चीन ने बनाया अपना खुद का आर्टिफिशियल 'सूरज', 7 करोड़ डिग्री सेल्सियस निकली ऊर्जा, टेंशन में दुनिया
चीन ने अपना खुद का कृत्रिम सूरज तैयार कर लिया है, जिससे 7 करोड़ डिग्री सेल्सियस की ऊर्जा निकली है, जो एक विश्व रिकॉर्ड है।
बीजिंग, जनवरी 05: पूरी दुनिया को हैरान करते हुए चीन ने अपना खुद का 'नकली सूरज' बनाने में कामयाबी हासिल कर ली है और चीन के आर्टिफिशियल सूरज से जितनी ऊर्जा निकली है, उसने पूरी दुनिया को टेंशन में डाल दिया है। पिछले लंबे वक्त से चीन "कृत्रिम सूरज" के साथ प्रयोग कर रहा है, जिसे दुनिया के कई वैज्ञानिकों ने पूरी दुनिया के लिए ही खतरनाक बताया है और चीन के इस आर्टिफिशियल सूरज के औचित्य पर सवाल उठाए हैं।

असली सूरज से ज्यादा निकली ऊर्जा
चीन ने अपना ये आर्टिफिशियल सूरज हेफेई में स्थिति चीन के न्यूक्लियर फ्यूजन रिएक्टर में तैयार किया है और करीब 17 मिनट तक इस न्यूक्लियर फ्यूजन रिएक्टर से 7 करोड़ डिग्री सेल्सियस ऊर्जा निकलती रही, जो असली सूरज से निकलने वाली ऊर्जा से भी ज्यादा है। रिपोर्ट के मुताबिक, चीन ने आर्टिफिशियल सूरज के साथ ये प्रयोग बीते 30 दिसंबर को किया है और ऐसा पहली बार हुआ है, जब इतनी ज्यादा देर के लिए परमाणु फ्यूजन रिएक्टर से इतनी ज्यादा ऊर्जा निकलती रही। चीन ने इससे पहले अपने नकली सूरज से करीब 1.2 करोड़ डिग्री ऊर्जा निकाली थी और अब ड्रैगन ने अपने ही रिकॉर्ड को ब्रेक किया है।
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नकली सूरज से अपार ऊर्जा
आर्टिफिशियल सूरज से अपार ऊर्जा निकालने के प्रयोग में सफल रहने के बाद इसकी घोषणा शुक्रवार को चीनी विज्ञान अकादमी के प्लाज्मा भौतिकी संस्थान के एक शोधकर्ता गोंग जियानजू ने की है, जो पूर्वी चीन के अनहुई प्रांत की राजधानी हेफेई में किए गए इस प्रयोग के प्रभारी हैं।चीन की सरकारी न्यूज एजेंसी सिन्हुआ से बात करते हुए प्रयोग के प्रमुख जियानजू ने कहा कि, 'हमने 2021 की पहली छमाही में एक प्रयोग में 101 सेकंड के लिए 1 करोड़ 20 लाख डिग्री सेल्सियस का प्लाज्मा तापमान हासिल किया था और अब हमने 7 करोड़ डिग्री सेल्सियस का तापमान हासिल कर लिया है'।

करीब 1056 सेकंड चला प्रयोग
प्रोजेक्ट के डायरेक्टर के मुताबिक, इस बार फ्यूजन रिएक्टर में प्लाज्मा ऑपरेशन करीब 1,056 सेकंड तक चला है और इस दौरान हमने 7 करोड़ डिर्गी सेल्सियस के करीब तापमान हासिल किया जो करीब 17 मिनट तक स्थिर रहा।' आपको बता दें कि, ईएएसटी और अन्य फ्यूजन रिएक्टरों के केंद्र में टोकामक है। यह एक उपकरण है, जिसकी शुरुआत 1950 के दशक में सोवियत संघ के वैज्ञानिकों नेऊर्जा पैदा करने के लिए की थी। एक टोकामक हाइड्रोजन आइसोटोप को एक गोलाकार आकार में सीमित करने के लिए एक शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र का इस्तेमाल करता है, और ये एक कोर्ड सेब के समान होता है, जहां संलयन के बाद उत्पन्न ऊर्जा माइक्रोवेव द्वारा प्लाज्मा में गर्म होते हैं।

क्या होता है प्लाज्मा?
आपको बता दें कि, प्लाज्मा वो है, जिसे अक्सर ठोस, तरल और गैस के बाद पदार्थ की चौथी अवस्था के रूप में संदर्भित किया जाता है और यह तब उत्पन्न होता है, जब गैस में परमाणु आयोनाइज्ड हो जाते हैं। प्लाज्मा इतना गर्म पदार्थ है कि, इसमें इलेक्ट्रॉनों को परमाणुओं से अलग कर दिया जाता है, जिससे एक आयोनाइज्ड गैस बनती है।

अनंत ऊर्जा निकालने की कोशिश
वहीं, चीन का कहना है कि उसके रिएक्टर को परमाणु संलयन प्रक्रिया को दोहराने के लिए डिज़ाइन किया गया है जो प्राकृतिक रूप से सूर्य और तारों में होती है, ताकि लगभग अनंत स्वच्छ ऊर्जा निकाली जा सके।चीन के पूर्वी अनहुई प्रांत में स्थित और 2020 के अंत में पूरा हुए इस रिएक्टर को अक्सर अत्यधिक गर्मी और बिजली पैदा करने के कारण 'कृत्रिम सूर्य' कहा जाता है। फ्यूजन पावर प्लांट बिजली उत्पादन क्षेत्र से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने के लिए तैयार हैं, जो विश्व स्तर पर इन उत्सर्जन के प्रमुख स्रोतों में से एक है। आपको बता दें कि, न्यूक्लियर फ्यूजन अंततः कोयला और गैस जैसे ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन करने वाले ऊर्जा स्रोतों को बदलकर जलवायु परिवर्तन का मुकाबला कर सकता है।

टेंशन में दुनिया के वैज्ञानिक
एक तरफ चीन ने दावा किया है कि, उसका मकसद स्वच्छ ऊर्जा निकालना है, ताकि ग्रीन हाउस गैसों को खत्म करने में मदद मिले, लेकिन, चीन के हाथ लगने वाली इस अपार शक्ति ने दुनियाभर के वैज्ञानिकों को टेंशन में ला दिया है। चीन के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी टेक्नोलॉजी हासिल कर ली है, जो उसे बाकी देशों से काफी आगे ले जाता है, जिसे बनाने में अभी भी विश्व के सभी संपन्न देश संघर्ष कररहे हैं। वहीं, एक्सपर्ट्स का कहना है कि, चीन के हाथ में ये बहुत बड़ी कामयाबी लगी है और अब चीन को देखकर अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों को भी इस टेक्नोलॉजी में रिसर्च करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।

चीन की आगे की योजना क्या है?
चीनी वैज्ञानिक अब अंतरराष्ट्रीय थर्मोन्यूक्लियर प्रायोगिक रिएक्टर (आईटीईआर) पर काम कर रहे हैं और अब फ्रांस में वैज्ञानिकों के सहयोग से परमाणु संलयन रिएक्टर का उपयोग करने की योजना बना रहे हैं। प्रोवेंस-आधारित ITER परियोजना के तहत चीन की योजना इस आर्टिफिशियल सूरज से साल 2035 तक बिजली की आपूर्ति शुरू होने की उम्मीद है, और एक बार पूरा होने के बाद यह दुनिया का सबसे बड़ा न्यूक्लियर रिएक्टर बन जाएगा। ब्रिटेन में, बोरिस जॉनसन की सरकार भी अपनी 'हरित औद्योगिक क्रांति' के हिस्से के रूप में एक परमाणु संलयन बिजली स्टेशन बनाने की योजना बना रही है।

काफी ज्यादा कीमती है ये टेक्नोलॉजी
संलयन को ऊर्जा की पवित्र स्रोत माना जाता है और यह हमारे सूर्य की तरह की ऊर्जा प्रदान करता है और इससे प्रदूषण भी नहीं निकलता है। इस तरह के रिएक्टर से करीब डेढ़ करोड़ डिग्री सेल्सियस ऊर्जा आसानी से मिल सकती है और यह भारी मात्रा में ऊर्जा बनाने के लिए परमाणु नाभिक का विलय करता है और यह प्रक्रिया परमाणु हथियारों और परमाणु ऊर्जा संयंत्रों में उपयोग की जाने वाली विखंडन प्रक्रिया के विपरीत होता है, जिसमें उन्हें टुकड़ों में विभाजित किया जाता है। नाभिकीय विखंडन के विपरीत, संलयन कोई ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन नहीं करता है और दुर्घटनाओं या परमाणु सामग्री की चोरी का भी कम खतरा रहता है। लेकिन, न्यूक्लियर फ्यूजन को हासिल करना काफी ज्यादा महंगा है और आईटीईआर की कुल लागत 22.5 अरब डॉलर होने का अनुमान है।
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