Diplomacy: डोनाल्ड ट्रंप भारत के लिए शुभ साबित होंगे या अशुभ? जानिए Trump 2.0 की क्या हो सकती है नीति?

Trump India Policy: डोनाल्ड ट्रंप ने रिपब्लिकन नेशनल कन्वेंशन में भाषण देने के साथ ही अपनी कई नीतियों का फिर से खुलासा कर दिया है और एक संकेत दे दिया है, कि अगर वो राष्ट्रपति बनते हैं, तो दुनिया के साथ अमेरिका की डिप्लोमेसी कैसी हो सकती है और इससे भारत के लिए भी कुछ संकेत निकाले जा सकते हैं।

डोनाल्ड ट्रंप ने अपने राष्ट्रपति उम्मीदवार जेडी वेंस को चुना है, और भारतीय मूल की पत्नी होने की वजह से उन्होंने भारत के लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींचा है। अभी तक यूएस इलेक्शन को लेकर जो सर्वेक्षण सामने आए हैं, उनमें ट्रंप को बाइडेन से आगे दिखाया गया है।

Trump India Policy

इसलिए संभावना बन रही है, कि अमेरिका इस साल 5 नवंबर को होने वाले चुनाव में ट्रंप को फिर से चुन सकता है और अगर ऐसा होता है, तो जानना जरूरी हो जाता है, कि डोनाल्ड ट्रंप का पिछला कार्यकाल भारत के लिए कैसा रहा था और अगला कार्यकाल कैसा रह सकता है?

चीन के खिलाफ आमने-सामने की 'लड़ाई'?

डोनाल्ड ट्रंप और उनके राष्ट्रपति उम्मीदवार जेडी वेंस चीन को एक महत्वपूर्ण 'खतरे' के तौर पर देखते हैं और ट्रंप ने एक बार फिर से अपने भाषण में कोविड को 'चीनी वायरस' कहा है, जिससे साफ पता चलता है, कि ट्रंप 2.0 में अमेरिका के चीन के साथ रिश्ते काफी ज्यादा खराब होने वाले हैं।

डोनाल्ड ट्रंप ने अपने भाषण में साफ शब्दों में कहा है, कि वो चीन के इलेक्ट्रिक गाड़ियों पर इतना ज्यादा टैरिफ लगाएंगे, कि चीनी इलेक्ट्रिक कारों का अमेरिका में बिकना नामुमकिन हो जाएगा। इसके अलावा उन्होंने कहा, कि अगर किसी को कुछ अमेरिका में बेचना है, तो उस सामान को अमेरिका में आकर बनाना होगा।

जेडी वेंस के बारे में कहा जाता है, को ट्रंप से भी ज्यादा चीन के विरोधी हैं और चीन के साथ आक्रामक व्यापार के समर्थक हैं। उन्होंने अमेरिकी पूंजी बाजारों में चीन की पहुंच को प्रतिबंधित करने के मकसद से कई विधेयक सीनेट में पेश किए हैं। चीन पर अपने सख्त रुख के अलावा, जेडी वेंस यूरोप और एशिया में प्रमुख भागीदारों के साथ गठबंधन बनाए रखने का समर्थन करते हैं।

लिहाजा, एक्सपर्ट्स का कहना है, कि अगर ट्रंप चीन के खिलाफ आक्रामक अभियान शुरू करते हैं, तो उन्हें भारत की मदद की जरूरत होगी। इसके अलावा, ट्रंप के फैसलों से चीन में चलने वाली अमेरिकी कंपनियां देश से बाहर निकल सकती हैं और भारत के लिए ये एक बड़ा मौका बन सकता है। हालांकि, अभी तक देखा गया है, कि भारत उस मौके का लाभ उठाने से चूकता रहा है।

भारत के साथ फिर से कारोबार खराब?

ऐसी आशंकाएं हैं, कि ट्रंप-वेंस प्रशासन भारतीय वस्तुओं और सेवाओं पर आव्रजन प्रतिबंध और टैरिफ लगा सकता है। हालांकि, भारत के लिए दो अच्छी बातें ये हैं, कि एक अगर चीन के साथ अमेरिका के संबंध और बिगड़ते हैं, तो एशिया में अमेरिका को भारत का साथ हर हाल में चाहिए होगा और भारत वहां पर अपनी शर्तों को रख सकता है। वहीं, उप-राष्ट्रपति जेडी वेंस को बातचीत के लिए खुला माना जाता है, जिससे भारत खुलकर उनके साथ कारोबारी चिंताओं पर बात कर सकता है और किसी नतीजे पर पहुंच सकता है।

अच्छी बात ये है, कि भारत और अमेरिका, दोनों ही नहीं चाहेंगे, कि उनके संबंध किसी भी स्तर पर खराब हो।

ट्रंप 2.0 में कैसे हो सकते हैं भारत-US संबंध?

एक्सपर्ट्स का कहना है, कि जेडी वेंस की पत्नी भारतीय मूल की हैं और वो खुद अपने भाषण में कह चुके हैं, कि वो अपने ससुराल को लेकर थोड़े झुके हुए हैं, लिहाजा भारत के साथ बातचीत के दौरान उनके व्यक्तिगत संबंध, भविष्य में दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संबंधों को प्रभावित कर सकता है।

अमेरिकी कांग्रेस में रिपब्लिकन पार्टी की नीति पर नजर रखने वाले भारतीय राजनयिकों के मुताबिक, जेडी वेंस आम सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए यूरोप और एशिया में प्रमुख भागीदारों के साथ गठबंधन बनाए रखने में विश्वास करते हैं। हालांकि उन्होंने अभी तक भारत को भागीदार के रूप में नहीं पहचाना है, लेकिन डोनाल्ड ट्रंप काअपने 2016-20 के राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान इस मुद्दे पर स्पष्ट राय थी।

एक्सपर्ट्स का मानना है, कि ट्रंप 2.0 में दोनों देशों की प्राथमिकता व्यापारिक बाधाओं को दूर करना होगा, क्योंकि ट्रंप प्रशासन से बाकी के मुद्दों में भारत को कोई दिक्कत ही नहीं है। जैसे, ट्रंप आतंकवाद की वजह से खुलकर पाकिस्तान की आलोचना कर चुके हैं और जब अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की अपमानजनक वापसी हुई थी, तो कई रिपब्लिकन नेताओं ने इसके लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराया था।

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पाकिस्तान पर भारत को मिल सकता है ट्रंप का साथ

एक जनवरी 2018 को उस वक्त पाकिस्तान के साथ साथ भारत के लोग भी चौंक गये थे, जब डोनाल्ड ट्रंप ने एक ट्वीट करते हुए पाकिस्तान पर आतंकवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाया था। हालांकि, ट्वीट में भारत का जिक्र नहीं किया गया था, लेकिन वो ट्वीट भारत के लिए काफी महत्वपूर्ण था। ऐसा इसलिए, ट्रंप ने अपने ट्वीट पर उन बातों को कबूल किया था, जो पाकिस्तान को लेकर भारत हमेशा से उठाता आया है।

ट्रंप ने अपने ट्वीट पर साफ साफ शब्दों में लिखा था, कि अमेरिका ने पिछले डेढ़ दशक में पाकिस्तान को 33 अरब डॉलर दिए, लेकिन बदले में पाकिस्तान ने अमेरिका को सिर्फ धोखा दिया।

ट्रंप के प्रशासन ने इसके बाद पाकिस्तान को दी जाने वाली मदद में भारी कटौती कर दी और उसके बाद से ही पाकिस्तान आर्थिक संकट में फंसने लगा और आज भयावह हालात में फंस चुका है।

बराक ओबामा के शासनकाल में (2014 तक) अमेरिका ने पाकिस्तान को 2 अरब डॉलर दिए थे, जबकि डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में अमेरिका ने पाकिस्तान को सिर्फ 526 मिलियन डॉलर ही दिए।

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, डोनाल्ड ट्रंप के इन फैसलों से भारत को जबरदस्त फायदा हुआ और पाकिस्तान उस तरह से आतंकवाद को फंड नहीं कर पा रहा है, जैसा वो बराक ओबामा के शासनकाल तक करता आ रहा था। इसके अलावा, ट्रंप के एक्शन की वजह से इंटरनेशनल मंचों पर पाकिस्तान की काफी आलोचना की जाने लगी और अमेरिका में लोगों ने पहली बार कहना शुरू किया, कि 'पाकिस्तान ही आतंकवाद को शह देता है।'

चीन के संबंध में क्या होगी इस बार ट्रंप की नीति?

जून 2020 में जब गलवान घाटी में भारत और चीनी सैनिकों के बीच संघर्ष हुआ था और भारत के 20 सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए थे, उस वक्त अमेरिका की प्रतिक्रिया काफी सावधान और संतुलित थी। ट्रंप ने झड़प के एक दिन बाद 19 जून 2020 को कहा था, कि "हम भारत से बात कर रहे हैं, हम चीन से बात कर रहे हैं। वहां उन दोनों के बीच बड़ी समस्या है। दोनों एक दूसरे के सामने आ गये हैं और हम देखेंगे, कि आगे क्या होगा और हम उनकी मदद करने की कोशिश कर रहे हैं।"

डोनाल्ड ट्रंप की ये प्रतिक्रिया भारत को खुश करने लायक नहीं थी और ना ही चीन को नाराज करने वाली है।

ट्रंप ने कभी भी चीन के मामले में खुलकर भारत का साथ नहीं दिया, लेकिन चीन को लेकर उनके कारोबारी फैसलों ने अप्रत्यक्ष तौर पर भारत को मदद पहुंचाई।

ट्रंप प्रशासन ने ट्रेड वॉर, और टेक्नोलॉजी वॉर की शुरूआत करते हुए चीन की 5G कंपनियों को काफी हद तक अलगथलग कर दिया, जिससे चीन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर काफी अकेला पड़ा। लेकिन, पिछले चार सालों में अमेरिका और चीन के बीच तनाव और आगे बढ़ा है और आज के भाषण में ट्रंप ने साफ कर दिया है, कि अगर उनकी सरकार फिर से बनती है, तो वो अपने दूसरे कार्यकाल में चीन से सख्ती से पेश आएंगे।

इसके अलवा, डोनाल्ड ट्रंप की इंडो-पैसिफिक नीति बराक ओबामा और जो बाइडेन के कार्यकाल के मुकाबले ज्यादा स्पष्ट थी और ट्रंप प्रशासन ने ही इंडो-पैसिफिक में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका को अलग से रेखांकित किया था और ट्रंप 2.0 में इसमें और स्पष्टता आने की उम्मीद की जा सकती है।

ट्रंप को भारत से कारोबारी दिक्कतें क्या थीं?

डोनाल्ड ट्रंप ने अपने भाषण में साफ शब्दों में कहा, कि कुछ 'सहयोगी' देश हमारे से व्यापारिक संबंधों में काफी छूट से फायदा उठाते हैं, लेकिन अमेरिका को फायदा नहीं देते हैं। इसे एक संकेत माना जा रहा है, कि ट्रंप के कार्यकाल में बाकी मुद्दों पर तो भारत के साथ अमेरिका के संबंध अच्छे रहेंगे, लेकिन कारोबार को लेकर तल्खी आ सकती है। ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान भी कारोबारी संबंध कुछ हद तक खराब हो गये थे।

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, ट्रंप के पहले कार्यकाल में भारत और अमेरिका के बीच डिफेंस और सिक्योरिटी के मुद्दों पर दोनों देशों के संबंध काफी मजबूत हो गये थे और मोदी सरकार के साथ उनका तालमेल भी काफी अच्छा रहा था, लेकिन कारोबार और अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर भारत को निराशा हाथ लगी थी।

ट्रंप के कार्यकाल में भारत और अमेरिका अपने कारोबारी रिश्ते को बेहतर नहीं कर पाए।

भारत अमेरिका का एक बड़ा कारोबारी पार्टनर है, लेकिन डोनाल्ड ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल के दौरान 5 जून 2019 को कारोबार में GSP (जेनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रेफ्रेंस लिस्ट) यानि सामान्य तरजीही व्यवस्था जैसी चीजों पर भारत से अमेरिका जाने वाली सामानों पर टैक्स फ्री ट्रेड को खत्म कर दिया था। बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इससे अमेरिका में 5.6 अरब डॉलर का भारतीय निर्यात प्रभावित हुआ था। GSP पर सख्ती की वजह से अमेरिका में भारतीय सामान महंगे हो गये थे।

भारत अमेरिका को रत्न, आभूषण, चावल, चमड़ा और कुछ डिफेंस के सामान बेचता है और 2019 के बाद से भारतीय एक्सपोर्टर्स को अमेरिका में प्रोडक्ट्स बेचने में 10 प्रतिशत ज्यादा शुल्क देना पड़ता है। हालांकि, ट्रंप ने अपने कार्यकाल में भारत के साथ ट्रेड डील करने की कोशिश की थी, लेकिन उसपर सहमति नहीं बन पाई थी।

ऐसे में उम्मीद की जा सकती है, कि ट्रंप 2.0 में भारत और अमेरिका के रिश्ते और गहरे ही होंगे और इस बार उनकी नीति भारत को लेकर और ज्यादा साफ होगी।

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