G20 Summit: व्लादिमीर पुतिन के बिना जी20 शिखर सम्मेलन, क्या रूस के साथ टूट रही भारत की दोस्ती?
G20 Summit India-Russia: जैसे ही पिछले साल फरवरी में रूसी टैंक यूक्रेन में दाखिल हुए, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूरोप में सबसे बड़े युद्ध की शुरुआत हो गई। दुनिया भर के देशों पर एक तरफ पश्चिमी समर्थित कीव और दूसरी तरफ मॉस्को के बीच, किसी एक तरफ होने का दबाव आ गया।
तब से युद्ध के 18 महीने से ज्यादा समय बीत जाने के बाद से आज तक.. नई दिल्ली ने पुराने मित्र रूस की सीधी निंदा से सावधानीपूर्वक बचते हुए, दोनों पक्षों के बीच मजबूत संतुलन बनाए रखा है। लेकिन जैसे ही 20 (जी20) देशों के समूह के नेता अपने वार्षिक शिखर सम्मेलन के लिए शुक्रवार को भारतीय राजधानी में पहुंचने लगे हैं, भारतीय प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी पर रूस के खिलाफ अपना हाथ दिखाने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।

शीत युद्ध के साझेदार हैं भारत-रूस
भारत और रूस, शीत युद्ध-युग के साझेदार हैं। 1965 के युद्ध को समाप्त करने के लिए भारत और पाकिस्तान के बीच शांति की मध्यस्थता करने के बाद, 1971 की युद्ध में रूस ने भारत की अभूतपूर्व मदद की थी। जब अमेरिका ने 1971 के युद्ध के दौरान बंगाल की खाड़ी में एक खतरनाक एयरक्राफ्ट कैरियर भेज दिया था और भारत को फौरन युद्ध से पीछे हटने को कहा था, उस वक्त अगर कोई भारत के साथ तनकर खड़ा हो गया, वो रूस था (तत्कालीन सोवियत संघ)।
सोवियत संघ ने नई दिल्ली की रक्षा में क्रूजर और विध्वंसक हथियारों से लैश, 22वां बेड़ा तैनात कर दिया था, जबकि अमेरिका ने पाकिस्तान के समर्थन में 7वां बेड़ा भेजा था।
ऐतिहासिक रूप से, भारत अपने अधिकांश रक्षा शस्त्रागार और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में राजनयिक कवर के लिए भी रूस पर निर्भर रहा है। बदले में, भारत 1979 में अफगानिस्तान पर सोवियत आक्रमण का बचाव करने वाला एकमात्र दक्षिण एशियाई राष्ट्र था।
चार दशक से भी अधिक समय के बाद, भारत एक दुर्लभ प्रमुख अर्थव्यवस्था है जिसने यूक्रेन पर युद्ध के लिए रूस की खुले तौर पर आलोचना नहीं की है। युद्ध शुरू होने के बाद से, राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की युद्ध क्षमता को सीमित करने के लिए पश्चिमी प्रतिबंधों को दरकिनार करते हुए भारत, लगातार रूस से ऊर्जा और दूसरे सामान खरीद रहा है।
चीन के बाद रूसी तेल का तीसरा सबसे बड़ा खरीदार भारत बन गया है।
लेकिन, क्या अब बदलाव की बयार बहती दिख रही है?
यूक्रेन में युद्ध को लेकर भारत अब थोड़ा मुखर होने लगा है। हाल के वर्षों में, भारत ने रूस से अपनी रक्षा खरीद कम कर दी है और इसके बजाय, अमेरिका, फ्रांस और इज़राइल की ओर रुख कर लिया है। और अब जब रूसी तेल की कीमत बढ़ गई है, तो भारत के लिए इसे खरीदना थोड़ा कम आकर्षक हो गया है।
इस बीच, पुतिन ने G20 शिखर सम्मेलन में भाग नहीं लेने का फैसला किया है, जबकि अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन सहित सभी पश्चिमी नेता इसमें भाग ले रहे हैं और रूसी राष्ट्रपति के बारे में खबर है, कि वो चीन का दौरा करने वाले हैं।
जाहिर तौर पर, दो दोस्तों के बीच इस घटना ने दूरी बनाने की नींव रख दी है।
हालांकि, भारत के जल्द ही रूस के साथ औपचारिक रूप से अलग होने की संभावना नहीं है। लेकिन कुछ विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है, कि उनकी दोस्ती नई दिल्ली की भू-राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के लिए एक दायित्व बन गई है, जिसमें यूक्रेन में मौजूदा युद्ध में एक भरोसेमंद शांतिदूत भी शामिल है। और भारत-रूस संबंधों की दिशा में लगातार गिरावट आ रही है, जबकि मोदी सरकार ने पश्चिम के साथ संबंधों को मजबूत किया है।
'विरासत का रिश्ता'
शीत युद्ध के दौरान बनी, भारत और रूस के बीच आधुनिक मित्रता 1991 में सोवियत संघ के पतन के बाद से जारी है। यदि मोदी सरकार ने यूक्रेन में युद्ध को लेकर क्रेमलिन के खिलाफ पश्चिमी प्रतिबंधों में शामिल होने से इनकार कर दिया है, तो उस निर्णय के पीछे एक इतिहास है।
रूस ने नई दिल्ली के 1998 के परमाणु परीक्षणों के बाद भारत पर अमेरिका, जापान और कुछ अन्य देशों द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों का सामने आकर विरोध किया था। रूस भारत के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा था।
इसके अलावा, अभी भी भारत की वायु सेना और नौसेना द्वारा उपयोग किए जाने वाले लगभग 70 प्रतिशत लड़ाकू विमान, देश के 44 प्रतिशत युद्धपोत और पनडुब्बियां और सेना के 90 प्रतिशत से ज्यादा बख्तरबंद वाहन रूसी मूल के हैं। भारत और रूस, दोनों ने मिलकर ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल बनाई, जिसे भारक ने फिलीपींस को निर्यात किया है। वहीं, 2012 में भारत ने रूस से एक परमाणु पनडुब्बी भी लीज पर लिया है।
रूस भारत के नागरिक परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम का भी एक दृढ़ भागीदार रहा है, जिसने नई दिल्ली को दक्षिणी राज्य तमिलनाडु में कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र, देश का सबसे बड़ा संयंत्र, बनाने में मदद की है। उस परमाणु परिसर का अब विस्तार किया जा रहा है।
जबकि पिछले तीन दशकों में पश्चिम के साथ भारत के संबंध नाटकीय रूप से मजबूत हुए हैं, और रूस का वैश्विक दबदबा कमजोर हुआ है, लेकिन इसके बाद भी, नई दिल्ली मॉस्को को नाराज न करने के लिए सावधान रही है।
भारत के विदेश मंत्रालय के पूर्व सचिव अशोक कांथा ने कहा, कि "अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों के साथ हमारे संबंध, परिवर्तन के दौर से गुजर रहे हैं। वे चरित्र में करीब और अधिक रणनीतिक हो गए हैं, लेकिन रूस के साथ हमारे संबंधों को कमजोर करने की कीमत पर नहीं।"
उन्होंने कहा, कि "यह एक विरासती रिश्ता है, और एक-दूसरे का समर्थन करने का वह कारक नहीं बदला है।"
और कम से कम शुरुआत में, ऐसा प्रतीत हुआ कि यूक्रेन में युद्ध ने उस पुरानी दोस्ती को फिर से बढ़ावा दिया है। युद्ध से पहले भारत ने रूस से लगभग कोई तेल नहीं खरीदा। लेकिन युद्ध के बाद रूस के ख़िलाफ़ पश्चिमी प्रतिबंध लगने के बाद मॉस्को उसके शीर्ष आपूर्तिकर्ताओं में से एक बन गया, जिसने भारत जैसे दोस्तों को रियायती तेल की पेशकश शुरू कर दी।
स्वतंत्र अनुसंधान संगठन सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर के आंकड़ों के मुताबिक, युद्ध की शुरुआत के बाद से, भारत ने 34 बिलियन यूरो (36.7 अरब डॉलर) से थोड़ा ज्यादा मूल्य का तेल रूस से आयात किया है। 2023 में, भारत रूसी समुद्री कच्चे तेल का सबसे बड़ा खरीदार बन गया है, जिसका इन निर्यातों में 38 प्रतिशत हिस्सा है।
कंथा ने कहा, "यह भारत की रणनीतिक स्वायत्तता का हिस्सा है, जहां वह ऐसी नीतियों का अनुसरण कर रहा है जो उसके राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हैं, न कि किसी देश के अनुयायी के रूप में।"
फिर भी, ठोस आंकड़े और भू-राजनीति की वास्तविकताएं बताती हैं कि अपने राष्ट्रीय हितों के प्रति भारत की धारणाएं बदल रही हैं।

क्या रूस पर बदल रहा है भारत?
जबकि रूस, अब तक भारत के रक्षा उपकरणों का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बना हुआ है, हथियारों के व्यापार पर नज़र रखने वाले एक स्वतंत्र संस्थान SIPRI के पास उपलब्ध नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, पिछले दशक में इसकी बिक्री लगभग 65 प्रतिशत गिरकर 2022 में 1.3 अरब डॉलर हो गई है।
इसी समय, अमेरिका से भारत की रक्षा खरीद लगभग 58 प्रतिशत बढ़कर 219 मिलियन डॉलर हो गई है, हालांकि यह रूस से इसकी खरीद की तुलना में बहुत छोटा आंकड़ा है।
इसी तरह, फ्रांस से भारत की खरीदारी 2021 में लगभग 6,000 प्रतिशत बढ़कर 1.9 बिलियन डॉलर के शिखर पर पहुंच गई है, जबकि इज़राइल के साथ सौदे 20 प्रतिशत से थोड़ा अधिक बढ़कर 200 मिलियन डॉलर हो गए हैं।
निश्चित रूप से, रूस की हिस्सेदारी पर्याप्त बनी हुई है।
कांथा ने बताया, "किसी भी स्थिति में, हम थोड़े समय के भीतर सहयोग को कम नहीं कर सकते।"
भारत का इतिहास बन रहा है रूस?
विदेश नीति विश्लेषक और नई दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में निरस्त्रीकरण अध्ययन के एसोसिएट प्रोफेसर, हैप्पीमन जैकब ने रूसी कच्चे तेल के लिए भारत की भूख को "एक अवसरवादी खरीद" के रूप में वर्णित किया है।,
उन्होंने कहा, कि भारत का रूस से तेल खरीदना फायदे का सौदा है और "ऊर्जा की खरीदारी रिश्तों में किसी बड़े बदलाव का संकेत नहीं है।"
जैकब ने कहा, जो मायने रखता है, वह है लोगों के बीच संबंध और द्विपक्षीय निवेश, जो दोनों देशों के बीच काफी मजबूत है।
वहीं, भारत सरकार के आंकड़ों के अनुसार, लगभग 14,000 भारतीय रूस में रहते हैं, जिनमें 4,500 छात्र शामिल हैं। भारत में रहने वाले रूसियों की संख्या का डेटा उपलब्ध नहीं था, लेकिन जैकब का अनुमान है कि यह उससे "बहुत कम" है। इसके विपरीत, भारतीय मूल के 4.9 मिलियन लोग अमेरिका में रहते हैं। अन्य 2.8 मिलियन यूनाइटेड किंगडम और यूरोपीय संघ में रहते हैं।
उन्होंने कहा, कि "आज कितने भारतीय रूसी बोलते हैं? बहुत कम। युवा भारतीयों से पूछें, कि क्या उन्हें रूस के प्रति कोई आकर्षण है। उत्तर है नहीं। उन्होंने कहा, कि "रूस को पसंद भले ही सब करते हैं, लेकिन अब लोग रूस को भारत का अतीत कहते हैं। जबकि, यूरोप और अमेरिका को भारत का भविष्य।''
इसी तरह, मार्च 2023 को समाप्त होने वाले वित्तीय वर्ष के लिए मॉस्को और नई दिल्ली के बीच द्विपक्षीय व्यापार 49 अरब डॉलर था, जो अमेरिका के साथ भारत के व्यापार का एक तिहाई है। भारत अमेरिका के बीच कुल व्यापार 129 अरब डॉलर का है।
जबकि, भारत ऐतिहासिक रूप से इस बात से अभी भी इस बात से सावधान है, कि अमेरिका, उसके कट्टर दुश्मन पाकिस्तान के ऐतिहासिक तौर पर करीब रहा है और अभी भी अमेरिका का पाकिस्तान प्रेम जगता रहता है, लिहाजा एक्सपर्ट्स का कहना है, अमेरिका का भारत के साथ रणनीतिक रिश्ता है, लेकिन भारत का रूस के साथ दिल का रिश्ता है।
लेकिन, जियो-पॉलिटिक्स में दिल के रिश्ते भी टूटते हैं। इसका एक प्रमुख कारण चीन के साथ रूस के संबंधों का तेजी से मजबूत होना है, जिसे भारत एक प्रमुख रणनीतिक खतरा मानता है।
रूस जो भी हथियार प्रणाली भारत को बेचता है, वह अब चीन को भी बेचने लगा है, या बेच सकता है। इसका एक उदाहरण S-400 मिसाइल रक्षा प्रणाली है, जिसे रूस ने चीन और भारत दोनों को बेचा है। यह प्रणाली G20 शिखर सम्मेलन के लिए नई दिल्ली की सुरक्षा छतरी का एक हिस्सा है।
जैकब ने कहा, "रूसी मदद से चीन को मात देने की भारतीय इच्छा कहीं नहीं गई है।" उन्होंने कहा, कि "दूसरे शब्दों में कहें तो, चीन और भारत के बीच मध्यस्थ बनने की रूसी क्षमता अब बेहद सीमित है।"
इसके अलावा, भारतीय हित अब भू-राजनीतिक रूप से इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की ओर आकर्षित हो रहे हैं, जहां वह बीजिंग को अपने प्रमुख प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखता है। वहां वह ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, जापान और अमेरिका जैसी शक्तियों के साथ सहयोग कर रहा है।
"इस अर्थ में, रूस अब भारत का स्वाभाविक भागीदार नहीं है। ऐसा नहीं है, कि दोनों के बीच मनमुटाव है, लेकिन अब अन्य वास्तविकताएं भी हैं।''












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