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चीन हथियारों की होड़ में दुनिया के ताक़तवर देशों को कैसे दे सकता है मात

By BBC News हिन्दी
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चीन के सैनिक
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चीन के सैनिक

चीन अपनी सेना को तेज़ी से मज़बूत बना रहा है. मिसाइल टेक्नोलॉजी, परमाणु हथियारों और आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में इसकी तेज़ तरक़्क़ी ने पश्चिमी देशों के जानकारों के मन में गहरी चिंता बिठा दी है. इनका मानना है कि चीन के चलते दुनिया की सैन्य शक्ति के संतुलन में तेज़ी से बड़ा बदलाव हो रहा है.

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने 2035 तक चीन की सेना को आधुनिक बनाने का आदेश दिया है. उन्होंने चीन को 'विश्व स्तर' की एक सैन्य शक्ति बनाने को कहा है जो 2049 तक 'युद्धों को लड़ने और जीतने' में सक्षम हो.

भले यह लक्ष्य बहुत बड़ा हो, लेकिन चीन इसके लिए सही रास्ते पर चल रहा है.

आधुनिकीकरण पर हो रहा बड़ा निवेश

कई अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ रक्षा से जुड़े आंकड़ों के लिए चीन की आलोचना करते हैं. इनका मानना है कि इसे लेकर चीन में 'पारदर्शिता की कमी' है और उसके 'आंकड़े सही नहीं होते.'

हालांकि चीन रक्षा क्षेत्र पर होने वाले ख़र्च के आधिकारिक आंकड़े प्रकाशित करता है, पर पश्चिम के अनुमान अक्सर इससे काफ़ी अधिक होते हैं.

यह सब मानते हैं कि वर्तमान में सेना पर होने वाले ख़र्च के मामले में चीन से आगे केवल अमेरिका ही है.

सेंटर फ़ॉर स्ट्रेटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज़, वॉशिंगटन की एक जानी-मानी संस्था है. इसके अनुसार चीन के रक्षा बजट में हाल में जो वृद्धि हुई है, वह अपनी अर्थव्यवस्था के विकास के लिहाज से कम से कम एक दशक आगे चली गई है.

परमाणु ज़ख़ीरे में तेज़ वृद्धि

बीते नवंबर में अमेरिका के रक्षा विभाग ने अनुमान लगाया कि इस दशक के अंत तक चीन अपने परमाणु भंडार को चौगुना कर लेगा. हालांकि चीन का कहना है कि "2030 तक उसके पास कम से कम 1,000 परमाणु वॉरहेड होंगे."

चीन की सरकारी मीडिया ने अमेरिका के दावे को 'मनमाना और पक्षपातपूर्ण' क़रार देते हुए कहा कि परमाणु हथियारों को 'न्यूनतम स्तर' पर रखा गया है.

हथियार
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हथियार

स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट दुनिया के परमाणु भंडार को लेकर हर साल अपना आकलन प्रकाशित करता है. उसके विशेषज्ञों का कहना है कि चीन पिछले कई सालों से अपने परमाणु हथियार बढ़ाने में लगातार जुटा हुआ है.

हालांकि चीन अभी भी अमेरिका के 5,550 परमाणु हथियारों से काफ़ी दूर है. लेकिन इसके परमाणु ढांचे को पश्चिमी देशों के वर्चस्व के लिए सबसे बड़ा ख़तरा माना जा रहा है.

लंदन के रॉयल यूनाइटेड सर्विसेज़ इंस्टीट्यूट के वीरले नूवन्स इस बारे में अपनी राय रखते हैं. उनका कहना है, "चीन के परमाणु हथियार सबसे अहम मुद्दा है. दोनों पक्षों में भरोसे की भारी कमी है, लेकिन इसे दूर करने के लिए पर्याप्त बातचीत नहीं हो रही. हालांकि ख़तरे बहुत बड़े हैं."

भविष्य हाइपरसोनिक तकनीक का

हाइपरसोनिक मिसाइलें ध्वनि की गति से भी पांच गुना तेज़ी से अपने लक्ष्य पर वार करती हैं.

भले ये मिसाइलें इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलों जितनी तेज़ नहीं होतीं. लेकिन उड़ान के दौरान इनका पता लगाना काफ़ी मुश्किल होता है. इसका परिणाम यह होता है कि ये कई एयर डिफ़ेंस सिस्टम को भी बेकार बना सकती हैं.

हाइपरसोनिक मिसाइल
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हाइपरसोनिक मिसाइल

किंग्स कॉलेज लंदन के डॉक्टर जेनो लियोनी के अनुसार, "चीन समझता है कि वे बहुत पीछे हैं. इसलिए दूसरी ताक़तों को पछाड़ने के लिए वे बड़ी सफलता हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं. हाइपरसोनिक मिसाइलों के विकास का प्रयास उन्हीं कोशिशों में से एक है."

हालांकि चीन हाइपरसोनिक मिसाइलों की ​टेस्टिंग से इनकार करता है, लेकिन पश्चिमी देशों के विशेषज्ञ ऐसा नहीं मानते. उनका कहना है कि पिछली गर्मी में चीन के किए गए दो रॉकेट लॉन्च से संकेत मिलता है कि उसकी सेना हाइपरसोनिक मिसाइल बनाने की राह पर है.

अभी यह स्पष्ट नहीं है कि चीन कौन सी हाइपरसोनिक मिसाइल बना रहा है. वैसे इसके दो मुख्य प्रकार हैं:

  • हाइपरसोनिक ग्लाइड मिसाइलें जो पृथ्वी के वायुमंडल में ही उड़ती हैं, और
  • फ़्रैक्शनल ऑर्बिटल बॉम्बार्डमेंट सिस्टम (एफ़ओबीएस), जो लो ऑर्बिट में चली जाती हैं.

यह भी मुमकिन है कि एफ़ओबीएस युद्ध अभ्यास वाले अंतरिक्ष यान से हाइपरसोनिक मिसाइल दागकर चीन इन दोनों सिस्टम को मिलाने में कामयाब रहा हो.

हाइपरसोनिक मिसाइल
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हाइपरसोनिक मिसाइल

हालांकि डॉक्टर लियोनी कहते हैं कि हाइपरसोनिक मिसाइलें अपने आप में 'गेम-चेंजर' नहीं हो सकतीं, लेकिन इसके चलते कई टारगेट पर हमले का ख़तरा ज़रूर बढ़ जाएगा.

वे कहते हैं, "ख़ासकर विमानवाहक पोतों को हाइपरसोनिक मिसाइलों से बचा पाना बहुत कठिन हो जाएगा.''

हालाांकि उनका यह भी कहना है कि चीन की हाइपरसोनिक मिसाइलों से ख़तरा वास्तविक होते हुए भी हो सकता है कि पश्चिम के अधिकारियों ने इसे थोड़ा बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया हो.

आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस और साइबर हमले

अमेरिका के रक्षा विभाग के अनुसार, चीन अब 'बुद्धिमान' हथियारों या विघटन करने वाली तकनीकों ख़ासकर आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के सहारे अपनी भविष्य की लड़ाई लड़ने के लिए ख़ुद को तैयार कर रहा है.

चीन की सैनिक विज्ञान एकेडमी को 'सिविल-मिलिट्री गठजोड़' के ज़रिए ऐसा करने का आदेश दिया गया है. दूसरे शब्दों में कहें तो चीन के निजी क्षेत्र की तकनीकी कंपनियों को देश के रक्षा उद्योगों के साथ जोड़कर काम किया जाना है.

कई रिपोर्टों के अनुसार, चीन पहले से मिलिट्री रोबोटिक्स और मिसाइल गाइडेंस सिस्टम के साथ मानवरहित एरियल व्हीकल और मानवरहित नौसैनिक जहाज़ों में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस तकनीक का इस्तेमाल कर रहा है.

हाल के एक आकलन में बताया गया कि चीन ने पहले ही विदेशों में बड़े पैमाने पर साइबर ऑपरेशन किए हैं. अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोपीय संघ ने जुलाई में चीन पर आरोप लगाया कि उसने माइक्रोसॉफ़्ट के एक्सचेंज सर्वरों को निशाना बनाकर एक बड़ा साइबर हमला किया था.

ऐसा माना जाता है कि इस हमले से दुनिया भर के कम से कम 30,000 संगठन प्रभावित हुए थे. इस हमले का मक़सद बड़े पैमाने पर निजी जानकारी के साथ बौद्धिक संपदा हासिल करना था.

नौसेना
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नौसेना

चीन की नौसेना: बड़ी पर सबसे ताक़तवर नहीं

चीन की नौसेना अब अमेरिका को पछाड़कर दुनिया में सबसे बड़ी हो गई है. हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि केवल जहाज़ों की संख्या से ताक़त का अंदाज़ा लगाना ठीक नहीं है. इनके अनुसार, ट्रेंड का परीक्षण करना उपयोगी हो सकता है.

फ़िलहाल अमेरिका कई मामलों में चीन से काफ़ी आगे है. चीन के पास केवल दो विमानवाहक पोत हैं, जबकि अमेरिका के पास ऐसे 11 पोत हैं. परमाणु से चलने वाली पनडुब्बियों, क्रूज़र और विध्वंसक या बड़े युद्धपोतों के मामलों में भी अमेरिका की नौसेनिक क्षमता चीन से कहीं ज़्यादा है.

हालांकि उम्मीद है कि चीन अपनी नौसेना का अभी और विस्तार करेगा.

बीजिंग की शिन्हुआ यूनिवर्सिटी में कार्यरत पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के पूर्व सीनियर कर्नल झोउ बो का मानना ​​है कि समुद्र से होने वाले ख़तरों के मुक़ाबले के लिए चीन को अपनी नौसेना को मज़बूत बनाना बेहद ज़रूरी है.

वे कहते हैं, "हमें सबसे अधिक चीन के जल क्षेत्र में अमेरिकी उकसावे की समस्या का सामना करना पड़ता है."

अमेरिकी नौसेना का आकलन है कि 2020 से 2040 के बीच चीन की नौसेना के जहाज़ों की संख्या में लगभग 40 फ़ीसदी की वृद्धि होगी.

अनिश्चित भविष्य

क्या चीन अब न भिड़ने की अपनी नीति को छोड़कर अधिक जोख़िम लेने की दिशा में आगे बढ़ रहा है?

इस बारे में डॉक्टर लियोनी कहते हैं कि फ़िलहाल चीन का नज़रिया बिना लड़े जीत हासिल करने वाला ही है. हालांकि उन्होंने कहा कि कुछ वक़्त बाद वह इस रणनीति को बदल सकता है.

उनके अनुसार, "अपनी नौसेना को पूरी तरह से आधुनिक बना लेना अहम पड़ाव हो सकता है."

हालांकि सीनियर कर्नल झोउ ज़ोर देकर कहते हैं कि पश्चिम की आशंकाओं का कोई आधार नहीं है.

वे कहते हैं, ''अमेरिका के विपरीत चीन का पूरी दुनिया पर पुलिस लगाने का कोई इरादा नहीं है. चीन यदि कभी और मज़बूत भी हुआ तो भी वह अपनी बुनियादी नीतियों को ही बनाए रखेगा."

चीन ने 1979 के वियतनाम युद्ध के बाद से कोई युद्ध नहीं लड़ा है. इसलिए उसकी अधिकांश सैनिक क्षमताओं का कोई परीक्षण नहीं हुआ है.

(ग्राफ़िक्स: सैंड्रा रोड्रिग्ज़ चिल्लिडा, जॉय रोक्सस और सीन विलमोट द्वारा)

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