कोरोना पर सिंगापुर और ताइवान में सब अच्छा था, फिर क्या हो गया
सिंगापुर और ताइवान - इन दोनों देशों को कोरोना महामारी के दौरान कामयाबी की मिसाल के तौर पर पेश किया जाता रहा है जहाँ इस साल के शुरू से लगभग ना के बराबर मामले आए.
लेकिन इस महीने, तस्वीर बदल गई. दोनों ही देशों में अचानक से संक्रमण में तेज़ी आई है. सिंगापुर में पिछले सप्ताह 248 नए मामले आए, ताइवान में 1,200.
दोनों ही देशों में इसके बाद से पाबंदियाँ बढ़ा दी गईं, लोगों के इकट्ठा होने की सीमा घटा दी गई, स्कूलों को बंद कर दिया गया.
भारत और बाक़ी देशों से तुलना करने पर ये संख्या बहुत छोटी प्रतीत होती है. मगर इन देशों के लिए ये बड़ी बात है क्योंकि वहाँ कुछ ही महीने पहले किसी ने ऐसा सोचा भी नहीं था कि ऐसी स्थिति आएगी. तो आख़िर क्या गड़बड़ हो गई सिंगापुर और ताइवान में?
ताइवानः आत्मसंतुष्टि का ख़मियाज़ा
ताइवान उन देशों में था जिसने चीन में वायरस की ख़बर आते ही फ़ौरन विदेशों से लोगों के आने पर पाबंदी लगा दी थी. वो सख़्ती अभी भी बरक़रार है.
मगर देश के भीतर, वहाँ के लोगों को लगने लगा कि सब ठीक है, और ऐसा ही सरकार भी सोचने लगी.
नेशनल ताइवान यूनिर्वर्सिटी में एसोसिएट प्रोफ़ेसर लिन सिएन-हो बताते हैं कि अस्पतालों में पहले जैसी गंभीरता से टेस्टिंग बंद होने लगी, यहाँ तक कि जिन्हें बुख़ार आता उनकी भी जाँच नहीं की जाती जो कि कोरोना संक्रमण का एक सामान्य लक्षण है.
वेबसाइट आवर वर्ल्ड इन डेटा के अनुसार, ताइवान में फ़रवरी के मध्य में प्रति एक हज़ार व्यक्तियों में मात्र 0.57 लोगों के टेस्ट हुए, यानी एक से भी कम. इसी दौरान सिंगापुर में ये दर 6.21 और ब्रिटेन में 8.68 थी.
डॉक्टर लिन ने कहा,"डॉक्टर इसे गंभीरता से नहीं ले रहे थे, अस्पताल सतर्क नहीं थे, वो कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग को लेकर गंभीर नहीं थे. निश्चित तौर पर एक आत्मसंतुष्टि का भाव दिखने लगा था."
वो कहते हैं कि सब ये मानने लगे कि वायरस ताइवान के मज़बूत बॉर्डर को पार नहीं कर सकता.
इसका संकेत ख़ास तौर पर तब दिखने लगा जब वहाँ वैक्सीन नहीं लेने वाले पायलटों के क्वारंटीन होने की अवधि को पहले 14 दिनों से घटाकर पाँच दिन और फिर मात्र तीन दिन कर दिया गया.
इसके कुछ ही समय बाद, एक समूह में संक्रमण का पता चला जिसका संपर्क ताओयुआन एयरपोर्ट के पास नोवोटेल होटल में ठहरे चाइना एयरलाइंस के कुछ पायलटों से था. और इनमें से कई लोगों के बारे में बाद में पता चला कि उनमें वायरस का ब्रिटेन वेरिएंट B117 था.
इसके बाद वायरस बाहर फैलने लगा, और रेड लाइट में टी-हाउसों और मसाज केंद्रों तक जा पहुँचा जहाँ वयस्क लोग मस्ती के लिए जाते हैं.
डॉक्टर लिन बताते हैं,"वहाँ इनडोर जगहों पर लोग गा रहे थे, ड्रिंक कर रहे थे, एक-दूसरे के संपर्क में आ रहे थे. और ये केवल एक टी-हाउस की बात नहीं थी, एक ही स्ट्रीट पर बहुत सारे टी-हाउसों में यही हालत थी - इससे बहुत तेज़ी से संक्रमण फैला."
ताइवान के पूर्व राष्ट्रपति और एपिडेमियोलॉजिस्ट प्रोफ़ेसर चेन चिन-जेन बताते हैं कि पॉज़िटिव निकले ऐसे कई लोग बताना ही नहीं चाहते थे कि वो मस्ती के लिए कहाँ गए थे जिससे कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग बहुत कठिन हो गया.
वो कहते हैं, "ये बात याद दिलाती है कि आबादी के एक छोटे से हिस्से ने भी यदि नियम तोड़ा तो सिरा टूटता चला जाता है."
उन्होंने साथ ही कहा कि ताइवान ने जापान से भी सीख नहीं ली जहाँ ऐसे ही एडल्ट एंटरटेनमेंट की जगहों से संक्रमण फैला और अंततः उन्हें बंद करना पड़ा.
नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ़ सिंगापुर में एसोसिएट प्रोफ़ेसर ऐलेक्स कुक के अनुसार, ताइवान की स्थिति "इस रणनीति के ख़तरे को दर्शाती है जहाँ बाहर से वायरस को रोकने पर तो बहुत ज़ोर रहता है मगर देश के भीतर उसे रोकने के लिए उचि उपाय नहीं किए जाते".
सिंगापुरः क़िले में दरार
सिंगापुर की कहानी ताइवान से अलग है.
वहाँ मामले कम होने के बावजूद हमेशा सख़्ती रही - आठ से ज़्यादा लोगों के जमा होने पर रोक थी, क्लब बंद थे और अभी भी शादी जैसे समारोहों में सीमित संख्या में लोग आ सकते हैं.
मगर वहाँ वैक्सीनेशन की व्यवस्था में खामियाँ रह गईं. साथ ही दूसरी भी चूक हुई जैसे कि सिंगापुर का चांगी एयरपोर्ट, जो कि बहुत बड़ा शॉपिंग सेंटर भी है, वो देश में इस साल कोरोना संक्रमण का सबसे बड़ा केंद्र बन गया है.
अधिकारियों को बाद में पता चला कि एयरपोर्ट के बहुत सारे कर्मचारी वहाँ के एक ऐसे ज़ोन में काम कर रहे थे जहाँ ऐसे देशों से यात्री आ रहे थे जहाँ कोरोना संक्रमण काफ़ी फैला हुआ है.
इनमें से कई कर्मचारी एयरपोर्ट पर फ़ूड कोर्ट में खाना खाने जाने लगे जहाँ आम लोग भी आया करते हैं - और इस तरह वायरस फैलता गया.
बाद में सिंगापुर में ये भी पता चला कि कई संक्रमित लोगों में वही B1617 वेरिएंट है जो भारत में फैला है और काफ़ी ख़तरनाक है.
सिंगापुर ने अब आम लोगों के एयरपोर्ट में यात्रियों के टर्मिनल पर आने पर रोक लगा दी है. उसने साथ ही एयरपोर्ट पर ज़्यादा रिस्क वाले देशों से आनेवाली फ़्लाइटों को अलग करने की भी घोषणा की.
कुछ लोग ये सवाल पूछ रहे हैं कि ये उपाय पहले क्यों नहीं किए गए जब एक महीने पहले से ऐसा ख़तरा महसूस किया जाने लगा था.
मगर जानकार कहते हैं ये होना ही था.
एनयूएस के स्कूल ऑफ़ पब्लिक हेल्थ के प्रोफ़ेसर तियो यिक यिंग कहते हैं, "मैं समझ सकता हूँ कि लोगों में निराशा होगी क्योंकि ज़्यादातर सिंगापुरवासियों ने नियमों का पालन किया है."
"मगर हम चीन की तरह नहीं हैं जो अपनी सीमा को पूरी तरह से बंद कर देता है. हमारे देश की छवि, हमारी अर्थव्यवस्था, सबका संबंध इस बात से जुड़ा है कि हम एक व्यापारिक केंद्र हैं."
"साथ ही अगर आप पिछले साल अमेरिका को देखें तो वहाँ संक्रमण के सबसे गंभीर मामले चीन से नहीं बल्कि यूरोप से यात्रा करने वाले लोगों से आए. ऐसे में सिंगापुर कितने देशों के साथ सीमा बंद कर सकता है."
लेकिन प्रोफ़ेसर कुक का कहना है कि सिंगापुर अभी भी महामारी को क़ाबू में करने के लिए बहुत अच्छी स्थिति में हैं.
वो कहते हैं,"मैं ये कहने से बचना चाहता हूँ कि ग़लती हो गई."
धीमा वैक्सीनेशन - सिंगापुर और ताइवान दोनों की चुनौती
सिंगापुर और ताइवान दोनों ही देश वैक्सीनेशन की धीमी रफ़्तार से जूझ रहे हैं.
ताइवान में जब सब ठीक था तो बहुत सारे लोग वैक्सीन नहीं लेना चाहते थे. फिर वहाँ प्रचलन में आई मुख्य वैक्सीन ऐस्ट्राज़ेनेका को लेकर डर से हिचकिचाहट और बढ़ गई.
हालाँकि अब मामले बढ़ने के बाद वहाँ लोग वैक्सीन लेने आ रहे हैं. मगर मुश्किल केवल एक है - वहाँ वैक्सीन की कमी है.
ताइवान की आबादी 24 लाख है और उसके पास वैक्सीन केवल तीन लाख हैं.
डॉक्टर चेन कहते हैं, "हमने अंतरराष्ट्रीय कंपनियों से वैक्सीन लेने का भरसक प्रयास किया मगर हमें मिला नहीं. अब एकमात्र रास्ता है कि हम ये वैक्सीन ख़ुद बनाएँ."
ताइवान अभी दो वैक्सीन के विकास पर काम कर रहा है जो जुलाई के अंत तक आ सकती है.
सिंगापुर की भी यही कहानी है.
देश की लगभग 30% आबादी को टीका लग चुका है जो दक्षिण पूर्व एशिया में सबसे ज़्यादा है.
मगर वहाँ भी वैक्सीन की कमी है. हालाँकि सरकार को उम्मीद है कि इस साल के अंत तक वो पूरी आबादी को वैक्सीन दे सकेगी.
प्रोफ़ेसर तियो कहते हैं, हमारा अनुमान है कि वैक्सीन की ये ज़रूरत लंबे समय तक रहेगी, तो हम भी अपनी वैक्सीन ख़ुद बनाने की कोशिश कर रहे हैं."
वो साथ ही कहते हैं कि सिंगापुर और ताइवान की स्थिति से सारी दुनिया को सबक लेना चाहिए.
"जब हम देखते हैं कि यूरोप या अमेरिका में ढील दी जा रही है, तो मुझे लगता है कि उन्हें सतर्क रहना चाहिए और देखना चाहिए कि दुनिया में क्या हो रहा है."
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