चीन की वजह से श्रीलंका को IMF से कर्ज मिलना हुआ और भी मुश्किल, जाने कैसे ड्रैगन पर भरोसा करना पड़ा भारी?
श्रीलंका चाहता है कि IMF उसे चार सालों में 8 किस्तों में ये रुपये दे लेकिन चीन ने अब तक श्रीलंका को इससे जुड़ा कोई वित्तीय आश्वासन नहीं दिया है। इसलिए अब तक ये समझौता अधर में लटका हुआ है।

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IMF और श्रीलंका के बीच शुक्रवार को बैठक में मौजूदा ऋणों को पुनगर्ठित करने के तरीकों पर चर्चा होने वाली है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक IMF वर्चुअल माध्यम से चीन, भारत और पैरिस क्लब के अधिकारियों के साथ बैठक करेगा। श्रीलंका के साथ IMF का 2.9 बिलियन डॉलर का समझौता अभी पूरा नहीं हो पाया है। श्रीलंका चाहता है कि IMF उसे चार सालों में 8 किस्तों में ये रुपये दे लेकिन चीन ने अब तक श्रीलंका को इससे जुड़ा कोई वित्तीय आश्वासन नहीं दिया है। इसलिए अब तक ये समझौता अधर में लटका हुआ है। आईएमएफ से लोन के लिए श्रीलंका को चीन के समर्थन की जरूरत है। श्रीलंका को उम्मीद थी कि उसे चीनी कर्ज पर मोरेटोरियम मिल जाएगा लेकिन अब तक ड्रैगन ने अपने मित्र देश को इसके लिए क्लीयरेंस नहीं दिया है।
समर्थन को भारत तैयार
वहीं भारत की बात की जाए तो वह डीएसए यानी ऋण स्थिरता विश्लेषण के आधार पर अपने पड़ोसी देश का समर्थन करने के लिए सहमत हो गया है। जबकि चीन में अभी भी अगले महीने मिलने वाले आईएमएफ के कार्यकारी बोर्ड के साथ ऋण अधिस्थगन और ऋण पुनर्गठन की अवधि को लेकर मतभेद हैं। आईएमएफ या तो श्रीलंका को ऋण दे सकता है या फिर इस साल बसंत में या फिर उसके बाद चीन के बोर्ड में आने की प्रतीक्षा कर सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक श्रीलंका पर चीन का 7.8 बिलियन डॉलर का ऋण है। इसमें EXIM बैंक से द्विपक्षीय ऋण और चीनी विकास बैंक से वाणिज्यिक ऋण दोनों ही शामिल हैं।
श्रीलंकाई नेताओं का पसंदीदा स्थल बना चीन
बीते कुछ सालों में चाहे वो पिछले राष्ट्रपति राजपक्षे हों या फिर मौजूदा राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे हों सभी ने इन पैसों का उपयोग हंबनटोटा बंदरगाह, मट्टाला हवाई अड्डा, नोरोचोलई बिजली संयंत्र, कोलंबो बंदरगाह शहर जैसे सफेद हाथी परियोजनाओं को प्रायोजित करने में किया और इनमें भारी मात्रा में पैसा फूंका। इसके बदले चीन ने श्रीलंका को दीर्घकालिक कर रियायत दी और बदले में श्रीलंका को मनमर्जी हांकने लगा।
21वीं शताब्दी में चीन, श्रीलंकाई नेताओं का पसंदीदा स्थल बन गया। बीजिंग के दबाव में कोलंबो ने भारत से दूर रहने का विकल्प चुन लिया। आश्चर्य तो इस बात का भी है कि कैसे इतना सब होने के बावजूद श्रीलंकाई राजनीतिक नेतृत्व की आंखें अब तक नहीं खुल पाई हैं। वह यह नहीं समझ पा रहा है कि कैसे चीन ने उसे खुद के जाल में बुरी तरह से उलझा रखा है। अभी तक श्रीलंका ने त्रिंकोमाली बंदरगाह को विकसित करने के भारतीय प्रस्ताव पर हरी झंडी नहीं दिखाई है। यह और बात है कि भारत ने पिछले साल श्रीलंका को उसके बढ़ते आर्थिक संकट से उबारने के लिए भोजन, पेट्रोल और दवाओं सहित लगभग चार अरब डॉलर की सहायता प्रदान की थी।
जारी रह सकती है राजनीतिक अस्थिरता
चूंकि चीनी EXIM बैंक अभी कोलंबो के लिए केवल दो साल के ऋण स्थगन का विस्तार करने को तैयार है, जिससे श्रीलंका को कोई फायदा मिलता नहीं दिख रहा है। ऐसे में द्वीप देश की अर्थव्यवस्था जल्द ही नीचे की ओर आ जाएगी। इससे निकलने के लिए आईएमएफ को और कड़ी शर्तों के साथ बकाया पर ऋण देना होगा। इसका मतलब न केवल द्वीप राष्ट्र में आगे राजनीतिक अस्थिरता है और इस उथल-पुथल का स्पष्ट लाभार्थी जेवीपी जैसी श्रीलंका की कम्युनिस्ट पार्टियां होंगी। श्रीलंका का राजनीतिक माहौल अनिश्चित बना रहेगा। हालांकि जब तक मुख्यधारा की पार्टियां इस आघात से उबर नहीं पातीं, तब तक राष्ट्रपति विक्रमसिंघे, जो अपनी पार्टी के एकमात्र सांसद हैं, आम चुनावों की घोषणा करने के लिए उत्सुक नहीं होंगे। श्रीलंकाई रुपये के मुकाबले अमेरिकी डॉलर अब तक के उच्चतम स्तर पर है और खाद्य मुद्रास्फीति दो अंकों में है, श्रीलंका के लिए चीजें बेहतर होने से पहले और भी बदतर हो जाएंगी और इसमें कम से कम एक दशक लग सकता है।












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