Explained: यूरोप का बीमार देश? कभी फलती-फूलती जर्मन अर्थव्यवस्था को कैसा श्राप लगा?
Germany Economy: जर्मनी में फैली निगेटिविटी को इससे बेहतर तरीके से नहीं समझा जा सकता, कि यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में सबसे ज्यादा रोजगार देने वाला वोक्सवैगन में क्या हो रहा है। वोक्सवैगन में संकट किस स्तर का है, इसे आप इससे समझ सकते हैं, कि वो जर्मनी में अपने तीन कारखानों को बंद कर रहा है।
87 साल के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है, कि वोक्सवैगन अपने कारखानों को बंद करने जैसा कदम उठा रहा है, और इसकी वजह है, जर्मनी की राजनीति में फैल चुका दरार, जो अब एक खाई में तब्दील हो रही है।

जर्मनी की स्थिति क्यों बिगड़ गई है?
जर्मनी के तीन-पक्षीय 'ट्रैफिक लाइट' गठबंधन ने आखिरकार इस हफ्ते की शुरुआत में तब रेड लाइन पार कर लिया, जब चांसलर ओलाफ स्कोल्ज़ ने व्यापार समर्थक फ्री डेमोक्रेट्स के वित्त मंत्री क्रिश्चियन लिंडनर को कैबिनेट से निकाल दिया। इस 'तलाक' का मूल कारण सरकार की वित्तीय स्थिति और जर्मन अर्थव्यवस्था को फिर से कैसे मजबूत किया जाए, इस पर गहरे मतभेद थे।
एपी की रिपोर्ट के मुताबिक, चांसलर ने कहा कि सोशल डेमोक्रेट्स और ग्रीन्स से बनी उनकी अल्पमत सरकार "अगले साल की शुरुआत" तक जारी रहेगी - जबकि संसद में सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता, सेंटर-राइट क्रिश्चियन डेमोक्रेट्स के फ्रेडरिक मर्ज़ ने तत्काल अविश्वास प्रस्ताव और नए चुनावों का आह्वान किया है।
स्कोल्ज़ ने गुरुवार (7 नवंबर) को फिर से जोर दिया, कि वह 15 जनवरी से पहले विश्वास मत नहीं बुलाना चाहते हैं।
गठबंधन का पतन तीन गठबंधन सहयोगियों के बीच कई हफ्तों तक चली खींचतान के बाद हुआ है। लेकिन, राजनीतिक भूचाल का समय इससे बुरा नहीं हो सकता था: यूरोप और पश्चिम एशिया में लड़ाई जारी है, और जर्मनी रूस और चीन, दोनों के साथ अपने मजबूत व्यापारिक संबंधों से दूर होने के लिए संघर्ष कर रहा है। लेकिन अब सबसे बड़ा बदलाव, संयुक्त राज्य अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप का फिर से चुना जाना है, जो संकेत देता है, कि यूरोप को अपनी सुरक्षा के लिए और ज्यादा करने की जरूरत होगी और उसे बढ़े हुए टैरिफ के साथ तालमेल बिठाना होगा।
लिहाजा, इस समय जर्मनी के लिए एक मजबूत नेतृत्व काफी ज्यादा जरूरी हो जाता है।
ट्रैफिक लाइट गठबंधन - इसमें शामिल पार्टियों के रंगों के आधार पर, लाल सोशल डेमोक्रेट, पीले रंग वाले फ्री डेमोक्रेट और हरे रंग वाले ग्रीन पार्टी - तीनों घटकों के बहुत अलग-अलग विचारधारा के कारण हमेशा एक कमजोर गठबंधन रहा है।
मौजूदा टकराव के लिए ट्रिगर लिंडनर के फ्री डेमोक्रेट द्वारा टैक्स वृद्धि के प्रस्ताव को खारिज करने या ऋण लेने पर जर्मनी की कठोर सीमाओं में बदलाव के लिए सहमत होने का कदम था। इस बीच, स्कोल्ज की सोशल डेमोक्रेट पार्टी और ग्रीन्स पार्टी, सरकार पर देश की अर्थव्यवस्था में उच्च राज्य निवेश के लिए दबाव डाल रहे थे और कल्याण कार्यक्रमों में कटौती के फ्री डेमोक्रेट के प्रस्तावों का विरोध कर रहे थे।
वोक्सवैगन की 3 फैक्ट्री बंद होने का मतलब क्या है?
दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी वोक्सवैगन, जर्मनी की विनिर्माण क्षमता का प्रतीक है। कार निर्माता की बढ़ती परेशानियों का पूरे जर्मन ऑटोमोटिव उद्योग पर गहरा असर पड़ने वाला है, जो देश का सबसे बड़ा सेक्टर है, जो सकल घरेलू उत्पाद का 5% हिस्सा है और लगभग 800,000 लोगों को रोजगार देता है - जिनमें से एक तिहाई से ज्याजा वोक्सवैगन के लिए काम करते हैं। वोक्सवैगन में प्लांट बंद होने का मतलब, डाउनस्ट्रीम सेक्टर पर कई गुना प्रभाव होगा।
कंपनी के शीर्ष कर्मचारी प्रतिनिधि डेनिएला कैवेलो ने अक्टूबर के अंत में कहा, कि वोक्सवैगन जर्मनी में तीन कारखानों को बंद करने और हजारों कर्मचारियों को नौकरी से निकालने की योजना बना रहा है, क्योंकि वह गिरती बिक्री और चीन से बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच यूरोप में प्रतिस्पर्धी बने रहने की बेताब कोशिश कर रहा है।
NYT की एक रिपोर्ट के मुताबिक, जर्मनी में कंपनी के कर्मचारियों का प्रतिनिधित्व करने वाली परिषद की प्रमुख कैवेलो ने वोल्फ्सबर्ग में वोक्सवैगन के घरेलू संयंत्र में कर्मचारियों की एक सभा को बताया कि प्रस्तावित बंदियां उस योजना का हिस्सा थीं, जिसे प्रबंधकों ने कार्य परिषद के सामने पेश किया था। रिपोर्ट में कैवेलो के हवाले से कहा गया है, कि कंपनी "कम से कम तीन वी.डब्ल्यू. कारखानों को बंद करना चाहती है, और बाकी सभी संयंत्रों का आकार घटाना चाहती है, मुख्य क्षेत्रों से खुद को अलग करना चाहती है और इसके अलावा, शेष कर्मचारियों के वेतन में भारी कटौती करना चाहती है।"
ये समस्याएं वोक्सवैगन से कहीं आगे तक जाती हैं। पिछले महीने एक ऑटो शिखर सम्मेलन के बाद जर्मन एसोसिएशन ऑफ ऑटोमोटिव इंडस्ट्री (वीडीए) के प्रवक्ता ने एक बयान में कहा, "हम ऑटोमोटिव इंडस्ट्री में संकट का सामना नहीं कर रहे हैं, हम जर्मनी में एक व्यावसायिक स्थान के रूप में संकट का सामना कर रहे हैं।"
हाल ही में फेडरेशन ऑफ जर्मन इंडस्ट्रीज (बीडीआई) द्वारा कराए गए एक स्टडी रिपोर्ट के मुताबिक, एक बिजनेस लॉबी समूह, जर्मनी के औद्योगिक उत्पादन का 20% से ज्यादा हिस्सा अभी से लेकर 2030 के बीच जोखिम में है, जिसका मुख्य कारण उच्च ऊर्जा लागत और जर्मन वस्तुओं के लिए सिकुड़ते बाजार हैं। जर्मन इकोनॉमिक इंस्टीट्यूट (आईडब्ल्यू) और बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप द्वारा सह-लिखित रिपोर्ट में कहा गया है, कि "देश ने दहन प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में दशकों में जो बढ़त हासिल की है, वह महत्व खो रही है और बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, वैश्विक संरक्षणवाद और स्थानिक कमजोरियों के कारण जर्मन निर्यात मॉडल पर लगातार दबाव बढ़ रहा है।"
आर्थिक समस्याओं का जर्मनी की राजनीति पर असर
36 महीने पहले तक जर्मनी आर्थिक और राजनीतिक सफलता का प्रतीक था। पूर्व चांसलर एंजेला मर्केल को वास्तविक 'स्वतंत्र दुनिया का नेता' कहा जाता था और जर्मनी का निर्यात-संचालित आर्थिक मॉडल विश्व-स्तरीय था। लेकिन किस्मत ने जोरदार पलटी मारी है।
अब चांसलर स्कोल्ज पर अचानक चुनाव कराने का दबाव बढ़ रहा है और स्कोल्ज के सोशल डेमोक्रेट्स, जो अगले मार्च में चुनाव चाहते हैं, और विपक्षी क्रिश्चियन डेमोक्रेट्स (CDU) के बीच विवाद छिड़ गया है, जो बहुत पहले मतदान से फायदा उठाने की उम्मीद कर रहे हैं।
और विडंबना यह है, कि वर्तमान सत्तारूढ़ गठबंधन के पतन का समय: इस समय, स्कोल्ज़ की SPD तीसरे स्थान पर है जबकि फ्री डेमोक्रेट्स संभवतः जर्मन संघीय विधायिका, बुंडेस्टैग में प्रवेश करने के लिए न्यूनतम कट-ऑफ भी नहीं बना पाएंगे।
विजेता रूढ़िवादी CDU के होने की संभावना है, वह पार्टी जिसके शीर्ष पर मर्केल थीं और अब इसका नेतृत्व इसके संसदीय नेता और चांसलर उम्मीदवार फ्रेडरिक मर्ज़ और दक्षिणपंथी एएफडी कर रहे हैं।
जबकि स्कोल्ज मतदाताओं के बीच फिर से विश्वास बहाली के लिए मार्च तक का समय चाहते हैं, इसका मतलब होगा कि अल्पसंख्यक सरकार को करीब पांच महीने चलाना, जिसका मतलब होगा, कि विपक्ष के समर्थन के बिना कोई भी कानून पारित नहीं कर पाना। हाल की यूरोपीय राजनीति में, अचानक लिए गए चुनावों के फैसलों को आम तौर पर गलत समय पर लिया गया फैसला माना जाता है, जैसा कि इस साल की शुरुआत में फ्रांस में हुआ था।
जर्मन सत्तारूढ़ गठबंधन हमेशा से ही एक कठिन राह पर चलने वाला रहा है, क्योंकि इसमें तीन अलग-अलग विचारधारा वाली पार्टियां थीं और बीमार अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने के बारे में उनके अलग-अलग विचार थे। और इस स्थिति ने जर्मनी में भूचाल ला दिया है।
इससे भी बुरी बात यह है कि ट्रंप के व्हाइट हाउस में वापस आने के बाद -वाशिंगटन द्वारा नए टैरिफ प्रतिबंध जारी करने का कोई भी कदम जर्मन कंपनियों को अमेरिका में ज्यादा प्रोडक्शन ट्रांसफर करने के लिए मजबूर कर सकता है। इससे जर्मन मैन्युफैक्चरिंग बेस ताश के पत्तों की तरह बिखड़ सकता है।
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