आपको मालूम है महात्मा गांधी का उत्तर कोरिया से कनेक्शन?

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उत्तर कोरिया और अमरीका के बीच जारी मिसाइल संकट के दौर में उत्तर कोरिया यानी डीपीआरके को एक तानाशाह देश के रूप में देखा जा रहा है.

लेकिन डीपीआरके की स्थापना करने वाले किम अल सुंग मानते थे कि गांधी के अहिंसा आंदोलन से कोरियाई स्वाधीनता संग्राम को मदद मिली.

किम अल सुंग अपनी किताब विद द सेंचुरी में लिखते हैं, "मुझे इस बात का आश्चर्य हुआ कि कोरियाई प्रायद्वीप के एक पहाड़ी गांव में गांधी की पूजा करने वाले वृद्ध अनुयायी भी हैं. मुझे लगता है इस वृद्ध व्यक्ति को किसी ने कोरियाई अख़बार में छपा गांधी का पत्र दिखाया है. इसके बाद से ये व्यक्ति अहिंसा से आज़ादी हासिल करने की बात को लोगों के बीच पहुंचा रहा है."

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गांधी के अहिंसा सिद्धांत से हुआ फायदा

"जिलिन में बिताए अपने दिनों के दौरान गांधी का पत्र पढ़कर मैंने पार्क सो सिम से अहिंसा के सिद्धांत की आलोचना की थी. जिलिन में रहने वाले किसी युवा कोरियाई ने गांधी की विचारधारा को स्वीकार नहीं किया. कोई इतना मूर्ख नहीं था कि इस बात की कल्पना करे कि जापानी अहिंसा के रास्ते पर चलने से चांदी की प्लेट में हमें आज़ादी दे देंगे. लेकिन इस विचारधारा से इतना फ़ायदा ज़रूर हुआ कि हिंसक आंदोलन और स्वाधीनता संग्राम छोड़ चुके कुछ राष्ट्रवादी नेताओं से हमें सहानुभूति और समर्थन मिला."

नालंदा यूनिवर्सिटी के डीन प्रोफ़ेसर पंकज मोहन भी इस बारे में बताते हैं, "कोरियाई स्वाधीनता संग्राम गांधी के विचारों से प्रभावित था. गांधी की तरह उन्होंने भी असहयोग और स्वदेशी आंदोलन शुरू किया. इन आंदोलनों के नेता चो मन सिक को कोरिया का गांधी कहा जाता है. सिक गांधी के विचारों से प्रभावित थे."

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कोरिया के बंटवारे के बाद. ..

प्रोफ़ेसर पंकज मोहन बताते हैं, "एक कोरियाई अख़बार के संपादक किम संग सू ने गांधी को पत्र लिखकर कोरियाई लोगों को संदेश देने को कहा था जिसके जवाब में गांधी ने एक लाइन में लिखा, मैं बस ये कह सकता हूं कि मैं उम्मीद करता हूं कोरिया अंहिसा के रास्ते पर चलते हुआ आज़ादी प्राप्त करेगा. ये पत्र कोरियाई अख़बार डोंगा-इल्बों में छपा."

कोरिया के गांधी चो मन सिक का जन्म दक्षिणी प्योंगयोंग में हुआ था जो आज उत्तर कोरिया की राजधानी है. द्वितीय विश्व युद्ध में जापान की हार के बाद कोरिया को दो हिस्सों में बांटने की प्रक्रिया शुरू हुई.

ये तय हुआ कि कोरिया के दक्षिणी हिस्से में अमरीका का प्रशासन रहेगा. वहीं, उत्तरी कोरिया का प्रशासन सोवियत संघ के हाथ में जाएगा.

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कोरियाई युद्ध

लेकिन शीत युद्ध के बाद बदलते शक्ति संतुलन के चलते अमरीका ने 1947 के सितंबर महीने में कोरिया पर शासन के मुद्दे को सयुंक्त राष्ट्र संघ में पहुंचाया. और, फ़िर 1948 को यूएन की सामान्य सभा ने कोरियाई गणतंत्र को मान्यता दे दी.

इसके बाद साल 1950 में शुरू होने वाला इतिहास के सबसे भयानक युद्धों में से एक माना जाने वाला कोरियाई युद्ध कोरिया के बंटवारे के साथ ख़त्म हुआ.

बंटवारे के बाद भी दक्षिण कोरिया में गांधी का महत्व बरकरार रहा. फ़िर ऐसा क्या हुआ कि उत्तर कोरिया में गांधी का महत्व धीरे-धीरे नगण्य होता चला गया.

प्रोफ़ेसर पंकज मोहन इस मुद्दे पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं, "बंटवारे के बाद उत्तर कोरिया में वाम पंथी विचारधारा का विकास हुआ तो वहीं दक्षिण कोरिया में लोकतांत्रिक विचारधारा पनपी. ऐसे में उत्तर कोरिया की विचारधारा से गांधी के विचार मेल नहीं खाए और गांधी का महत्व कम होता गया."

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कोरियाई प्रायद्वीप में था गांधी का महत्व

जेएनयू में कोरियाई विभाग की प्रोफ़ेसर वैजयंती राघवन मानती हैं, "1926 के दौर में ये संभव है कि किम अल संग को गांधी के विचारों से सहमति न हो क्योंकि उस दौर में वह सोवियत संघ की रेड आर्मी द्वारा गुरिल्ला वॉर फेयर के लिए प्रशिक्षित किए जा रहे थे. लेकिन देश की बात करें तो ऐसा नहीं है क्योंकि गांधी जी का दुनिया भर में सम्मान हो रहा था तो कोरियाई प्रायद्वीप में भी गांधी जी का सम्मान किया जा रहा था."

उत्तर कोरिया के महात्मा गांधी से संबंध के बारे में इतना कहा जा सकता है कि प्योंगयोंग के गांधीवादी नेता चो मन सिक अहिंसा के सिद्धांत के आधार पर जापान के ख़िलाफ़ आंदोलन चला रहे थे. लेकिन अब प्योंगयोंग को दुनिया में तानाशाह का प्रतीक माना जा रहा है.

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