Pakistan: पाकिस्तान में जान से ज्यादा कीमती हुआ आटा, शहबाज शरीफ की योजना कैसे छीन रही है लोगों की जिंदगी?
पाकिस्तान में आटा समेत तमाम खाद्य पदार्थों की भारी कमी है और आलू की कीमत 200 रुपये किलो है। जबकि, चिकेन की कीमत 800 रुपये किलो है। लिहाजा, लोगों के लिए घर चलाना असंभव हो चुका है।

Pakistan Flour Crisis: पाकिस्तान के गरीब लोगों के लिए दो वक्त की रोटी की व्यवस्था करने का मतलब है, जान पर खेल जाना। आटे के लिए पाकिस्तान की गरीब अवाम को सौ तरह के अपमान सहने पड़ते हैं।
पुलिस से गालियां खानी पड़ती है, लोगों के बीछ धक्कमुक्की करनी पड़ती है और कई घंटे लाइन में लगने के बाद भी निश्चित नहीं होता है, कि उन्हें आटे की बोरी मिलेगी या नहीं।
प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने हर गरीब को आटा मिले, इसके लिए मुफ्त आटा योजना पंजाब प्रांत में शुरू की है, लेकिन इस योजना की चपेट में आकर दर्जनभर से ज्यादा दुर्भाग्यशाली लोगों की मौत हो चुकी है। और इन घटनाओं ने पाकिस्तान के बर्बाद हालात को दुनिया के सामने ला खड़ा किया है।
पाकिस्तान में हजारों लोग, जिनमें ज्यादातर महिलाएं होती हैं, वो केवल 10 किलो आटा प्राप्त करने के लिए घंटों तक लंबी-लंबी कतारों में लगी रहती हैं। रोजे के महीने में कड़ी धूप के नीचे कतारों में खड़ा होना किसी बद्दुआ से कम नहीं है।
भीड़ को नियंत्रित करना काफी मुश्किल
पुलिस और जिला प्रशासन भीड़ को नियंत्रित करने के लिए कभी-कभी लाठी भी चला देती है, जिससे अलग भगदड़ मचता है और कई लोग हादसों का शिकार हो जाते हैं, लेकिन मुफ्त आटे के लिए पाकिस्तान में जान जोखिम में डालने वाली भीड़ में कोई कमी नहीं आ रही है। देश में 10 किलो के आटे की बोरी की कीमत 1500 रुपये के पार है, लिहाजा हर किसी के लिए 150 रुपये किलो आटा खरीदना संभव नहीं है। लिहाजा, मुफ्त आटा वितरण केन्द्रों पर हजारों लोगों की लंबी लंबी कतारें लगती हैं। लाहौर के एक मिल मालिर माजिद अब्दुल्ला ने डॉन को बताया, कि "डिस्ट्रीब्यूशन पॉइंट्स पर हिंसा खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही है।"
रमजान के महीने में फ्री आटा
शहबाज शरीफ ने रमजान के महीने में मुफ्त आटा बांटने का फैसला किया है और ये कार्यक्रम लोगों के लिए किसी तबाही से कम नहीं है। माजिद अब्दुल्ला ने डॉन से बात करते हुए कहा, कि "मुफ्त आटा वितरण योजना एक महीने चलेगी, जबकि गरीबी स्थायी है। कार्यक्रम के चलने तक हर कोई ज्यादा से ज्यादा फायदा उठाना चाहता है। बेनजीर इनकम सपोर्ट प्रोग्राम (बीआईएसपी) के साथ रजिस्टर्ड लोगों को पता है, उन्हें आटा मिलेगा ही, भले ही इसमें देर ही क्यों ना हो जाए। लेकिन, जो रजिस्टर्ड नहीं हैं, वे जानते हैं कि उन्हें आटा लेने के लिए घंटों लाइन में ही लगना होगा और शरारतें करना होगा"।
माजिद अब्दुल्ला ने कहा, कि "वे एक योजना के साथ आते हैं, तबाही मचाके और फिर भगदड़ का फायदा उठाकर आटा का बैग लेकर भाग जाते हैं।" जबकि, ऐसे लोगों का कहना है, कि घर में आटा नहीं है और रजिस्ट्रेशन करने के लिए भी लाइन में लगना होता है।
वहीं, डॉन की रिपोर्ट के मुताबिक, तारिक सुलेमान नाम के एक समाजशास्त्री अलग बात बताते हैं। उन्होंने कहा कि, "हजारों लोग रोजाना जुटते हैं, अपनी गरिमा और सामाजिक सम्मान की कीमत पर घंटों कतार में खड़े रहते हैं, भगदड़ वाली हिंसा का सामना करते हैं, जिनमें उनकी जान भी जा सकती है, और फिर भी वे उस मौके का फायदा हर दिन उठाने की कोशिश करते हैं। यह हमें क्या बताता है? यह हमें दिखाता है कि, कि एक पैकेट आटा कैसे अभी भी हमारे समाज में हमारे दूसरे कामों से भी ज्यादा जरूरी है और कैसे हमारे पास कोई दूसरे काम ही नहीं हैं, कि हम हजारों की संख्या बनाकर आटा लूटने पहुंच जाते हैं।"
उन्होंने कहा, कि "यह राजनीतिक और सामाजिक दोनों ही दृष्टि से चिंताजनक है। लेकिन, इस पर किसी का ध्यान नहीं जाता है"।
आटे से चुनावी फायदा लेने की कोशिश
डॉ. सानिया निश्टर, जो इमरान खान की सरकार के दौरान सोशल सेफ्टी को लेकर काफी मुखर थीं, उन्होंने शहबाज शरीफ पर आटा वितरण कार्यक्रम को लेकर लिए गये फैसले को, जल्दबाजी में लिया गया फैसला बताया है। उन्होंने कहा, कि इस तरह की योजना को ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन करने, कार्यक्रम को डिजाइन करने और डिस्ट्रीब्यूशन तक पहुंचने में कई महीनों का फ्रेमवर्क तैयार किया जाता है।
डॉ. सानिया निश्टर बताती हैं, कि "राशन रियायत को लेकर पहले से ही एक कार्यक्रम का डिजाइन किया गया था, जिसे इमरान खान सरकार ने रमजान पैकेज को देखते हुए हर साल के लिए डिजाइन किया था, ताकि राशन वितरण कार्यक्रम में जाया जा सके, लेकिन शहबाज शरीफ की सरकार ने इस कार्यक्रम को ही बंद कर दिया और जल्दबादी में आटा वितरण कार्यक्रम शुरू कर दिया। जिसका नतीजा लोगों को भुगतना पड़ रहा है"।
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आटा वितरण केन्द्रों का बुरा हाल
डॉन की रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान में हर सुबह गरीब, बुजुर्ग, कमजोर और महिलाएं खतरनाक जोखिम उठाने के लिए मजबूर हो रहे हैं और लगातार मीडिया रिपोर्टों से पता चलता है, कि जैसे ही सुबह-सुबह वितरण केंद्रों पर आटे का ट्रक आता है, वैसे ही धक्का-मुक्की शुरू हो जाती है। यह धक्का-मुक्की जल्द ही विवादों में बदल जाती है, क्योंकि लोग ट्रकों को घेर लेते हैं और पहले आटा लेने की कोशिश करते हैं, लिहाजा ट्रंक वाले भी लोगों के ऊपर ही 10 किलो के आटे का पैकेट फेंक देते हैं, जिससे भी लोग घायल हो जाते हैं।












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