा.

केंद्रीय संसाधन मंत्री मैट कैनवन को विश्वास है कि गैलिली बेसिन जल्द खुलेगा क्योंकि "इतनी अच्छी गुणवत्ता का कोयला कहीं नहीं है. मैं अडानी के और दूसरी कंपनियों के रिकॉर्ड से खुश हूं और उनका यहां स्वागत करता हूं."

लेकिन सिडनी में ऊर्जा विश्लेषक टिम बकले को लगता है कि "अगर (अडानी) प्रोजेक्ट इस साल आगे नहीं बढ़ता तो मुझे नहीं लगता कि ये कभी आगे बढ़ पाएगा लेकिन जब एक तरफ़ अरबपति हो तो आप कुछ नहीं कह सकते. अगर वो (गौतम अडानी) चाहें तो इस परियोजना को आगे बढ़ा सकते हैं."

टिम बक्ले
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टिम बक्ले

करीब दो लाख की जनसंख्या वाले टाउंसविल में लोग चाहते हैं ये प्रोजेक्ट आगे बढ़े. नौकरी की चिंता पर्यावरण से जुड़ी परेशानियां को ढक लेती है.

यहां करीब 44 हज़ार लोग कोयला क्षेत्र से जुड़े हैं और पिछले 10 सालों में यहां ढेर सारी नौकरियां खत्म हुई हैं. यहां शहर के केंद्र में दुकानों, संस्थानों के गिरे शटर यहां कि बिगड़ती अर्थव्यवस्था की कहानी कह रहे थे.

नौकरी बड़ी या पर्यावरण?

एक व्यक्ति ने हमें बताया, "हमें नौकरियां चाहिए. इसलिए हम अडानी का समर्थन करते हैं."

एक दूसरे व्यक्ति ने कहा, "हमें लगता है कि खदान का काम आगे बढ़ना चाहिए. ऑस्ट्रेलिया में पर्यावरण को लेकर ढेर सारे कानून हैं."

टाउंसविल इंटरप्राइज़ेज़ के माइकल मैकमिलन
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टाउंसविल इंटरप्राइज़ेज़ के माइकल मैकमिलन

बिज़नेस लॉबी ग्रुप टाउंसविल इंटरप्राइज़ेज़ के माइकल मैकमिलन के मुताबिक अक्षय ऊर्जा में बढ़ते रुझान के बावजूद कोयले को खारिज करना फ़िलहाल जल्दबाज़ी होगी.

वो कहते हैं, "प्रदर्शनकारियों की कुछ चिंताएं सही हैं लेकिन उन्हें दोबारा सोचना होगा कि उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं को बिजली पैदा करने के लिए कोयला चाहिए. वो सिर्फ़ अक्षय ऊर्जा पर भरोसा नहीं कर सकते. अगर उन्होंने (विकासशील देशों ने) ऑस्ट्रेलिया से कोयला नहीं खरीदा तो वो कहीं और से खरीद लेंगे जो शायद उतनी अच्छी क्वालिटी का ना हो."

मैके निवासी और पूर्व 'स्टॉप अडानी' कैंपेनर क्लेयर जॉनस्टन के विचार इससे अलग हैं.

"मैं गौतम अडानी से कहूंगी कि उन्होंने जिस तरह की तबाही भारत में फैलाई है, वो दुनिया में न फ़ैलाएं. हम उन्हें ऑस्ट्रेलिया में ऐसा नहीं करने देंगे."

क्लेयर जॉन्स्टन
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क्लेयर जॉन्स्टन

क्लेयर जॉनस्टन कहती हैं, "अडानी को रोकना ज़रूरी है क्योंकि ये कंपनी पर्यावरण का आदर नहीं करती. ऑस्ट्रेलिया में पर्यावरण को लेकर मज़बूत कानून हैं लेकिन इस कंपनी का हमारी सरकार पर इतना प्रभाव है कि हमें कंपनी के खिलाफ़ खड़ा होना पड़ा है."

वो कहती हैं, "कोयला एक ऐसा डायनोसोर है कि इसे ज़मीन में ही दबा छोड़ देना चाहिए."

विशेषज्ञों की मानें तो सालों तक इस प्रोजेक्ट के फंसे रहने के बाद कंपनी विकल्पों पर विचार ज़रूर कर रही होगी. लेकिन विकल्प जो भी हों, उस पर भारत में ख़ास चर्चा होती नहीं दिख रही है.

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