Diplomacy: अकड़ छोड़कर चीन ने अचानक भारत से अपने संबंध क्यों सुधारे? जानिए कैसे झुकता नहीं तो टूट जाता ड्रैगन!

India-China Ties: जून 2020 में गलवान संघर्ष के बाद, भारत ने चीनी निवेश को सीमित करने के लिए कुछ कड़े और सख्त कदम उठाए थे, खासकर कम्युनिकेशन और ऑडियो-वीडियो कंपोनेंट्स जैसे महत्वपूर्ण और रणनीतिक माने जाने वाले क्षेत्रों में।

भारत का यह सतर्क रुख गलवान से पहले का है, जो महत्वपूर्ण क्षेत्रों में चीनी प्रभाव से संबंधित सुरक्षा आशंकाओं पर आधारित है। लेकिन इन प्रतिबंधों के बावजूद, चीन पिछले पंद्रह वर्षों से ज्यादा समय से भारत के आयात का सबसे बड़ा स्रोत बना हुआ है, जो दोनों देशों के बीच जटिल आर्थिक संबंधों को दर्शाता है।

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भारत-चीन में आर्थिक संबंध

भारत और चीन के बीच आर्थिक निर्भरता अप्रैल 2023 से फरवरी 2024 तक रिपोर्ट किए गए महत्वपूर्ण व्यापार आंकड़ों को देखने पर साफ साफ पता चलता है, जहां चीन से आयात बढ़कर 117.68 अरब डॉलर हो गया। यह भारत के कुल आयात का 15.16% था, जो गलवान के बाद तेज हुए व्यापार असंतुलन को दूर करने के प्रयासों के बावजूद भारतीय बाजार में चीन की महत्वपूर्ण भूमिका का खुलासा करता है।

इसके विपरीत, इसी अवधि के दौरान चीन को भारत का निर्यात सिर्फ 16.67 अरब डॉलर तक ही पहुंच गया। यानि, चीन और भारत के बीच व्यापार घाटा 100 अरब डॉलर से ज्यादा है। जो साफ साफ बताता है, कि भारत में एक वक्त 'चीन का बहिष्कार करो' का जो नारा दिया गया था, वो बुरी तरह से फेल हो गया है।

हालांकि, कोविड-19 संकट के बाद चीन की अर्थव्यवस्था में लगातार भूकंप के झटके आ रहे हैं, जिसने चीन को अपनी अकड़ को साइड में रखते हुए भारत के साथ संबंधों को सुधारने पर मजबूर कर दिया है।

चीन में हाल की आर्थिक चुनौतियों का गंभीर असर पड़ा है और पिछले वर्ष की तुलना में मार्च 2024 में चीन के निर्यात में 7.5% की गिरावट आई है, जिसने चीनी वस्तुओं के लिए भारतीय बाजार तक पहुंच के महत्व को लेकर ड्रैगन के दिल में एक डर पैदा किया है।

चीन की अर्थव्यवस्था संकट कितना गंभीर है?

यहां एक बात और जानना जरूरी है, कि चीन के घरेलू बाजार में मुद्रा अपस्फीति है, यानि सामान इतने ज्यादा सस्ते हो चुके हैं, कि कंपनियों के लिए मुनाफा कमाना नामुमकिन हो चुका है और अब चीन के पास सिर्फ एक रास्ता बचा हुआ है, सामानों का निर्यात और अगर निर्यात करता है, तो चीन की अर्थव्यवस्था ही संकट में फंस जाएगी। और यही वजह है, कि चीन को दबाव में लाने के लिए पश्चिमी देश, चीनी सामानों पर टैरिफ बढ़ा रहे हैं, यानि विदेशों में चीनी कंपनियों के लिए सामान बेचना मुश्किल हो जाएगा।

निर्यात में यह गिरावट, जो अनुमानित 2.3% से ज्यादा गंभीर है, वो चीन के कमजोर घरेलू उपभोक्ता खर्च, लड़खड़ाते रियल एस्टेट सेक्टर और संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोपीय संघ जैसी प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के साथ बढ़ते व्यापार तनाव के कारण है। इस आर्थिक बैकग्राउंड ने बीजिंग को सोचने पर मजबूर किया और उसे अपनी निवेश रणनीतियों पर फिर से सोचने के लिए मजबूर किया है, जिसमें तेजी से बढ़ते भारतीय बाजार पर उसकी गहरी नजर है।

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अचानक कैसे पटरी पर आ गये भारत-चीन संबंध?

भारत के डिफेंस नेता और विदेश विभाग के नीति निर्माता एक महीने पहले तक चीन से जुड़ी सीमा पर स्थिति को तनावपूर्ण बता रहे थे, लेकिन रूस के कजान में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन शुरू होने से ठीक एक दिन पहले, भारत-चीन सीमा विवाद के सामान्य होने की बात ब्रेकिंग न्यूज सामने आ गई, जो भविष्य के व्यापार संबंधों को काफी हद तक प्रभावित कर सकता है।

चीनी निवेश और उत्पादों के प्रति भारत का खुलापन इस 'शांति की अवधि' और प्रभाव को निर्धारित कर सकता है। अधिकारियों के अनुसार, बीजिंग, भारतीय बाजार की अपरिहार्य प्रकृति को पहचानते हुए, विशेष रूप से अपने स्वयं के आर्थिक संकुचन के बीच, भारत में अपने निवेश के लिए "त्वरित और व्यापक स्वागत" के लिए उत्सुक है।

चीन की आर्थिक मंदी, जिसकी विशेषता कम मांग और सामानों की गिरती कीमतें हैं, उसने इसके निर्माताओं और निर्यातकों पर दबाव डाला है, जिससे भारत जैसे अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच पहले से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है। और एक्सपर्ट्स का मानना है, की चीन का अचानक 'शांति समझौता' करना, भारत के विशालाय बाजार, भारतीयों की खर्च करने की आदत, और विशाल और महत्वाकांक्षी मध्यम वर्ग के बैकग्राउंड के साथ जुड़ा हुआ है।

भारत भी चीन को लेकर देख रहा अपना फायदा

भारत ने भी चीन के साथ रिश्तों को सामान्य होने का फायदा उठाने की सोची है और नई दिल्ली में नीति निर्माता, चीनी निवेशों के प्रति ज्यादा ग्रहणशील रुख पर विचार कर रहे हैं, जैसा कि जुलाई के वार्षिक आर्थिक सर्वेक्षण में मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंथा नागेश्वरन ने संकेत दिया है।

चीनी निवेश को प्रोत्साहित करने से भारत के लिए कई रणनीतिक उद्देश्य पूरे हो सकते हैं, जिसमें व्यापार घाटे में कमी, विनिर्माण क्षमताओं में वृद्धि और रोजगार में इजाफा आना शामिल हैं। यह नजरिया वैश्विक "चीन प्लस वन" रणनीति के मुताबिक ही है, जो चीन से परे विनिर्माण आधारों में विविधता लाने का प्रयास करता है।

खुद को एक वैकल्पिक केंद्र के रूप में स्थापित करके, भारत न केवल अपनी तत्काल आर्थिक और रणनीतिक जरूरतों को पूरा कर सकता है, बल्कि ग्लोबल सप्लाई चेन में अपनी जगह भी मजबूत कर सकता है।

लिहाजा हाल ही में दोनों देशों के बीच पनपा कूटनीतिक जुड़ाव और आपसी आर्थिक हितों से प्रेरित भारत-चीन संबंध निवेश और व्यापार प्रतिबंधों में संभावित नरमी की ओर इशारा करते हैं। जैसे-जैसे दोनों देश अपने जटिल आर्थिक और रणनीतिक परिदृश्यों में आगे बढ़ रहे हैं, चीनी निवेश के लिए भारत के खुलेपन की सीमा निश्चित तौर पर उनके द्विपक्षीय संबंधों को आकार देगी और क्षेत्रीय आर्थिक गतिशीलता को प्रभावित करेगी।

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