French Elections: भारत की तरह ही फ्रांस में एकतरफा पड़े मुस्लिम वोट? तीसरे नंबर पर पहुंची दक्षिणपंथी पार्टी
French Elections 2024: फ्रांस में वामपंथी गठबंधन ने फ्रांसीसी संसद में सबसे ज्यादा सीटें जीतकर देश के दक्षिणपंथी लोगों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। और आरोप लग रहे हैं, कि जिस तरह से भारत में पीएम मोदी के खिलाफ मुस्लिम वोट पड़े, फ्रांस में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला।
फ्रांस संसदीय चुनाव में पहले राउंड में विशालकाय जीत हासिल करने वाली दक्षिणपंथी नेशनल रैली पार्टी, दूसरे राउंड का चुनाव खत्म होने पर तीसरे नंबर पर पहुंच गई है, जबकि वामपंथी पार्टी ने सबसे ज्यादा वोट हासिल किए हैं और इस जीत के बाद वामपंथी नेताओं ने कहा है, कि सरकार बनते ही फिलीस्तीन को राज्य की मान्यता दी जाएगी।

फ्रांसीसी चुनाव में सेकंड राउंड के मतदान में, न्यू पॉपुलर फ्रंट (NFP), जो कि वामपंथी पार्टियों का गठबंधन है, उसने सबसे ज्यादा सीटें जीतीं हैं और उसने मरीन ले पेन की नेशनल रैली (RN) पार्टी को धराशायी कर दिया।
हालांकि, दूसरे चरण के मतदान के नतीजों ने फ्रांस को राजनीतिक अनिश्चितता में डाल दिया है, क्योंकि चुनाव लड़ने वाली कोई भी पार्टी पूर्ण बहुमत हासिल करने के करीब नहीं पहुंच पाई है। यूरोपीय संघ के संसदीय चुनावों में अपनी पार्टी के खराब प्रदर्शन के फौरन बाद फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने देश की नेशनल असेंबली को भंग कर दिया था और चुनाव कराने का आह्वान कर दिया था, लेकिन उनका ये दांव उल्टा पड़ गया और उनकी पार्टी का गठबंधन दूसरे नंबर पर रहा है।
फ्रांसीसी अखबार ले मोंडे की रिपोर्ट के मुताबिक, दूसरे चरण के मतदान के बाद, वामपंथी पार्टियों के गठबंधन NFP ने नेशनल असेंबली में 182 सीटें जीतीं हैं, जिससे यह फ्रांसीसी संसद में सबसे बड़ा समूह बन गया। हालांकि, यह पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनाने के लिए 289 के आंकड़े तक पहुंचने से काफी दूर रह गया है।
राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की मध्यमार्गी पार्टी नसेंबल गठबंधन ने मतदान के दूसरे चरण में मजबूत वापसी की और 163 सीटें जीतने में सफल रहा। वहीं, मतदान के पहले चरण में बढ़त के बावजूद, दक्षिणपंथी नेता मरीन ले पेन के गठबंधन (RN) ने 143 सीटें जीतीं, जो दूसरे चरण में बहुत ही खराब प्रदर्शन है।

दक्षिणपंथी पार्टी नेशनल रैली के पिछड़ने की वजह?
1- पहले राउंड में आरएन गठबंधन के मजबूत प्रदर्शन ने इस बात की चिंता बढ़ा दी थी, कि फ्रांस द्वितीय विश्व युद्ध के सहयोगी विची शासन के बाद अपनी पहली दक्षिणपंथी सरकार चुन सकता है। यह डर इतना गंभीर हो गया था, कि पिछले हफ्ते मंगलवार तक, 200 से ज्यादा मध्यमार्गी और वामपंथी उम्मीदवारों ने वोटों के विभाजित को रोकने के लिए सेकंड राउंड से नाम वापस ले लिया। ये कुछ कुछ ऐसा ही है, जैसे भारत में बीजेपी के खिलाफ वोटों के विभाजन को रोकने के लिए कई पार्टियों ने अलग अलग जगहों पर मजबूत गठबंधन किया और उसका नतीजा भी देखने को मिला।
2- वामपंथी पार्टी की हार की दूसरी सबसे बड़ी वजह मुस्लिम मतदाता हैं। विकीपीडिया के मुताबिक, फ्रांस की कुल जनसंख्या में मुस्लिम आबादी 30 लाख से 57 लाख के बीच है। और मुस्लिम मतदाताओं ने पहले राउंड में दक्षिणपंथी पार्टी को जीत की तरफ बढ़ते देखकर थौक के भाव से वामपंथी पार्टियों के गठबंधन को वोट दिया है।
3- फ्रांस में इस्लाम दूसरा सबसे बड़ा धर्म है और मुसलमान फ्रांसीसी मतदाताओं का लगभग 5 प्रतिशत और कुल जनसंख्या का लगभग 9 प्रतिशत हैं।
4- फ्रांस में पिछले कुछ सालों में मुस्लिम कट्टरपंथ में खतरनाक इजाफा हुआ है और हालिया समय में कई दंगे भी हुए हैं। फ्रांस में मुस्लिमों का वोट पहले भी वामपंथी पार्टियों को ही जाता रहा है, लेकिन पहले मुस्लिम वोटबैंक में इमैनुएल मैक्रों की पार्टी भी सेंधमारी करती थी। लेकिन, हालिय समय में मैक्रों सरकार ने हिजाब पर प्रतिबंध और विदेशो से फ्रांसीसी मदरसों को मिलन वाले चंदे पर सख्त निगरानी के लिए कानून बना दिया, जिसकी वजह से उन्हें मुस्लिमों की गहरी नाराजगी झेलनी पड़ी है और चुनाव में इसका असर देखा गया है।
5- 2012 के राष्ट्रपति चुनाव के दौरान भी बिल्कुल यही स्थिति थी, जब फ्रांसीसी मुसलमानों ने राष्ट्रपति हॉलैंड के पक्ष में बड़े पैमाने पर मतदान किया था, क्योंकि उन्होंने भेदभाव, नस्लवाद और इस्लामोफोबिया से लड़ने का वादा किया था और उस चुनाव में सरकोजी हार गये थे, क्योंकि उन्होंने बार बार मुस्लिम कट्टरपंथ के खिलाफ भाषण दिए थे।
6- माना जा रहा है, कि अगर राष्ट्रपति मैक्रों अचानक संसद को भंग नहीं करते और तय वक्त पर चुनाव होने देते, तो दक्षिणपंथी गठबंधन और ज्यादा बेहतरीन प्रदर्शन कर सकती थी, लेकिन अचानक चुनाव ने दक्षिणपंथी पार्टियों को चुनाव के लिए तैयार होने का मौका नहीं दिया। हालांकि, इसका फायदा मैक्रों को भी नहीं मिला और वामपंथी गठबंधन ने सबसे ज्यादा सीटें हासिल कर लीं।

फ्रांस की राजनीति में आगे क्या होगा?
दूसरे चरण के मतदान के नतीजों के बाद, फ्रांस के प्रधानमंत्री गेब्रियल अटल ने घोषणा की है, कि वह राष्ट्रपति मैक्रों को अपना इस्तीफा सौंप देंगे। उन्होंने कहा कि वह अपने "सिद्धांतों" के अनुसार पद छोड़ देंगे।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में अपने फैसले की घोषणा करते हुए फ्रांसीसी प्रधानमंत्री ने माना, कि यह एक "अभूतपूर्व राजनीतिक स्थिति" है, जो कई लोगों को अनिश्चितता में डाल देगी। अटल ने स्पष्ट किया, कि वह देश को "तीन गुटों में विभाजित" नहीं देखना चाहते।
उन्होंने कहा, कि "यह फ्रांस नहीं है, यह फ्रांसीसी लोगों की राजनीति नहीं है। कल से, हमें एक नए राजनीतिक समझौते की दिशा में काम करना होगा, जिसमें स्पष्ट मूल्यों वाले सभी फ्रांसीसी शामिल होंगे और एकता की गारंटी होगी और कभी भी विभाजन के आगे नहीं झुकेंगे। हमें इन सबमें अपनी मानवता को बनाए रखना चाहिए, अपनी सुरक्षा की गारंटी देनी चाहिए, फ्रांस में विश्वास रखने वालों के साथ खड़े होना चाहिए।"
हालांकि, फ्रांस खुद को दक्षिणपंथी विचारधारा के चंगुल से बचाने में कामयाब रहा, लेकिन दो चरणों के परिणामों ने देश को राजनीतिक गतिरोध में डाल दिया। वहीं, अब माना जा रहा है, कि वामपंथी और इमैनुएल मैक्रों के गठबंधन में नई सरकार के गठन को लेकर बात हो सकती है।












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