यूक्रेन संकट: मारियुपोल में पुतिन की जंग की क़ीमत चुका रहे बच्चे
अस्पताल के बेड पर लेटा छोटा सा अर्तेम एक टक देखे जा रहा है. उसने अपने एक हाथ में टॉय ट्रैक्टर पकड़ा हुआ है लेकिन वो कुछ बोल नहीं रहा. नर्सें उनकी निगरानी कर रही हैं.
रूस की ओर से दाग़े गए गोले से निकला छर्रा अर्तेम के पेट में घुस गया. इस हमले में अर्तेम के माता-पिता और दादा-दादी भी बुरी तरह ज़ख़्मी हो गए. ये सब मारियुपोल से भागने की कोशिश कर रहे थे. पुतिन के युद्ध के पीड़ित बने अर्तेम की उम्र तीन साल भी नहीं हुई है.
अर्तेम से अगले बेड पर 15 साल की माशा लेटी हैं. माशा भी मारियुपोल के पास की ही रहने वाली हैं. बीते मंगलवार रूस की गोलाबारी के दौरान हुए धमाके से उनका दाहिना पैर ज़ख़्मी हो गया और अब इसे काटना पड़ा है.
यूक्रेन में व्लादिमीर पुतिन के युद्ध और लगातार जारी बमबारी का मारियुपोल में फंसे आम लोगों पर क्या असर हुआ है, उसे पास के ही ज़पोरज़िया में बच्चों के अस्पताल में साफ़-साफ़ देखा जा सकता है.
सैकड़ों लोगों को अभी तक यहां से बचाकर निकाला गया है. इनके शरीर पर लगी चोटें धीरे-धीरे भर जाएंगी लेकिन यहां के हालात देख लोग जिस तरह की मानसिक पीड़ा में हैं, वो शायद जीवन भर भुलाया नहीं जा सकेगा.
यहां मौजूद डॉक्टर और हमलों में किसी तरह बचने वाले बच्चों के रिश्तेदारों ने हमसे उनकी कहानी दिखाने-बताने को कहा. इनमें से एक बच्चों के इस अस्पताल के प्रमुख डॉक्टर यूरी बोरज़ेंको भी हैं. डॉक्टर बोरज़ेंको रूस के किए को लेकर अपना गु़स्सा छिपा नहीं सके.
चेहरे पर बिना किसी संवेदना के डॉक्टर बोरज़ेंको कहते हैं, "मुझे रूस से नफ़रत है. जिस बच्ची (माशा) ने अपना पैर खोया है वो इस क़दर सदमे में है कि कई दिनों से खा-पी भी नहीं रही. जो हुआ वो उसे स्वीकार नहीं कर पा रही है. हमें उसे नसों के ज़रिए खाना देना पड़ता है."
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पलायन करनेवालों का दर्द
डॉक्टर एक अन्य बच्चे के बारे में कहते हैं, "छह साल के बच्चे के सिर पर छर्रा लगा. उनकी गाड़ी हमले का निशाना बनी और बच्चे की आंखों के सामने ही उसकी मां जलकर मर गई, लेकिन बच्चे ने एक आंसू तक नहीं बहाया. दो दिन बाद उसने अपने पिता से कहा कि वो उसे एक नई मां ख़रीद कर ला दें, क्योंकि उसे स्कूल ले जाने के लिए किसी की ज़रूरत थी."
मारियुपोल में जो भी हो रहा है वो एक मानवीय आपदा है. शायद एक युद्ध अपराध. अभी तक शहर की 90 फ़ीसदी इमारतें या तो क्षतिग्रस्त हो गई हैं या फिर ध्वस्त. बीते सप्ताह एक थिएटर पर हमले के बाद कुछ रिपोर्ट्स में बताया गया है कि रविवार को एक आर्ट स्कूल पर भी हमला किया गया है. इस स्कूल में तक़रीबन 400 लोग रह रहे थे.
जो लोग मारियुपोल से भागने में सफल रहे उनके पास सुनाने को ऐसी भयावह कहानियां हैं जिनपर यक़ीन करना मुश्किल है. कई लोग सड़कों पर पड़ी लाशों और बर्बाद हो चुके घरों की यादें लेकर यहां से दूर चले गए हैं.
निप्रो शहर में रूस के हमले का निशाना बन चुके एक कैफ़े में हमारी मुलाक़ात ओकसाना गुसक से हुई. अपने पति ऐंड्री और अपने माता-पिता के साथ ओकसाना बीते सप्ताह सुरंग और दर्जनों रूसी चेकप्वॉइंट से होते हुए मारियुपोल से भागीं.
मारियुपोल में अपना सब कुछ छोड़कर आने वाली ओकसाना के लिए अब एक ग्लास पानी पीना ही किसी सुविधा से कम नहीं. इस पूरे परिवार ने हमारी ओर से कॉफ़ी पीने के प्रस्ताव को भी बड़ी ही विनम्रता से ना कह दिया. इनका कहना था कि अगर वो कॉफ़ी पीते हैं तो ये मारियुपोल में छूट चुके उनके परिवार के सदस्यों का अपमान करने जैसा होगा.
उनके पति ऐंड्री ने मुझे बताया कि मारियुपोल में पानी की आपूर्ति ठप है, बिजली नहीं है, बर्फ़ीली ठंड में हीटिंग और फिर किसी से संपर्क करने तक का विकल्प नहीं है. इसलिए उनके पास मारियुपोल छोड़ने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा था.
कइयों का बिखर गया परिवार
ओकसाना कहती हैं, "बेशक हम जोख़िम उठा रहे थे लेकिन उस समय मैंने इसकी परवाह नहीं की थी कि मैं मारियुपोल में मरूं या यहां से बाहर निकलते हुए मरूं."
"हमें पता था कि हम किसी हमले का निशाना बन सकते हैं, हमारी जान जा सकती है लेकिन हमें ये भी एहसास था कि हमें जोख़िम उठाना होगा. अगर हम वहां रहते तो हमारे जीने की संभावन न के बराबर होती."
ऐंड्री और ओकसाना उन चंद भाग्यशाली लोगों में शामिल हैं जो बिना किसी नुक़सान के मारियुपोल से निकलने और अब साथ रहने में कामयाब रहे.
ज़पोरज़िया में बच्चों के अस्पताल में एक ऐसे पिता से मुलाकात हुई जिनका पूरा परिवार बिखर चुका है.
उनकी 26 साल की बेटी नताशा और चार साल की नातिन डॉमिनिका रूस के हमले में मारे गए. ये हमला उस शेल्टर के पास हुआ जहां उनके पूरे परिवार ने शरण लिया हुआ था.
व्लादिमीर कहते हैं, "मैंने ज़मीन पर देखा और वहां मेरी छोटी सी नातिन का शव पड़ा था और उसके सिर के चिथड़े हो चुके थे. वो एक झटके में इस दुनिया से चली गई. उसके पास ही मेरी बेटी का शव पड़ा था जिसके दोनों पैर फ़्रैक्चर थे."
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डॉमिनिका हमले के तुरंत बाद ही इस दुनिया को अलविदा कह चुकी थीं, जबकि उनकी मां की मौत अगले दिन इलाज के दौरान हुई.
लगभग टूट चुके व्लादिमीर अब अपनी दूसरी बेटी डियाना की ख़ातिर हिम्मत नहीं हारना चाहते. डियाना भी धमाके में गंभीर रूप से घायल हो गई हैं और उनकी इमरजेंसी सर्जरी होनी है.
लेकिन व्लादिमीर अपना दुख छिपा नहीं पा रहे. वो फूट-फूटकर रो पड़ते हैं और कहते हैं, "ईश्वर, आपने ये मेरे साथ क्यों किया? मुझे मेरे बच्चों को दफ़नाना पड़ा. मेरी प्यारी बच्चियों मैं तुम्हारी रक्षा नहीं कर पाया."
यूक्रेन में लड़ाई को कई हफ़्ते हो गए हैं. लड़ाई रुकने का नाम नहीं ले रही. रूस के राष्ट्रपति पुतिन के दिमाग़ में क्या चल रहा है उसके बारे में पश्चिमी देश केवल कयास लगा रहे हैं. लेकिन यूक्रेन के आम लोग युद्ध की बड़ी क़ीमत चुका रहे हैं.
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