बाइडेन ने US की विदेश नीति का किया बेड़ा गर्क, जानें कैसे शी जिनपिंग-पुतिन कर रहे नई दुनिया का निर्माण?
जो बाइडेन अफगानिस्तान पर काफी कनफ्यूज रहे, जबकि बाइडेन की खराब नीति से खाड़ी देश अमेरिका के हाथों से निकल चुका है। वहीं, सहयोगी देशों में भी अमेरिका के प्रति विश्वास कम हुआ है।

Joe Biden US Foreign Policy: रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने जैसे ही मॉस्को में मुलाका की और 'एशिया पैसिफिक नीति' का ऐलान किया, ठीक वैसे ही साबित हो गया, कि जियो-पॉलिटिक्स में अमेरिका की बादशाहद का अंत हो गया है और अब दुनिया मल्टी पोलर (बहुध्रुवीय) डायरेक्शन में घूम चुकी है। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की इस सप्ताह अपने मित्र, राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मुलाकात हुई है और इस मुलाकात के दौरान कई चीजें, जो वास्तविक हो गईं, वो ये कि बीजिंग अब एक महाशक्ति बन चुका है और जिसका प्रभाव अब एशिया से बहुत आगे तक फैला हुआ है। सबसे हैरान करने वाली बात ये है, कि चीन और रूस के बढ़ते प्रभाव को रोकने में अमेरिका के हाथों में जो नाकामी आई है, वो राष्ट्रपति बाइडेन के कार्यकाल में ही आई है और राष्ट्रपति बनने के बाद से ही बाइडेन, वैश्विक चुनौतियों का समाधान करने में करीब करीब फेल हुए हैं। तो क्या बाइडेन, अमेरिका के सबसे कमजोर राष्ट्रपति हैं और क्या अब अमेरिका को मान लेनी चाहिए, कि दुनिया में अब सिर्फ उसका ही सिक्का नहीं चलने वाला है?

हाशिए पर आता अमेरिका
शी जिनपिंग की रूस यात्रा के दौरान चीन और रूस की तरफ से अमेरिका को एक दुश्मन के तौर पर देखा गया है और दोनों की बढ़ती दोस्ती के हर कदम पर वॉशिंगटन हाशिये पर खड़ा नजर आया है। इस पूरे यात्रा के दौरान अमेरिका सिर्फ चीन को कोसने में लगा रहा, जैसे 'यूक्रेन में शांतिदूत बनना सिर्फ एक बहाना है, पुतिन को राजनयिक कवर दे रहे हैं शी जिनपिंह।' लेकिन, अमेरिका इससे ज्यादा कुछ नहीं कर पाया। अमेरिका शी जिनपिंग को इस बात के लिए जिम्मेदार ठहराने से नाकाम रहा, कि वो भला उस व्यक्ति से कैसे मिल सकते हैं, जिसे अभी भी अंतर्राष्ट्रीय कोर्ट ने क्रिमिनल ठहराया है। हालांकि, अभी भी पुख्ता तौर पर ये नहीं कहा जा सकता है, कि क्या वास्तव में रूस और चीन ने अमेरिका विरोधी मोर्चा बना लिया है और क्या इससे अमेरिका को डरना चाहिए, लेकिन एक बात तो तय हो गई है, कि संयुक्त राज्य अमेरिका के हाथों में अब स्पष्ट रूप से एक गंभीर विदेश नीति की चुनौती है। अमेरिका एक बार फिर से शीतयुद्ध (चीन के साथ) फंस सकता है और अब चीन और रूस के पास मिलकर, यूक्रेन समेत दुनिया के कई जगहों पर अमेरिकी लक्ष्यों को नाकाम बनाने की काफी क्षमता है।

पुतिन और शी जिनपिंग का एक लक्ष्य
प्राथमिक तौर पर देखा जाए, तो शी जिनपिंग और व्लादिमीर पुतिन एक मुख्य विदेश नीति को लेकर एकजुट हैं, जिसमें वैश्विक व्यवस्था को बदनाम करना, उसे नष्ट करना (जिसे दोनों नेता पश्चिमी देशों का पाखंड मानते हैं) और एक नया वर्ल्ड ऑर्डर तैयार करना है, जिसमें लोकतांत्रिक व्यवस्था को धाराशाई कर एक निरंकुश शासन की स्थापना करना है। सोवियत संघ के पतन के बाद से ही पुतिन के मन में यह आक्रोश पैदा हो गया था, और वो कई सालों से अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को नया रूप देने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन, राष्ट्रपति जो बाइडेन की राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति के मुताबिक, चीन पुतिन की उस सोच को आकार देने के लिए एक प्रमुख "आर्थिक, कूटनीतिक, सैन्य और तकनीकी शक्ति" वाला एकमात्र अमेरिकी प्रतियोगी है। इसे ऐसे समझा जा सकता है, कि शी जिनपिंग ने यूक्रेन में समझौते के लिए जो 12 सूत्रीय शांति प्रस्ताव तैयार किया है, उसमें रूस को युद्ध शुरू करने के लिए दंडित करने के बजाए यूक्रेन को ज्यादा नसीहतें दी गईं हैं, जो अमेरिका की पॉलिसी के ठीक विपरीत है। वहीं, रूस ने साफ कर दिया है, कि यूक्रेनी राष्ट्रपति ने जो शांति योजना तैयार की थी, उसपर रूस और चीन के राष्ट्रपतियों के बीच बात तक नहीं हुई।

अमेरिका की बादशाहत हो रही ध्वस्त?
भले ही अभी तक चीन इस बात को खारिज कर रहा है, कि वो रूस को घातक हथियार मुहैया नहीं करा रहा है, लेकिन मास्को के साथ बीजिंग के बढ़ते आर्थिक और व्यापारिक संबंधों से पुतिन को यूक्रेन युद्ध को लंबे समय तक जारी रखने में भारी मदद मिल रही है। भीषण संघर्ष न केवल यूक्रेन की सैन्य जनशक्ति को सूखा सकता है, बल्कि यह अमेरिका और उसके सहयोगी राज्यों की इस क्षमता को भी खत्म कर सकता है, कि वो आखिर कब तक यूक्रेन की मदद कर सकता है। वहीं, अगर अमेरिका आगे भी यूक्रेन को गोला-बारूद भेजना जारी रखता है, तो फिर अब खुद उसका हखियार भंडार खाली होगा और ये स्थिति चीन से ज्यादा किसके लिए मुफीद हो सकती है, क्योंकि ताइवान के लिए फिर अमेरिका के पास कुछ नहीं बचेगा। लिहाजा, चीन यही चाहेगा, कि अमेरिका यूक्रेन में हथियारों की सप्लाई करना जारी रखे।

वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भी पिछड़ा अमेरिका
1970 के दशक में, जब चीन काफी कमजोर था और आर्थिक सुधार शुरू नहीं हुए थे, उस वक्त अमेरिका ने ही चीन के लिए आर्थिक सुधार के दरवाजे खोले थे और 1970 में जब अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति निक्शन ने बीजिंग की यात्रा की थी, तो उनका मकसद तत्कालीन सोवियत संघ को कमजोर करना था। उस वक्त चीन और रूस के संबंध अच्छे नहीं थे और अमेरिका उस बात का फायदा उठाने की फिराक में था। वहीं, शीत युद्ध के बाद भी अमेरिका ने रूस को ही अपने लिए सबसे बड़ा खतरा माना और चीन की हर आक्रामकता को नजरअंदाज करने की कोशिश की, जिसका असर हम आज के चीन के तौर पर देख सकते हैं। अमेरिकी शीत युद्ध नीति के सबसे प्रतिष्ठित वास्तुकारों में से एक, राजनयिक जॉर्ज केनन ने अपनी मृत्यु से पहले चेतावनी दी थी, कि पूर्वी यूरोप में पूर्व वारसॉ संधि राज्यों में नाटो का विस्तार, रूस को बीजिंग की बाहों में धकेल सकता है। बावजूद अमेरिका ने अपनी उसी पुरानी विदेश नीति को आगे बढ़ाया।

अफगानिस्तान में गलती कर चुका है अमेरिका
2021 में अमेरिका की अफगानिस्तान में की गई ऐतिहासिक गलती को इतिहास में दर्ज होगा, जब बाइ़डेन प्रशासन ने बिना सोचे-समझे अपनी सेना को काबुल से वापस बुला लिया, जिसका खामियाजा पूरे एशिया को भुगतना पड़ रहा है। अफगानिस्तान अब एक अस्थिर देश बन चुका है, जहां आतंकी संगठन ISIS-K ने फिर से फुंफकारना शुरू कर दिया है और उसकी क्षमता अब इतनी बढ़ने लगी है, कि अगले 6 महीने में वो अमेरिका और यूरोपीय देशों पर हमला कर सकता है। वहीं, अफगानिस्तान में जिस तरह से अमेरिका ने भारत को छोड़ा, उसे भी भारत कभी भूल नहीं सकता है। भले भारत को भी अमेरिका की जरूरत क्यों ना है, लेकिन इतना तो तय है, कि भारतीयों की नजर में अमेरिका एक विश्वसनीय पार्टनर की छवि नहीं बना सकता है, जो रूस के लिए है। चीन और रूस के करीबी होने के बाद भी भारतीय लोगों के मन में पुतिन के लिए एक उदार विचार हैं, लेकिन बाइडेन को अभी भी भारत में शक की निगाहों से ही देखा जाएगा।

मल्टी-पोलर वर्ल्ड में बदल रही दुनिया
इसके साथ ही, बाइडेन की कमजोर विदेश नीति ने दुनिया को बहुध्रुवीय बना दिया है। जो बाइडेन की खराब विदेश नीति का ही असर है, कि खाड़ी देश अब चीन के करीब होते जा रहे हैं। सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने तो खुलकर बाइडेन का तिरस्कार किया है और पिछले साल इन दोनों देशों के नेताओं ने बाइडेन का फोन तक नहीं उठाया। वहीं, सऊदी अरब और ईरान के बीच दशकों की दुश्मनी को किनारे रख, शी जिनपिंग ने ही दोस्ती करवाई है, जो खाड़ी देशों में चीन के विशालकाय होते प्रभुत्व को दर्शाता है। जबकि, बाइडेन ने शासन में आते ही जिस तरह से सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान को सऊदी-अमेरिकी पत्रकार जमाल खशोगी की हत्या के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराया, उसके बाद से ही सऊदी-अमेरिका संबंधों में दरार आ गया था। यानि, खाड़ी देशों से अगले कुछ सालों में अमेरिका के पैर उखड़ने वाले हैं, जिसकी नींव बाइडेन ने ही रखी है। वहीं, भारत के साथ क्वाड में होने के बाद भी बाइडेन प्रशासन ने ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन के साथ AUKUS सैन्य समझौता किया है, जो बाइडेन प्रशासन के प्रति भारत के शक का विस्तार करता है। और अगर अमेरिका अपनी इन गलतियों में सुधार नहीं करता है, तो आने वाले वक्त में दुनिया कई ध्रुवों में बंट जाएगी और राष्ट्रपति बाइडेन का कार्यकाल, अमेरिका के सबसे कमजोर राष्ट्रपति के तौर पर याद किया जाएगा, जिसके हाथों से दुनिया की कमान छुट चुकी थी।












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